‘पापा ने समूह से कर्ज लिया था। हर महीने 17 हजार की किश्त देनी पड़ती थी। किश्त नहीं दे पा रहे थे, कर्ज बढ़ता जा रहा था। लोन चुकाने का इतना प्रेशर था कि पापा को काम के लिए गांव छोड़कर बाहर जाना ही पड़ा। हमें लगता था कि पापा कमाकर EMI चुका देंगे, कर्ज निपट जाएगा तो हमारे साथ आकर रहेंगे। फिर सब ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पापा कमाने गए थे, लेकिन उनकी मौत की खबर आई, फिर वे प्लास्टिक की पोटली में लिपटकर घर आए।’ ये बातें 18 साल की खुशबू कुमारी और 35 साल की कांति कुमारी ने कही। दरअसल, खुशबू के पिता सुंदर भुइयां और क्रांति के बड़े भाई विनय भुइयां समेत 6 लोगों की छत्तीसगढ़ में गुरुवार को स्टील प्लांट में हुए ब्लास्ट में जिंदा जलकर मौत हो गई। शुक्रवार शाम 4 बजे के बाद सभी 6 मृतकों की लाश गयाजी लाई गई। दैनिक भास्कर रिपोर्टर गयाजी मुख्यालय से 110 किलोमीटर दूर डुमरिया के गोटिबांध गांव पहुंचे और मृतकों के परिजन से बातचीत की। पढ़िए, पूरी रिपोर्ट… सबसे पहले घटना से जुड़ी ये 2 तस्वीरें देखिए अब सिलसिलेवार तरीके से जानिए, गांव में 6 शवों के पहुंचने पर क्या हुआ? डुमरिया थाना क्षेत्र के गोटिबांध गांव में एक साथ 6 मजदूरों की लाशें पहुंचने के साथ ही चीख-पुकार मच गई। घटना की सूचना के बाद आसपास के गांवों के लोगों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री और स्थानीय सांसद जीतन राम मांझी भी पहुंचे। गुरुवार को हुई घटना के बाद गोटिबांध गांव में 38 घंटे तक किसी घर में चूल्हा तक नहीं जला। हमने गांव के लोगों से बातचीत की। एक ग्रामीण ने कहा कि हमारे सांसद जीतन राम मांझी हैं, केंद्रीय मंत्री भी हैं, उन्हें गांव में आना ही चाहिए। मृतकों के परिवार से मिलकर उचित मुआवजा भी दिलवाना चाहिए। अगर हम जैसे गरीबों के लिए गांव में, शहर में कमाने की व्यवस्था हो तो बाहर क्यों जाएंगे। वोट उन्हें देते हैं, तो जवाबदेही भी उनकी है। हालांकि, जब ग्रामीण जब बातचीत कर रहे थे, तब तक जीतन राम मांझी नहीं आए थे, लेकिन कुछ देर बाद वे मृतकों के परिवार से मिलने पहुंच गए। किसी मजदूर पर 30 तो किसी पर 50 हजार रुपए का था कर्ज गांव के एक बुजुर्ग ने कहा कि गांव से 14 लोग कमाने गए थे। किसी पर 30 हजार रुपए तो किसी पर 50 हजार रुपए का कर्ज था। किसी ने समूह से लोन लिया था, तो किसी ने गांव के साहूकार से कर्ज उठाया था। कमाई थी नहीं, तो EMI नहीं चुका पाते थे। किश्त का दबाव इतना हो गया था कि मजदूरों का गांव में रहना मुश्किल हो गया था। गांव के लोगों ने मिलकर एक साथ बाहर जाने और कमाने का फैसला किया था। सभी रविवार को ये सोचकर निकले थे कि कुछ पैसे आएंगे तो कर्ज उतरेगा, घर संभलेगा। लेकिन कमाई तो दूर, जिंदगी ही छिन गई। 16 साल की बेटी बोली- पापा कमाने गए थे, अब उनकी लाश मिली मृतकों में शामिल 42 साल के बद्री भुइयां पहले कभी भी गांव से बाहर कमाने नहीं गए थे। बद्री 2 भाइयों में बड़े थे। पूरे घर की जिम्मेदारी उनके ऊपर ही थी। भतीजी की शादी करनी थी, लिहाजा उन्होंने पहली बार घर से बाहर जाकर कमाने का सोचा और रविवार को ही गांव के अन्य लोगों के साथ कमाने के लिए छत्तीसगढ़ चले गए। उनकी बेटी परतनिया ने बताया कि पापा को हालातों ने मजबूर कर दिया था। पापा कहकर गए थे कि इस बार बाहर से कमा कर आऊंगा तो भतीजी की शादी करेंगे। सब ठीक हो जाएगा, लेकिन अब… सब खत्म हो गया। पापा ही हमारे घर के मुखिया थे। चाचा के बच्चों और पूरे परिवार का खर्च वही उठाते थे, अब उनकी लाश लौट रही है। 