डायरेक्टर-कम-प्रोफेसर विभागाध्यक्ष पद का कार्य करेंगे:मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के नेत्र विज्ञान विभाग पर अहम फैसला

डायरेक्टर-कम-प्रोफेसर विभागाध्यक्ष पद का कार्य करेंगे:मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के नेत्र विज्ञान विभाग पर अहम फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के नेत्र विज्ञान विभाग (मनोहर दास क्षेत्रीय नेत्र संस्थान) में ‘निदेशक’ पद को लेकर चल रहे विवाद पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जब तक निदेशक का कोई अलग स्वतंत्र पद सृजित नहीं किया जाता, तब तक विभागाध्यक्ष ही पदेन ‘डायरेक्टर-कम-प्रोफेसर’ होंगे।
केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी को यह पद नहीं दिया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने दिया है। यह याचिका डॉ. अपराजिता चौधरी और डॉ. संतोष कुमार ने अलग अलग याचिका दायर की थी। डॉ. अपराजिता का कहना था कि वह संस्थान की सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर हैं, इसलिए निदेशक पद की जिम्मेदारी उन्हें मिलनी चाहिए। वहीं डॉ. संतोष कुमार का तर्क था कि वे वर्तमान में रोटेशन के आधार पर विभागाध्यक्ष हैं, इसलिए निदेशक की जिम्मेदारी भी उन्हीं को सौंपी जानी चाहिए। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि वर्ष 1976 के शासनादेश के तहत मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग और मनोहर दास आई हॉस्पिटल का विलय कर एक संस्थान बनाया गया था, जिसमें विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर को ही ‘डायरेक्टर-कम-प्रोफेसर’ नामित करने की व्यवस्था की गई थी। साथ ही, संस्थान में निदेशक का कोई अलग स्वीकृत पद, वेतनमान या भत्ता भी निर्धारित नहीं है। 2021 की रोटेशन नीति के तहत विभागाध्यक्ष का पद दो साल के लिए वरिष्ठ प्रोफेसरों को क्रमवार दिया जाता है। चूंकि वर्तमान में डॉ. संतोष कुमार विभागाध्यक्ष हैं, इसलिए वही पदेन निदेशक माने जाएंगे। अदालत ने डॉ अपराजिता चौधरी को निदेशक नियुक्त करने वाले 9 मई 2025 के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि विभागाध्यक्ष ही ‘डायरेक्टर-कम-प्रोफेसर’ के रूप में कार्य करेंगे।

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