सरस्वती पूजा में मिट्टी की मूर्तियों की मांग घटी:POP मूर्तियों के बढ़ते चलन से पारंपरिक मूर्तिकार प्रभावित, कम दाम में जल्दी बनकर होता है तैयार

सरस्वती पूजा में मिट्टी की मूर्तियों की मांग घटी:POP मूर्तियों के बढ़ते चलन से पारंपरिक मूर्तिकार प्रभावित, कम दाम में जल्दी बनकर होता है तैयार

अररिया जिला में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर विद्या, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा पूरे उत्साह और श्रद्धा से की जाती है। हालांकि, इस वर्ष सरस्वती पूजा में मूर्तियों के चयन में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। पारंपरिक मिट्टी की मूर्तियों के बजाय अब प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी मूर्तियों की मांग बढ़ गई है। अररिया के चौक-चौराहे, गली-मोहल्लों और पंडालों में वर्षों से यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता रहा है। लोग पीले वस्त्र धारण कर, किताबें, कलम-दवात और वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं। POP मूर्तियों की चमकदार फिनिशिंग, बारीक नक्काशी और आकर्षक सुंदरता के कारण लोग इन्हें अधिक पसंद कर रहे हैं। इस बदलते रुझान से पारंपरिक मूर्तिकारों को भारी नुकसान हो रहा है, क्योंकि उनकी मांग लगातार घटती जा रही है। अररिया के ओम नगर और अररिया कॉलेज, एडीबी चौक जैसे इलाकों में हर साल परंपरागत मूर्तिकार आते हैं और हाथों से मिट्टी की मूर्तियां तैयार करते हैं। मूर्तिकार ने कला के बारे में बताया ओम नगर में मूर्ति निर्माण कर रहे अनुभवी मूर्तिकार नारायण पंडित ने अपनी कला के बारे में बताया। उनके अनुसार, मिट्टी की मूर्ति बनाना एक श्रमसाध्य कार्य है। इसमें सबसे पहले स्वच्छ दोमट मिट्टी को छानकर पानी मिलाया जाता है, फिर अच्छे से गूंथकर मुलायम बनाया जाता है। इसके बाद आधार संरचना, चेहरा, हाथ, वीणा, वस्त्र और बारीक विवरण उकेरे जाते हैं। मूर्ति को छाया में कई दिनों तक सुखाने के बाद प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है। POP की मूर्तियों की तरफ लोग आकर्षित नारायण पंडित ने बताया कि अब पहले जैसी मांग नहीं रही। उन्होंने कहा, ‘लोग POP की मूर्तियों की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं क्योंकि वे ज्यादा सुंदर और चमकदार दिखती हैं। साथ ही ये जल्दी बन जाती हैं और सस्ती भी पड़ती हैं।’ यह स्थिति पारंपरिक कला और कलाकारों के लिए चिंता का विषय बन गई है। अररिया जिला में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर विद्या, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा पूरे उत्साह और श्रद्धा से की जाती है। हालांकि, इस वर्ष सरस्वती पूजा में मूर्तियों के चयन में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। पारंपरिक मिट्टी की मूर्तियों के बजाय अब प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी मूर्तियों की मांग बढ़ गई है। अररिया के चौक-चौराहे, गली-मोहल्लों और पंडालों में वर्षों से यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता रहा है। लोग पीले वस्त्र धारण कर, किताबें, कलम-दवात और वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं। POP मूर्तियों की चमकदार फिनिशिंग, बारीक नक्काशी और आकर्षक सुंदरता के कारण लोग इन्हें अधिक पसंद कर रहे हैं। इस बदलते रुझान से पारंपरिक मूर्तिकारों को भारी नुकसान हो रहा है, क्योंकि उनकी मांग लगातार घटती जा रही है। अररिया के ओम नगर और अररिया कॉलेज, एडीबी चौक जैसे इलाकों में हर साल परंपरागत मूर्तिकार आते हैं और हाथों से मिट्टी की मूर्तियां तैयार करते हैं। मूर्तिकार ने कला के बारे में बताया ओम नगर में मूर्ति निर्माण कर रहे अनुभवी मूर्तिकार नारायण पंडित ने अपनी कला के बारे में बताया। उनके अनुसार, मिट्टी की मूर्ति बनाना एक श्रमसाध्य कार्य है। इसमें सबसे पहले स्वच्छ दोमट मिट्टी को छानकर पानी मिलाया जाता है, फिर अच्छे से गूंथकर मुलायम बनाया जाता है। इसके बाद आधार संरचना, चेहरा, हाथ, वीणा, वस्त्र और बारीक विवरण उकेरे जाते हैं। मूर्ति को छाया में कई दिनों तक सुखाने के बाद प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है। POP की मूर्तियों की तरफ लोग आकर्षित नारायण पंडित ने बताया कि अब पहले जैसी मांग नहीं रही। उन्होंने कहा, ‘लोग POP की मूर्तियों की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं क्योंकि वे ज्यादा सुंदर और चमकदार दिखती हैं। साथ ही ये जल्दी बन जाती हैं और सस्ती भी पड़ती हैं।’ यह स्थिति पारंपरिक कला और कलाकारों के लिए चिंता का विषय बन गई है।  

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