ड्रैगन का नया दांव: मध्यस्थता के लिए विशेष दूत भेजेगा चीन! क्या अमेरिका, इजरायल और ईरान में जंग रुकेगी

ड्रैगन का नया दांव: मध्यस्थता के लिए विशेष दूत भेजेगा चीन! क्या अमेरिका, इजरायल और ईरान में जंग रुकेगी

Special Envoy: मध्य पूर्व (Middle East) में भड़की भीषण जंग ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए विनाशकारी हमलों के बाद पूरा खाड़ी क्षेत्र सुलग रहा है। इस महाविनाश को रोकने और अपना वैश्विक भू-राजनीतिक दबदबा बढ़ाने के लिए अब चीन ने ‘शांतिदूत’ के रूप में एंट्री मारी है। चीनी विदेश मंत्रालय ने ऐलान किया है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस युद्ध को रोकने और मध्यस्थता के लिए अपने विशेष दूत (झाई जुन) को तुरंत मध्य पूर्व भेज रहे हैं। चीन नोबेल पुरस्कार पाने के इच्छुक डोनाल्ड ट्रंप की शांतिदूत इमेज पर भी कटाक्ष कर रहा है। चीन अभी सुपर पॉवर है और उसकी बात को आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मौजूदा समय में दुनिया में चीन ही वह शक्तिशाली तटस्थ देश है जो यूएस व इजरायल से पूरी ताकत के साथ बात कर सकता है और ईरान उसकी बात नहीं टाल सकता। आइए चीन, अमेरिका, इजरायल और ईरान की मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इस महायुद्ध की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट जानिए।

कौन देश, किस देश से और क्यों लड़ रहा है?

यह सीधी जंग अमेरिका-इजरायल गठबंधन और ईरान (और उसके समर्थित गुटों) के बीच लड़ी जा रही है। इस युद्ध का मुख्य उद्देश्य अमेरिका (राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन) और इजरायल (बेंजामिन नेतन्याहू) की ओर से ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) करना और उसके परमाणु व बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को हमेशा के लिए खत्म करना है।

अमेरिका और इजरायल किन देशों पर कर रहे हैं हमला ?

अमेरिका और इजरायल के लड़ाकू विमान मुख्य रूप से ईरान के शहरों (तेहरान व इस्फहान आदि) पर भारी बमबारी कर रहे हैं। इसके साथ ही वे लेबनान (हिजबुल्लाह के ठिकानों), इराक और सीरिया में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया गुटों पर भी लगातार एयरस्ट्राइक कर रहे हैं।

ईरान में अली खामेनेई को कब मारा गया ?

इस युद्ध का सबसे बड़ा और टर्निंग पॉइंट 28 फरवरी 2026 को आया। इसी दिन अमेरिका और इजरायल के एक बड़े जॉइंट मिलिट्री ऑपरेशन (‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’) में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को तेहरान स्थित उनके आवास पर मार गिराया गया। उनकी मौत के बाद से ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4’ के तहत विनाशकारी पलटवार शुरू कर दिया।

अमेरिकी एयरबेस और ईरान का पलटवार

खाड़ी देशों में अमेरिका के कई प्रमुख सैन्य ठिकाने मौजूद हैं:

कतर: अल उदेद एयरबेस।

यूएई: अल धफरा एयरबेस।

कुवैत: अली अल-सलेम एयरबेस।

बहरीन: नेवल सपोर्ट एक्टिविटी (NSA)।

जॉर्डन: मुवाफ्फक अल-साल्टी एयरबेस।

इराक: ऐन अल-असद बेस

खामेनेई की मौत का बदला लेने के लिए ईरान इन्ही 6 देशों में मौजूद अमेरिकी एयरबेस और इजरायल के शहरों (जैसे तेल अवीव) पर भीषण बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है।

जंग की चपेट में आए 12 देश कौन से हैं?

इस समय प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खाड़ी और मिडिल ईस्ट के लगभग 12+ देश इस युद्ध का अखाड़ा बन चुके हैं:

1.अमेरिका, 2. इजरायल, 3. ईरान, 4. लेबनान, 5. इराक, 6. सीरिया (जहां सीधे हमले/युद्ध हो रहे हैं)।

7 कतर, 8. कुवैत, 9. यूएई, 10. बहरीन, 11. जॉर्डन, 12. ओमान (जहां अमेरिकी बेस हैं या ईरान के मिसाइल गिरे हैं)। इसके अलावा सऊदी अरब और साइप्रस (ब्रिटिश बेस) भी इस आंच की चपेट में हैं।

जंग को लेकर अरब देशों का रुख क्या है ?

जंग को लेकर अरब देश (सऊदी, यूएई, कतर व बहरीन आदि) इस समय भारी धर्मसंकट में हैं। चूंकि उनकी जमीन पर अमेरिकी बेस हैं, इसलिए वे ईरान के सीधे निशाने पर आ गए हैं। इन देशों ने अपनी संप्रभुता और नागरिक ठिकानों पर हुए ईरानी हमलों की कड़ी निंदा की है, लेकिन साथ ही (ओमान जैसे देशों ने) अमेरिका-इजरायल की एकतरफा आक्रामकता का भी विरोध किया है। ये देश युद्ध से बचना चाहते हैं क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से उनका तेल व्यापार बर्बाद हो रहा है। ऐसे में अगर चीन जंग रुकवाने के लिए मध्यस्थता करता है तो पूरी दुनिया चैन की सांस लेगी।

चीन और जिनपिंग का रुख: ट्रंप और ईरान पर क्या है नीति?

राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रुख इस पूरे मामले में एकदम स्पष्ट है। चीन ईरान को अपना बेहद करीबी रणनीतिक साझेदार मानता है। बीजिंग ने साफ कहा है कि वह ईरान की संप्रभुता की रक्षा का पूरी तरह समर्थन करता है और अमेरिका-इजरायल के ‘सत्ता परिवर्तन’ के एजेंडे के खिलाफ है। चीन ने अमेरिका और इजरायल से तुरंत सैन्य हमले रोकने की मांग की है। जिनपिंग का ट्रंप प्रशासन के प्रति रुख बेहद कड़ा है। चीन का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक सैन्य नीतियां वैश्विक शांति के लिए सीधे तौर पर खतरा हैं। यही कारण है कि चीन अब अमेरिका के विकल्प के रूप में खुद को एक ‘ग्लोबल पीसमेकर’ (शांतिदूत) की तरह पेश कर रहा है और अपने विशेष दूत के माध्यम से इस युद्ध को शांत कराने का दांव चल रहा है।

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