40 साल के विनय मांझी की बेटी बोली- बहन की शादी के लिए पापा ने कर्ज लिया था 40 साल के विनय मांझी की बेटी अस्मिता कुमारी ने कहा, पापा ने बड़ी बहन की शादी के लिए कर्ज लिया था। कर्ज वाले रोज दबाव बनाते थे। कुछ दिन पहले ही पापा गांव के लोगों के साथ कमाने गए थे। हम लोगों को बिल्कुल नहीं पता था कि पापा अब नहीं लौटेंगे। अस्मिता ने कहा कि हम पांच बहन हैं, बड़ी की शादी हो गई है। अब हम 4 बहनों की कौन देखभाल करेगा, हमारा क्या होगा। गांव की महिलाएं बोलीं- यहां काम होता तो बाहर क्यों जाते गोटिबांध की महिलाओं ने कहा, अगर हमारे गांव, शहर में फैक्ट्री होती, रोजगार होता, तो हम लोगों के पति बाहर मरने क्यों जाते। उन्होंने कहा कि गांव में तो पीने का साफ पानी तक नहीं है। पानी के लिए भी दूसरों के दरवाजे तक जाना पड़ता है। गांव की महिलाओं ने यह भी कहा कि हकीकत ये है कि गांव में किसी के पास 10 कट्ठा जमीन भी नहीं है। खेती नाम मात्र की है। लोग दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण रोजाना अलग-अलग परेशानियों से जूझना पड़ता है। जीतन राम मांझी बोले- 20-20 लाख का मुआवजा दिलाएंगे मृतकों के परिजनों से मिलने केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी गोटिबांध पहुंचे। उन्होंने सभी मृतकों के घर जाकर परिजनों से बात की। हाल जाना। मांझी ने मृतक परिवार को तत्काल 10 हजार रुपए की सहायता दी। उन्होंने कहा कि स्टील प्लांट कंपनी की ओर से 20 लाख रुपए मुआवजा दिया जाएगा। इसके अलावा बिहार सरकार से 15 लाख रुपए प्रति मृतक दिलाने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि ये भी देखा जाएगा कि मजदूर किन हालात में बाहर काम करने गए थे। जब उनसे कर्ज के दबाव का सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस बात की भी जांच होगी कि ऐसी स्थिति क्यों बनी? पीने के पानी की कमी और समस्या को लेकर उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगर गांव में पानी की समस्या है तो 15 दिनों के भीतर ठोस व्यवस्था की जाएगी। भास्कर इनसाइट: माइक्रो फाइनेंस के कर्ज में जकड़ा गोटिबांध गांव गोटिबांध गांव के लोगों से बातचीत में पता चला कि गांव की असली पीड़ा माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से लिया जाने वाला कर्ज है, जिसमें अधिकतर मांझी परिवार फंसे हुए हैं। गांव में शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जिस पर किसी न किसी रूप में कर्ज का बोझ न हो। कभी बेटियों की शादी के नाम पर, तो कभी काम-धंधा शुरू करने के बहाने माइक्रो फाइनेंस कंपनियों और निजी साहूकारों ने गांव के गरीब परिवारों को कर्ज में धकेल दिया। शुरुआत छोटी रकम से होती है, लेकिन बाद में भारी ब्याज के साथ वसूली की जाती है। कई परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने स्वयं सहायता समूह से कर्ज ले रखा है। हर महीने तय किस्त नहीं दे पाने पर उन्हें मानसिक प्रताड़ना तक झेलनी पड़ती है। गांव के लोगों का कहना है कि कर्ज चुकाने का दबाव इतना बढ़ जाता है कि बाहर मजदूरी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यही मजबूरी इन मजदूरों को छत्तीसगढ़ जैसे दूरदराज इलाकों में ले गई। 