इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कथित तौर पर देश में अशांति फैलाने के उद्देश्य से रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को बसाने के मामले में आरोपी डॉ. अब्दुल गफ्फार की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने मामले की जांच कर रही उत्तर प्रदेश एटीएस (एंटी टेररिस्ट स्क्वाड) की लापरवाही पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने अक्टूबर 2023 से जारी जांच की धीमी गति पर सवाल उठाए। न्यायालय ने अपने आदेश में जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि यदि विवेचना के दौरान आवश्यकता महसूस हो, तो आरोपी डॉ. अब्दुल गफ्फार को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें न केवल संज्ञेय अपराधों के आरोप हैं, बल्कि जिनसे देश की सुरक्षा और शांति खतरे में पड़ सकती है। खंडपीठ ने सवाल किया कि जब एफआईआर दर्ज होने से पहले ही आरोपी की संलिप्तता संज्ञान में आ गई थी, तो देश की सुरक्षा से जुड़े इतने गंभीर आरोपों के बावजूद उसे गिरफ्तार करने के लिए ठोस प्रयास क्यों नहीं किए गए। न्यायालय ने इस तथ्य को मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव (गृह), मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव/सचिव और पुलिस महानिदेशक के संज्ञान में लाने का निर्देश दिया, ताकि उचित कार्रवाई और आदेश पारित किए जा सकें। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति पी.के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह आदेश पारित करते हुए डॉ. अब्दुल गफ्फार की अपील खारिज कर दी। न्यायालय ने एटीएस को यह स्वतंत्रता भी दी है कि यदि उसकी संतुष्टि के अनुसार गिरफ्तारी आवश्यक हो, तो वह आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है।


