1942 के आन्दोलन में द्विजदेनी जी सैकड़ों लोगों के साथ जुलूस निकालने के दौरान हुए थे गिरफ्तार

1942 के आन्दोलन में द्विजदेनी जी सैकड़ों लोगों के साथ जुलूस निकालने के दौरान हुए थे गिरफ्तार

द्विजदेनी जी पूर्णिया क्षेत्र के सर्वाधिक चर्चित साहित्यकार, नाटक, शिक्षाप्रेमी और समाजसेवी थे। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। उन्होंने हितैषी पत्रिका का प्रकाशन कर लोगों में देशभक्ति की भावना जगाई। हितैषी के प्रकाशन में उन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी और मैथिलीशरण जैसे पत्रकार साहित्यकार का सहयोग भी मिला था। 1942 के आन्दोलन में द्विजदेनी जी सैकड़ों लोगों के साथ फारबिसगंज में एक जुलूस निकालकर थाना की ओर बढ़ते हुए अंग्रेजों के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। भागलपुर जेल में उन्हें इतना प्रताड़ित किया गया कि 18 जून 1943 को जेल में ही भारतमाता के इस सपूत का देहान्त हो गया। कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु द्विजदेनी जी को अपना साहित्यिक और राजनीतिक गुरु मानते थे। भास्कर न्यूज| पूर्णिया साहित्यिक चौपाल चटकधाम एवं भगवान प्रसाद जायसवाल पुस्तकालय के संयुक्त तत्त्वावधान में महान स्वतंत्रता सेनानी पं रामदेनी तिवारी द्विजदेनी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर परिचर्चा एवं काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। भगवान प्रसाद जायसवाल पुस्तकालय में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता आकाशवाणी पूर्णिया के पूर्व निदेशक विजय नंदन प्रसाद ने की। इस आयोजन के मुख्य वक्ता गोरे लाल मेहता कालेज, बनमनखी के प्रधानाचार्य डॉ.प्रमोद भारतीय तथा विशिष्ट वक्ता के रूप में फारबिसगंज के रामदेनी तिवारी द्विजदेनी के प्रपौत्र विनोद कुमार तिवारी, बाल साहित्यकार हेमन्त यादव शशि, पूर्णिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ.मनोज कुमार सिंह, सदानंद सुमन, राम नरेश भक्त, डॉ. शंभु लाल वर्मा तथा यमुना प्रसाद बसाक ने अपने-अपने विचार प्रकट किये। मंच का संचालन डॉ शंभु लाल वर्मा ने किया। विषय प्रवर्तन प्रियंवद जायसवाल ने किया। 1905 में फारबिसगंज से द्विजदेनी जी आए थे पूर्णिया द्विजदेनी जी के जीवन वृत्त पर प्रकाश डालते हुए फारबिसगंज से आये हेमन्त यादव शशि ने कहा कि 1905 ई में रोजी-रोटी के सिलसिले में वे पूर्णिया आये। कुछ दिन राजा पी सी लाल के यहां किरानी का काम किया। बाद में सुल्तानपुर इस्टेट फारबिसगंज के जमींदार अलेक्जेंडर फोर्सेस के यहां नौकरी की। वहां भी मन नहीं रमा। सब छोड़छाड़ के सिमरबन्नी आये और वहां नाट्य संस्था खोल दिया। धीरे-धीरे वहां विद्यालय खोले, खुद उसमें पढ़ाने लगे और साहित्य सृजन करने लगे। उन्हें लोकप्रियता और काफी श्रद्धा सम्मान मिला।कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। मौके पर रानी सिंह, नीतू बाबू, सदानंद सुमन, गिरिजा नंदन मिश्र, सुनील समदर्शी, गोविन्द प्रसाद, श्री प्रभाष बहरदार, मनीष, आभाष जायसवाल, प्रो. अर्पिता ,प्रिया सिन्हा, शशिकांत, रमेश चौधरी तथा अजेय जी ने काव्य पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन गिरिजा नंद मिश्र ने किया। द्विजदेनी जी पूर्णिया क्षेत्र के सर्वाधिक चर्चित साहित्यकार, नाटक, शिक्षाप्रेमी और समाजसेवी थे। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। उन्होंने हितैषी पत्रिका का प्रकाशन कर लोगों में देशभक्ति की भावना जगाई। हितैषी के प्रकाशन में उन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी और मैथिलीशरण जैसे पत्रकार साहित्यकार का सहयोग भी मिला था। 1942 के आन्दोलन में द्विजदेनी जी सैकड़ों लोगों के साथ फारबिसगंज में एक जुलूस निकालकर थाना की ओर बढ़ते हुए अंग्रेजों के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। भागलपुर जेल में उन्हें इतना प्रताड़ित किया गया कि 18 जून 1943 को जेल में ही भारतमाता के इस सपूत का देहान्त हो गया। कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु द्विजदेनी जी को अपना साहित्यिक और राजनीतिक गुरु मानते थे। भास्कर न्यूज| पूर्णिया साहित्यिक चौपाल चटकधाम एवं भगवान प्रसाद जायसवाल पुस्तकालय के संयुक्त तत्त्वावधान में महान स्वतंत्रता सेनानी पं रामदेनी तिवारी द्विजदेनी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर परिचर्चा एवं काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। भगवान प्रसाद जायसवाल पुस्तकालय में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता आकाशवाणी पूर्णिया के पूर्व निदेशक विजय नंदन प्रसाद ने की। इस आयोजन के मुख्य वक्ता गोरे लाल मेहता कालेज, बनमनखी के प्रधानाचार्य डॉ.प्रमोद भारतीय तथा विशिष्ट वक्ता के रूप में फारबिसगंज के रामदेनी तिवारी द्विजदेनी के प्रपौत्र विनोद कुमार तिवारी, बाल साहित्यकार हेमन्त यादव शशि, पूर्णिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ.मनोज कुमार सिंह, सदानंद सुमन, राम नरेश भक्त, डॉ. शंभु लाल वर्मा तथा यमुना प्रसाद बसाक ने अपने-अपने विचार प्रकट किये। मंच का संचालन डॉ शंभु लाल वर्मा ने किया। विषय प्रवर्तन प्रियंवद जायसवाल ने किया। 1905 में फारबिसगंज से द्विजदेनी जी आए थे पूर्णिया द्विजदेनी जी के जीवन वृत्त पर प्रकाश डालते हुए फारबिसगंज से आये हेमन्त यादव शशि ने कहा कि 1905 ई में रोजी-रोटी के सिलसिले में वे पूर्णिया आये। कुछ दिन राजा पी सी लाल के यहां किरानी का काम किया। बाद में सुल्तानपुर इस्टेट फारबिसगंज के जमींदार अलेक्जेंडर फोर्सेस के यहां नौकरी की। वहां भी मन नहीं रमा। सब छोड़छाड़ के सिमरबन्नी आये और वहां नाट्य संस्था खोल दिया। धीरे-धीरे वहां विद्यालय खोले, खुद उसमें पढ़ाने लगे और साहित्य सृजन करने लगे। उन्हें लोकप्रियता और काफी श्रद्धा सम्मान मिला।कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। मौके पर रानी सिंह, नीतू बाबू, सदानंद सुमन, गिरिजा नंदन मिश्र, सुनील समदर्शी, गोविन्द प्रसाद, श्री प्रभाष बहरदार, मनीष, आभाष जायसवाल, प्रो. अर्पिता ,प्रिया सिन्हा, शशिकांत, रमेश चौधरी तथा अजेय जी ने काव्य पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन गिरिजा नंद मिश्र ने किया।  

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