नदी, झीलों, जलाशयों पर कब्जा या अतिक्रमण कोई नई बात नहीं है। मिट्टी डालकर भराव करने, पानी का रास्ता बदल देने की घटनाएं आम हैं। पर आश्चर्य तब होता है जब जिम्मेदार ही जलाशय को डंपिंग यार्ड बना दें। ऐसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है पर जोधपुर में ऐसा हुआ है।
हमें अपनी विरासतों के संरक्षण के लिए पहचाना जाता है। 550 साल पुराना यह शहर अपने आप में कई ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए है। इन्हीें में एक है चतुर सागर। करीब 200 साल पहले सिवांची गेट के समीप बनाया गया था। भूतेश्वर वन खंड की पहाड़ियों से आने वाला पानी इस सरोवर में एकत्रित होता था, शहर की पेयजल व्यवस्था में काम लिया जाता था। 35 एकड़ में फैला यह तालाब समय के साथ जिम्मेदारों की उदासीनता की भेंट चढ़ता गया। पिछले तीन दशक से यहां अतिक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं। पहाड़ियों पर कब्जे हो रहे हैं और सरोवर में पानी की आवक न के बराबर है।
इस पेयजल स्रोत का गला घोंट दिया गया। खुद नगर निगम ने इसे डंपिंग यार्ड बना दिया, जब जनता ने विरोध किया तो पीछे हटे। पुराने शहर की घनी आबादी के बीच यह महत्वपूर्ण स्थल है। इसे बचाने से ही पुराना जोधपुर निखरेगा। आज आवश्यकता है चतुर सागर पर किए गए कब्जों को हटाने की, जलमार्ग में आ रहे तमाम अवरोधों को भी दूर करना होगा। यह मांग लम्बे समय से उठ रही है। पिछले कुछ सालों में चतुर सागर लालफीताशाही की भेंट चढ़ा हुआ है। पहले तो इसकी किसी ने सुध नहीं ली, फिर जाती हुई सरकार ने इसे बजट दिया तो उसे अतिक्रमणकर्ताओं ने तरह-तरह के तर्क गढ़ कर अटका दिया।
इस पर विकास कार्य न हों, इसलिए अंतिम हथियार के रूप में इसे वन सम्पदा का हवाला देकर रुकवा दिया गया। सरकार गई, बजट गया, चतुर सागर जस का तस रहा। मगर वाशिंदे निराश नहीं हुए। सलाम है उन चंद जुझारू नागरिकों को, जिन्होंने इसको बचाने का बीड़ा उठा रखा है। दफ्तरों के चक्कर काटते रहे। आखिरकार थक हार कर नगर निगम ने मामला केन्द्र के हवाले कर दिया। केन्द्र ने जनता की गुहार को समझा और इस जलाशय के 10 बीघा के विकास कार्य पर मुहर लगा दी। साथ ही वन विभाग की एनओसी भी जारी कर दी।
यह काफी हद तक संघर्ष करने वालों की जीत है, लेकिन अभी भी इस बजट से धरातल पर काम करने के लिए चक्कर खत्म नहीं हो रहे। पर्यटन सीजन शुरू होने वाला है। इस बार समय रहते इस सरोवर को संवारने का काम शुरू हो जाता तो शहर को एक नई पहचान मिलेगी। जिम्मेदारों की नींद टूटनी चाहिए और इस सरोवर को बचाने के लिए धरातल पर काम शुरू होना चाहिए। अब सरकार ने इसको संवारने के लिए 6.5 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इसकी वित्तीय स्वीकृति मिलना बाकी है। हमारे अपने सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत पहल कर जल्द से जल्द वित्तीय स्वीकृति दिलाएं। अब और कितना इंतजार करना होगा जोधपुर को।
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