चुनाव से 2 दिन पहले तत्कालीन CM शिवराज सिंह ने मुझसे बात की थी। उनको अहसास था कि यहां से चुनाव हार जाएंगे। मुझसे कहा था कि सबसे कहिए हम जिला बनाएंगे। चुनाव हो गए संतोष वरकड़े विधायक भी बन गए। लेकिन, यह विषय जितनी गंभीरता से उठना चाहिए था, नहीं उठा। यह कहना है RSS के प्रचारक रहे प्रमोद साहू का। वे सिहोरा जिला बनाओ आंदोलन के प्रमुख चेहरे हैं। जबलपुर जिले की सिहोरा तहसील को जिला बनाने की मांग करीब 30 साल से चल रही है। इसको लेकर कई बड़े आंदोलन हुए। लोगों ने दीये जलाए, भू-समाधि तक ली। इस बार का आंदोलन आर-पार का दिखाई दे रहा है। 6 दिसंबर से प्रमोद साहू 6 दिसंबर से अन्न का त्याग कर अनशन कर रहे हैं। 9 दिसंबर को उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया। 10 दिसंबर को डॉक्टर्स की एक टीम आंदोलन स्थल पर पहुंची और उन्हें आनन-फानन ICU में एडमिट कर दिया। इसके बाद डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा ने उनसे बात की। मामले में सीएम से बैठकर बात करने का आग्रह कर जल का अनशन खत्म करा दिया। लेकिन, अन्न का अनशन अभी भी जारी है। फिलहाल वे सिहोरा सिविल अस्पताल में ही एडमिट हैं। इस दौरान दैनिक भास्कर के उनसे बात की है। पढ़िए… सवाल: आमरण सत्याग्रह की जरूरत क्यों पड़ी? सिहोरा को जिला क्यों बनवाना चाहते हैं?
जवाब: जिले की मांग का मुद्दा साल 1999 से चल रहा है। तब मैं यहां नहीं था। 2003 में विधानसभा चुनाव से पहले ये मुद्दा जोर-शोर से उठा। उस आंदोलन में कई लोग घायल हुए। कई लोगों को मारा-पीटा गया। तब तत्कालीन दिग्विजय सरकार ने इसे जिला बनाने की मांग स्वीकार की थी। तब यहां विधायक नित्यनिरंजन खंपरिया थे। सिहोरा जिला राजपत्र में भी प्रकाशित हुआ था। उस समय जो सिहोरा तहसील थी वो विखंडित नहीं थी। अखंड थी। उसी को जिला बनाने की मांग हो रही है। जैसे मझौली, ढीमरखेड़ा, बोहरीबंद, बाकल, पान उमरिया, सलौंडी, गोदालपुर, गांधीग्राम। ये सभी जगहें तहसील का हिस्सा थीं। ज्यादातर को सिहोरा से अलग कर अन्य तहसीलें बना दिया। हम भारत की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी तहसील रही सिहोरा को जिला बनाने की मांग कर रहे हैं। इसमें जिला बनाने की सभी जरूरी चीजें हैं। सवाल: दिग्विजय सिंह के सिहोरा को जिला स्वीकारने और राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद भी जिला क्यों नहीं बना?
जवाब: दरअसल, उस वक्त ये सब होने के करीब 3 दिन बाद प्रदेश में चुनाव की आचार संहिता लागू हो गई थी। इसके चलते प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी। वास्तव में इसे नई सरकार बनने के बाद 2007 तक जिला बन जाना था। प्रक्रिया पूरी हो जानी थी लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच लगाने वाले अपने खेल खेलते रहे और सिहोरा जिला नहीं बन पाया। सवाल: सिहोरा को जिला बनवाने वाले मुद्दे ने दोबारा मजबूती कब पकड़ी?
जवाब: साल 2021 के अक्टूबर महीने में सिहोरा जिले के कुछ युवाओं ने तय किया कि अब सिहोरा जिला बनना ही चाहिए। उन्होंने लक्ष्य जिला आंदोलन समिति बनाई। तबसे उनका आंदोलन चालू है। अब तक पता नहीं उन्होंने क्या-क्या किया है। उनके संघर्ष की कहानियों को हम सुनेंगे तो बहुत तकलीफ होगी। सवाल: आप इस आंदोलन से कैसे जुड़े? उसके बाद क्या-क्या हुआ?
