बाराबंकी जिले के देवा स्थित सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर आयोजित होने वाली विश्वप्रसिद्ध कौमी एकता की होली पर संकट गहरा गया है। करीब 100 सालों से चली आ रही इस परंपरा के तहत दरगाह की चौखट पर गुलाल उड़ाकर “जो रब है वही राम” का संदेश दिया जाता रहा है। डीएम को भेजा गया पत्र हालांकि, आयोजन समिति ने वर्ष 2026 में होली जुलूस निकालने और उसकी जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है। समिति ने बाराबंकी जिलाधिकारी को एक औपचारिक पत्र भेजकर सूचित किया है कि उनकी ओर से इस वर्ष कोई आयोजन नहीं किया जाएगा। इस घोषणा के बाद क्षेत्र में इस ऐतिहासिक आयोजन के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। परंपरा बंद करने का इरादा नहीं समिति के अध्यक्ष शहजादे आलम ने स्पष्ट किया है कि परंपरा को बंद करने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने बताया कि पिछले लगभग 40 वर्षों से वे इस आयोजन को भव्य रूप देते रहे हैं। उनके प्रयासों से हानिकारक रंगों की जगह गुलाल और गुलाब के फूलों से होली खेलने की शुरुआत हुई, जिससे आयोजन की गरिमा बनी रही। अब वे चाहते हैं कि नई पीढ़ी इस विरासत को संभाले। हिंदू-मुस्लिम एकता की है मिसाल देवा शरीफ की यह होली केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम एकता की जीवंत मिसाल है। यहां मजार की छांव में दोनों समुदायों के लोग प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं। समिति के पीछे हटने के बाद इस परंपरा को जारी रखने की जिम्मेदारी अब स्थानीय प्रशासन और कस्बावासियों पर आ गई है। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को लिखित सूचना मिलने के बाद प्रशासन इस संवेदनशील और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आयोजन को शांतिपूर्ण तथा गरिमापूर्ण ढंग से संपन्न कराने के तरीकों पर विचार कर रहा है।


