बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खास मंत्री अशोक चौधरी असिस्टेंट प्रोफेसर बन गए हैं। 58 साल की उम्र में मंत्री रहते अकादमिक पद हासिल करना न सिर्फ नियमों पर सवाल उठाता है, बल्कि दलित युवाओं की आकांक्षाओं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ वाली इमेज पर भी सवाल खड़ा करता है। चौधरी की नियुक्ति का मामला राजनीतिक दबदबे की ओर इशारा कर रहा है, जो राज्य की पारदर्शी बहाली प्रक्रिया पर गहरा असर डाल सकता है। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में जानिए, इससे जुड़े सवालों के जवाब…। सवाल-1ः मंत्री अशोक चौधरी असिस्टेंट प्रोफेसर कब और कैसे बने? जवाबः बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी ने 16 फरवरी को पाटलीपुत्र यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर योगदान दिया। 17 फरवरी को यूनिवर्सिटी के AN कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में जॉइनिंग दी। सवाल-2ः क्या चौधरी का असिस्टेंट प्रोफेसर बनना नियमों का उल्लंघन है? विवाद क्यों हुआ? जवाबः चौधरी ने BSUSC के नियमों के मुताबिक, बहाली में अप्लाई किया और इंटरव्यू दिया। दलित (SC) कोटे के तहत उनका रिजल्ट आ गया। कायदे से देखें तो चौधरी ने नियमों का कोई उल्लंघन नहीं किया है। लेकिन चौधरी संभवतः देश के इकलौते मंत्री हैं, जिन्होंने अपनी ही सरकार की निकाली गई बहाली में हिस्सा लिया। ऐसा नहीं है कि चौधरी इकलौते असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, जो राजनीति में हैं। उनसे पहले भी लोग रहे हैं, लेकिन वह पहले प्रोफेसर बने, बाद में मंत्री। जैसे-उपेंद्र कुशवाहा और चंद्रशेखर। चौधरी की नियुक्ति की पारदर्शिता पर सवाल क्यों चौधरी नीतीश कुमार के खास मंत्रियों में शामिल हैं। इनकी मुख्यमंत्री आवास में डायरेक्ट एंट्री है। ऐसे में अपनी ही सरकार की ओर से नियुक्त आयोग के सदस्यों के सामने इंटरव्यू देकर सेलेक्ट होना, राजनीतिक नैतिकता पर सवाल खड़े करता है। इसे ऐसे समझिए… सवाल-3ः चौधरी ने क्या एक दलित युवक की सीट का नुकसान किया? जवाबः बिल्कुल। अशोक चौधरी की नियुक्ति दलित (SC) कैटेगरी में हुई है। उनकी फिलहाल उम्र 58 साल है और असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी 65 साल तक होती है। मतलब चौधरी के पास पढ़ाने के लिए सिर्फ 7 साल बचेंगे। अगर चौधरी की जगह कोई दूसरा 40 साल का दलित कैंडिडेट सेलेक्ट होता तो उसके पास पढ़ाने के लिए 25 साल बाकी होता। मंत्री चौधरी की नियुक्ति पर कांग्रेस और RJD ने सवाल उठाया था। कांग्रेस ने X पर पोस्ट किया, ‘युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। लेकिन अशोक चौधरी 58 साल की उम्र में प्रोफेसर बन गए, यह आरएसएस कोटे की बदौलत संभव हुआ।’ सवाल-4ः चौधरी की ख्वाहिश से क्या नीतीश कुमार की इमेज को डेंट लगेगा? जवाबः बहुत ज्यादा नुकसान संभव नहीं है। हालांकि, थोड़ा परसेप्शन बिगड़ेगा। नीतीश की सरकार ‘सुशासन’ और मेरिटोक्रेसी पर जोर देती है, लेकिन चौधरी का मामला नेपोटिज्म और राजनीतिक रसूख के आरोपों को हवा दे रहा है। चुनाव के दौरान यह मुद्दा उठा। RJD और प्रशांत किशोर ने इसे नीतीश के करीबियों को फायदा पहुंचाने का उदाहरण बताया था। जॉइनिंग के बाद पिता को किया याद 17 फरवरी को AN कॉलेज में जॉइन करने के बाद मंत्री अशोक चौधरी ने अपने पिता दिवंगत महावीर चौधरी को याद किया। X पर लिखा… ‘आपका सपना साकार हुआ, पापा। जो आप देखना चाहते थे। वो आज हो रहा है। आज आप स्वयं यहां नहीं हैं, लेकिन जो आपने मेरे लिए सोचा था- वो सपना आज आंखों के सामने पूरा होता दिख रहा है। आप कभी नहीं चाहते थे कि मैं राजनीति की उठापटक में उलझूं। आपकी इच्छा थी कि मैं शिक्षा की राह चुनूं। प्रोफेसर बनूं और एक स्थिर, सम्मानित जीवन जीऊं। इसीलिए आपने पीएचडी करवाई। उस समय आपकी बात जिद लगती थी। आज समझ आता है वो जिद नहीं, दूरदर्शिता थी। शिक्षा के प्रति आपका वो प्रेम, वो समर्पण आज भी मेरे भीतर जीता है। लेकिन आपने मेरा जज्बा देखा, जनसेवा का पैशन देखा और एक पिता की तरह समझौता किया। जो हर पिता अपने बेटे के लिए करता है। लोग प्रोफेसर होकर मंत्री बनते हैं और मैं मंत्री बनने के बाद प्रोफेसर बन रहा हूं।’ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खास मंत्री अशोक चौधरी असिस्टेंट प्रोफेसर बन गए हैं। 58 साल की उम्र में मंत्री रहते अकादमिक पद हासिल करना न सिर्फ नियमों पर सवाल उठाता है, बल्कि दलित युवाओं की आकांक्षाओं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ वाली इमेज पर भी सवाल खड़ा करता है। चौधरी की नियुक्ति का मामला राजनीतिक दबदबे की ओर इशारा कर रहा है, जो राज्य की पारदर्शी बहाली प्रक्रिया पर गहरा असर डाल सकता है। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में जानिए, इससे जुड़े सवालों के जवाब…। सवाल-1ः मंत्री अशोक चौधरी असिस्टेंट प्रोफेसर कब और कैसे बने? जवाबः बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी ने 16 फरवरी को पाटलीपुत्र यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर योगदान दिया। 17 फरवरी को यूनिवर्सिटी के AN कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में जॉइनिंग दी। सवाल-2ः क्या चौधरी का असिस्टेंट प्रोफेसर बनना नियमों का उल्लंघन है? विवाद क्यों हुआ? जवाबः चौधरी ने BSUSC के नियमों के मुताबिक, बहाली में अप्लाई किया और इंटरव्यू दिया। दलित (SC) कोटे के तहत उनका रिजल्ट आ गया। कायदे से देखें तो चौधरी ने नियमों का कोई उल्लंघन नहीं किया है। लेकिन चौधरी संभवतः देश के इकलौते मंत्री हैं, जिन्होंने अपनी ही सरकार की निकाली गई बहाली में हिस्सा लिया। ऐसा नहीं है कि चौधरी इकलौते असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, जो राजनीति में हैं। उनसे पहले भी लोग रहे हैं, लेकिन वह पहले प्रोफेसर बने, बाद में मंत्री। जैसे-उपेंद्र कुशवाहा और चंद्रशेखर। चौधरी की नियुक्ति की पारदर्शिता पर सवाल क्यों चौधरी नीतीश कुमार के खास मंत्रियों में शामिल हैं। इनकी मुख्यमंत्री आवास में डायरेक्ट एंट्री है। ऐसे में अपनी ही सरकार की ओर से नियुक्त आयोग के सदस्यों के सामने इंटरव्यू देकर सेलेक्ट होना, राजनीतिक नैतिकता पर सवाल खड़े करता है। इसे ऐसे समझिए… सवाल-3ः चौधरी ने क्या एक दलित युवक की सीट का नुकसान किया? जवाबः बिल्कुल। अशोक चौधरी की नियुक्ति दलित (SC) कैटेगरी में हुई है। उनकी फिलहाल उम्र 58 साल है और असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी 65 साल तक होती है। मतलब चौधरी के पास पढ़ाने के लिए सिर्फ 7 साल बचेंगे। अगर चौधरी की जगह कोई दूसरा 40 साल का दलित कैंडिडेट सेलेक्ट होता तो उसके पास पढ़ाने के लिए 25 साल बाकी होता। मंत्री चौधरी की नियुक्ति पर कांग्रेस और RJD ने सवाल उठाया था। कांग्रेस ने X पर पोस्ट किया, ‘युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। लेकिन अशोक चौधरी 58 साल की उम्र में प्रोफेसर बन गए, यह आरएसएस कोटे की बदौलत संभव हुआ।’ सवाल-4ः चौधरी की ख्वाहिश से क्या नीतीश कुमार की इमेज को डेंट लगेगा? जवाबः बहुत ज्यादा नुकसान संभव नहीं है। हालांकि, थोड़ा परसेप्शन बिगड़ेगा। नीतीश की सरकार ‘सुशासन’ और मेरिटोक्रेसी पर जोर देती है, लेकिन चौधरी का मामला नेपोटिज्म और राजनीतिक रसूख के आरोपों को हवा दे रहा है। चुनाव के दौरान यह मुद्दा उठा। RJD और प्रशांत किशोर ने इसे नीतीश के करीबियों को फायदा पहुंचाने का उदाहरण बताया था। जॉइनिंग के बाद पिता को किया याद 17 फरवरी को AN कॉलेज में जॉइन करने के बाद मंत्री अशोक चौधरी ने अपने पिता दिवंगत महावीर चौधरी को याद किया। X पर लिखा… ‘आपका सपना साकार हुआ, पापा। जो आप देखना चाहते थे। वो आज हो रहा है। आज आप स्वयं यहां नहीं हैं, लेकिन जो आपने मेरे लिए सोचा था- वो सपना आज आंखों के सामने पूरा होता दिख रहा है। आप कभी नहीं चाहते थे कि मैं राजनीति की उठापटक में उलझूं। आपकी इच्छा थी कि मैं शिक्षा की राह चुनूं। प्रोफेसर बनूं और एक स्थिर, सम्मानित जीवन जीऊं। इसीलिए आपने पीएचडी करवाई। उस समय आपकी बात जिद लगती थी। आज समझ आता है वो जिद नहीं, दूरदर्शिता थी। शिक्षा के प्रति आपका वो प्रेम, वो समर्पण आज भी मेरे भीतर जीता है। लेकिन आपने मेरा जज्बा देखा, जनसेवा का पैशन देखा और एक पिता की तरह समझौता किया। जो हर पिता अपने बेटे के लिए करता है। लोग प्रोफेसर होकर मंत्री बनते हैं और मैं मंत्री बनने के बाद प्रोफेसर बन रहा हूं।’