जवाब: मैं यहां लंबे वक्त से लोगों के बीच में हूं। क्षेत्र रहा हूं। हजारों लोगों से मिला हूं। सभी के मन में पीड़ा है। सिहोरा के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां के लोगों को अपने काम के लिए जिला मुख्यालय कटनी जाना पड़ता है। उन्हें बहुत कटा-कटा का महसूस होता है। लोग मुझसे कहते हैं कि नेता राजनेता हमेशा झुनझुना पकड़ा देते हैं। मैने लोगों के अंदर दुख देखा इसलिए मैं इस आंदोलन से जुड़ा। साल 2023 में जब मैं भी आंदोलन का हिस्सा था तब। यहां प्रहलाद पटेल आए थे। वो मुझसे भी मिले थे। उन्होंने भी कहा था कि सिहोरा को जिला बनाने की मांग बहुत लंबी है और इसे जिला बनने देना चाहिए। आखिरी चुनाव के समय यहां स्मृति ईरानी आई थीं। उन्होंने मंच से कहा था कि मैं खुद विधायक को लेकर मुख्यमंत्री के पास जाऊंगी। सिहोरा को जिला बनवाऊंगी। वो भी लौट कर नहीं आईं। चुनाव से 2 दिन पहले डॉ. जितेंद्र जामदार के माध्यम से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुझसे बात की थी। उनको एहसास हो गया था कि यहां से वो चुनाव हार जाएंगे। तब शिवराज जी ने मुझसे कहा था कि भाईसाहब सब लोगों से कहिए कि हम जिला बनाएंगे। किसी भी हालत में बनाएंगे। चुनाव हो गए भारतीय जनता पार्टी के संतोष वरकड़े विधायक भी बन गए। लेकिन, ये विषय ऊपर जितनी गंभीरता से उठना चाहिए, नहीं उठाया गया। सवाल: चुनाव के बाद से करीब 2 साल तक कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं हुआ?
जवाब: हमें लगा था कि हमारे विधायक ऊपर इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएंगे, लेकिन नहीं उठाया गया। हमने उन्हें बस वक्त दिया था। हालांकि हमारा आंदोलन बंद कभी नहीं हुआ था। इसी बीच कई युवाओं के अंदर इसको लेकर इतनी पीड़ा थी कि वो आत्महत्या करने तक के लिए तैयार हो गए थे। जब मुझे इसकी जानकारी लगी तो दुख हुआ और भाव आया कि ये सबसे ज्यादा जरूरी विषय है। मैने युवाओं को समझाया, ऐसा न करने को कहा। पूरी बात ऊपर तक गई। 3 महीने तक बात चली। वहां से घुमाने और तलने वाली बातें की गईं। इसके बाद मैंने 28 अक्टूबर को प्रेस वार्ता के जरिए कहा कि सिहोरा जिला नहीं बना तो 6 दिसंबर से अन्न का त्याग करूंगा। बस स्टैंड में आमरण सत्याग्रह करूंगा। 9 दिसंबर को मैंने क्षेत्र के लोगों का आह्वान किया था और जल भी त्यागने का प्रण ले लिया था। सवाल: अनशन वाले दिन से लेकर अब तक क्या हुआ? आप ICU में एडमिट कैसे हुए? पानी क्यों पिया?
