ग्वालियर में लावारिस शवों के साथ अमानवीय व्यवहार का मामला सामने आया है। नीडम मुक्तिधाम के पीछे करीब 100×100 फीट के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से अज्ञात शवों को दफनाया जाता रहा है। हाल ही में महाराजपुरा क्षेत्र के एक शव की शिनाख्त के लिए कब्र खोदी गई, तो वहां का दृश्य बेहद भयावह मिला। कहीं हाथ-पैर की हड्डियां तो कहीं खोपड़ियां खुले में बिखरी पड़ी थीं। मौके पर आवारा कुत्तों द्वारा कब्रों से शव निकालकर नोचने के प्रमाण भी मिले। उथली कब्रों में दफन होने के कारण शव अक्सर बाहर आ जाते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्वच्छता और दुर्गंध फैलती रहती है। आसपास के रहवासियों का कहना है कि यह स्थिति लंबे समय से बनी हुई है। हर दस कदम पर बिखरी मिलीं हड्डियां दैनिक भास्कर की टीम जब गेट खोलकर अंदर पहुंची तो मिट्टी से एक पैर की हड्डी बाहर निकली दिखाई दी। कुछ दूरी पर मिट्टी से कपड़ा झांकता नजर आया। पास जाकर देखने पर उसमें एक शव दबा मिला। यह शव हाल ही में दफनाया गया था, लेकिन एक दिन पहले हुई बारिश के कारण ऊपर की मिट्टी बह गई थी। इसके बाद अंदर घुसे आवारा कुत्तों ने शव को नोचकर बाहर खींच लिया था। करीब 10 हजार वर्गफीट क्षेत्र में हर कुछ कदम पर मानव हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। उथली कब्रों में दफनाए जाते हैं शव ग्वालियर में लावारिस शवों को नीडम मुक्तिधाम के पीछे निर्धारित क्षेत्र में दफनाया जाता है। पहचान की संभावना को ध्यान में रखते हुए शवों को कम गहराई वाले गड्ढों में दफनाया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से निकाला जा सके। हालांकि, कब्रों की यही उथली बनावट समय के साथ समस्या बनी रहती है, क्योंकि आवारा जानवर इन्हें आसानी से खोदकर बाहर निकाल देते हैं। कुत्ते खोद रहे कब्रें, फैल रही दुर्गंध नीडम मुक्तिधाम कभी शहर से दूर, सुनसान इलाके में स्थित था, लेकिन अब यह शहरी क्षेत्र के बीच आ चुका है। इसके पीछे बने विशेष स्थान पर लावारिस शवों को दफनाया जाता है। मुक्तिधाम के आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि यहां अक्सर आवारा कुत्ते मिट्टी खोदकर शवों को बाहर निकाल लेते हैं और उन्हें नोचते हैं। गेट खुला रह जाए तो जानवर आसानी से अंदर पहुंचकर कब्रों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस कारण कई बार शव उथले दिखाई देने लगते हैं और पूरे इलाके में दुर्गंध बनी रहती है। चौकीदार का दावा- कोई जिम्मेदार नहीं, जल्दबाजी में दफनाए जा रहे शव लावारिस शवों के कब्रिस्तान की देखरेख कर रहे नरेश वाल्मीकि ने चौंकाने वाली जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस स्थल के प्रबंधन के लिए कोई अधिकृत कर्मचारी तैनात नहीं है। शव लाने के बाद कर्मचारी अक्सर शराब पीते हैं और फिर जल्दबाजी में उन्हें कम गहराई वाली कब्रों में दफना देते हैं। नरेश का कहना है कि वे पिछले 20 वर्षों से यही स्थिति देख रहे हैं। उन्हें इस काम के लिए कोई भुगतान भी नहीं मिलता। हर माह 10–12 शव दफन, सिर्फ दो फीट गहराई में ऑनलाइन सर्विस एसोसिएशन के अध्यक्ष रमेश बाबू कुशवाहा ने बताया कि उनकी टीम केवल शवों को लाने-ले जाने में पुलिस की सहायता करती है। दफनाने की पूरी प्रक्रिया पुलिस की निगरानी में होती है और इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है और मेरे पास कोई स्थायी कर्मचारी नहीं हैं उन्होंने कहा कि हर महीने करीब 10 से 12 लावारिस शव यहां दफनाए जाते हैं। पहचान की संभावना को ध्यान में रखते हुए इन्हें करीब दो फीट या उससे कम गहराई में दफनाया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर आसानी से निकाला जा सके। हालांकि, इसी कारण आवारा कुत्ते कई बार कब्र खोदकर शवों को बाहर निकाल लेते हैं।


