संपादकीयः भारतीय युवाओं की मेंटल हेल्थ के बारे में चेतावनी

संपादकीयः भारतीय युवाओं की मेंटल हेल्थ के बारे में चेतावनी

‘ग्लो बल माइंड हेल्थ इन 2025’ की ताजा रिपोर्ट को भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी समझना जरूरी है। 84 देशों के बीच कराए गए इस वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य अध्ययन में भारतीय युवाओं का 60वें स्थान पर होना न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे पर भी सवाल खड़े करता है। हैरानी की बात यह भी है कि भारतीय युवाओं की तुलना में बुजुर्गों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर पाया गया है। 55 वर्ष से अधिक आयु के भारतीयों का ‘माइंड हेल्थ कोशिएंट’ (एमएचक्यू) 96 के सम्मानजनक स्तर पर है, वहीं युवाओं का स्कोर गिरकर महज 33 रह गया है। यह विडंबना ही है कि जिस पीढ़ी के पास तकनीक और सुविधाएं सबसे अधिक हैं, वही मानसिक रूप से सबसे अधिक असुरक्षित महसूस कर रही है। रिपोर्ट में युवाओं के गिरते मानसिक स्तर के पीछे स्मार्टफोन की भूमिका को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। दरअसल, बचपन का एक बड़ा हिस्सा स्क्रीन के सामने बिताने से बच्चों में वास्तविक सामाजिक कौशल विकसित नहीं हो पा रहे, जो मानसिक मजबूती के लिए जरूरी है।

डिजिटल दुनिया ने भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है। युवा पीढ़ी में पारिवारिक लगाव भी कम हुआ है जो संकट के समय बड़ा संबल बनता है। अध्ययन बताता है कि भारत में 55 वर्ष से अधिक आयु के 78 फीसदी लोग खुद को परिवार के करीब महसूस करते हैं, जबकि युवाओं में यह आंकड़ा मात्र 64 फीसदी है। भारतीय संस्कृति की नींव कहे जाने वाले ‘संयुक्त परिवार’ और ‘सामुदायिक जुड़ाव’ अब इतिहास बनते जा रहे हैं। एकल परिवारों के बढ़ते चलन और माता-पिता की व्यस्तता ने युवाओं को एकाकी बना दिया है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन भी मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट का एक बड़ा कारण है। भारतीय युवाओं में 44 फीसदी लोग नियमित रूप से जंक फूड का सेवन कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर उनके मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहा है।

यह समझना आवश्यक है कि मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा सिर्फ चिंता या अवसाद तक सीमित नहीं है। यह युवाओं की निर्णय लेने की क्षमता, ध्यान केंद्रित करने की शक्ति, स्थिर संबंध बनाने की कला और तनाव से उबरने के सामथ्र्य को प्रभावित कर रहा है। यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और विशेष रूप से अभिभावकों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। हमें शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बच्चों के मानसिक लचीलेपन पर भी ध्यान देना होगा। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य विषय बनाना, स्क्रीन-टाइम पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय नीति बनाना और परिवारों में संवाद की संस्कृति को फिर जीवित करना अनिवार्य हो गया है। हमें स्वीकार करना होगा कि एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण केवल गगनचुंबी इमारतों और जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और संतुलित मस्तिष्क वाली युवा पीढ़ी से होता है।

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