जवाब: 6 दिसंबर को मैं अन्न त्यागकर आमरण अनशन पर बैठ गया था। 9 दिसंबर को क्षेत्र के हजारों लोग यहां पहुंचे थे। उसी दिन मैंने जल का त्याग भी कर दिया था। 10 दिसंबर को डॉक्टर्स की टीम मेरे पास पहुंची। उन्होंने मेरी हालत नाजुक बताते हुए मुझसे अन्न जल ग्रहण करने को कहा। मैंने नहीं किया। इसके बाद उन्होंने मेरे स्वास्थ्य को अधिक खतरा बताते हुए मुझे आईसीयू में एडमिट होने का अनुरोध किया। मैने उनकी ये बात मान ली लेकिन अन्न जल ग्रहण नहीं किया। इसी बीच 13 दिसंबर को प्रदेश के डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा का जबलपुर आना हुआ। वहां उन्होंने लक्ष्य जिला समिति के प्रतिनिधि मंडल को मिलने जबलपुर बुलाया था। लेकिन समिति से कोई उनसे मिलने जाने को तैयार नहीं था। इसी बीच क्षेत्रीय विधायक को लगा कि उनसे मेरी बात करा दें तो विधायक मेरे पास आ गए। उन्होंने टेलीफोन पर डिप्टी CM से मेरी बात कराई। उन्होंने कॉल पर मेरे से कहा आप बहुत पुराने हैं। हमारे वरिष्ठ हैं। आपके विषय को हम मुख्यमंत्री जी के पास रखेंगे। आप अपनी लड़ाई जारी रखिए लेकिन अन्न जल का त्याग मत करिए। इसे ग्रहण कीजिए। मैं भरोसा दिलाया हूं कि अगले किसी भी मंगलवार के दिन आप सहित प्रतिनिधि मंडल को भोपाल बुलाकर मुख्यमंत्री जी से टेबल टॉक कराएंगें। इसके बाद CM की मुलाकात समिति के सदस्यों से गंभीरता से हुई। मैने सभी की बातें सुनीं। ध्यान लगाया। फिर मैं इस निर्णय पर पहुंचा कि अन्न तो ग्रहण नहीं करूंगा। जब तक बात नहीं हो जाती तब तक जल और जूस से काम चलता रहेगा। सवाल: मुख्यमंत्री से बातचीत से क्या समाधान निकलेगा? सिहोरा जिला नहीं बना तो क्या?
जवाब: मुख्यमंत्री से बातचीत के बाद अगर जिला सिहोरा का विषय हाल होता है। सिहोरा के लोग उससे संतुष्ट होते हैं तो हमारा भी लक्ष्य वही है। सब ठीक हो जाएगा। समझौते का कोई प्रश्न ही नहीं है। सिहोरा जिला बनना हमारा लक्ष्य है। जनजन की पीड़ा है। हमारे स्वाभिमान की बात है। जन्मभूमि की बात है। ये भारत का केंद्र है। यहां केंद्र के लोग जब तक कुपित रहेंगे भारत का विकास उस गति से नहीं हो पाएगा जैसे हम चाहते हैं। सिहोरा को नाभि स्थल कहते हैं। मैं भारत के केंद्र वाली जगह जो सिहोरा से 15 किमी दूर है मैं वहां साधना भी करके आया हूं। जब तक जिला नहीं बनेगा अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। और इससे बड़ा भी कुछ हो सकता है। सवाल: आप RSS के प्रचारक रहे हैं, संगठन से मदद मिल रही है?
जवाब: मैं 25 वर्ष संघ का प्रचारक रहा हूं। यहां आकर भी संघ के लिए ही काम करता हूं। संघ ही मेरा जीवन है। न ही अभी कोई चुनाव है, न ही कोई राजनीतिक मुद्दा। ये विषय संघ का बिल्कुल भी नहीं है। ये विषय मेरी जन्मभूमि और नागरिक कर्तव्य का है। इसलिए मैं इसमें शामिल हूं। ये सिहोरा के जन जन का मुद्दा है। सवाल: आंदोलन स्थल से आईसीयू तक का क्या संघर्ष रहा?
जवाब: 9 दिसंबर को मैने जल त्याग दिया। 10 दिसंबर को डॉक्टर्स की टीम आई उन्होंने मुझसे कहा कि अन्न तक तो ठीक था अपने जल त्याग दिया है। शारीरिक परिस्थितियां गंभीर होने जैसे हालात हैं। अपनी किडनी लिवर खराब हो जाएंगे। उन्होंने मुझसे एडमिट होने का अनुरोध किया। मैने उनकी सलाह मानी। वो मुझे जबलपुर ले जाने की पूरी तैयारी से आए थे लेकिन मैं यहीं रहा। यहां के मेडिकल स्टाफ ने मेरा सपोर्ट किया। उन्होंने यहीं पूरी व्यवस्था कर दी। बस अस्पताल आया लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। अन्न जल नहीं लिया। यह खबर भी पढ़े…
जबलपुर में भाजपा कार्यालय के बाहर लगे पोस्टर जबलपुर से 40 किमी दूर सिहोरा कस्बे को जिला बनाने की मांग एक बार फिर उठी है। 5 महीने पहले सिहोरा के लोग सड़क पर उतर आए थे। उन्होंने भाजपा संभागीय कार्यालय जबलपुर के बाहर पोस्टर लगाए थे। इनमें लिखा था कि शिवराज सिंह चौहान, स्मृति ईरानी, संतोष बरकड़े और उमा भारती कौन हैं? पूरी खबर यहां पढ़ें…