850 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान की गर्म राख में जिंदा जले मजदूर भास्कर की पड़ताल में पता चला कि ब्लास्ट के वक्त डस्ट सेटलिंग चेंबर के भीतर लगभग 850 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान की गर्म राख को पोकिंग के माध्यम से नीचे गिराया जा रहा था। इसी दौरान 11 मजदूर गर्म राख की चपेट में आ गए। इनमें 6 मजदूर जिंदा जल गए। किल्न शटडाउन किए बिना ही मजदूरों को भेजा आयरन ओर को स्पंज आयरन बनाने की प्रक्रिया में कोल किल्न से निकलने वाली गर्म गैस और गर्म राख को DSC के जरिए आगे की पाइपलाइन में भेजा जाता है। DSC में माल जाम होने के कारण हैमरिंग (पोकिंग) की जा रही थी। यह बेहद जोखिम भरा काम था, लेकिन किल्न को शटडाउन किए बिना ही मजदूरों को अंदर भेज दिया गया। इसी दौरान अचानक जोरदार विस्फोट हुआ। DSC के भीतर गर्म ऐश मजदूरों के ऊपर गिर पड़ी। मजदूर पास में ही थे। उन्हें भागने तक का मौका नहीं मिला। ‘पापा ने समूह से कर्ज लिया था। हर महीने 17 हजार की किश्त देनी पड़ती थी। किश्त नहीं दे पा रहे थे, कर्ज बढ़ता जा रहा था। लोन चुकाने का इतना प्रेशर था कि पापा को काम के लिए गांव छोड़कर बाहर जाना ही पड़ा। हमें लगता था कि पापा कमाकर EMI चुका देंगे, कर्ज निपट जाएगा तो हमारे साथ आकर रहेंगे। फिर सब ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पापा कमाने गए थे, लेकिन उनकी मौत की खबर आई, फिर वे प्लास्टिक की पोटली में लिपटकर घर आए।’ ये बातें 18 साल की खुशबू कुमारी और 35 साल की कांति कुमारी ने कही। दरअसल, खुशबू के पिता सुंदर भुइयां और क्रांति के बड़े भाई विनय भुइयां समेत 6 लोगों की छत्तीसगढ़ में गुरुवार को स्टील प्लांट में हुए ब्लास्ट में जिंदा जलकर मौत हो गई। शुक्रवार शाम 4 बजे के बाद सभी 6 मृतकों की लाश गयाजी लाई गई। दैनिक भास्कर रिपोर्टर गयाजी मुख्यालय से 110 किलोमीटर दूर डुमरिया के गोटिबांध गांव पहुंचे और मृतकों के परिजन से बातचीत की। पढ़िए, पूरी रिपोर्ट… सबसे पहले घटना से जुड़ी ये 2 तस्वीरें देखिए अब सिलसिलेवार तरीके से जानिए, गांव में 6 शवों के पहुंचने पर क्या हुआ? डुमरिया थाना क्षेत्र के गोटिबांध गांव में एक साथ 6 मजदूरों की लाशें पहुंचने के साथ ही चीख-पुकार मच गई। घटना की सूचना के बाद आसपास के गांवों के लोगों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री और स्थानीय सांसद जीतन राम मांझी भी पहुंचे। गुरुवार को हुई घटना के बाद गोटिबांध गांव में 38 घंटे तक किसी घर में चूल्हा तक नहीं जला। हमने गांव के लोगों से बातचीत की। एक ग्रामीण ने कहा कि हमारे सांसद जीतन राम मांझी हैं, केंद्रीय मंत्री भी हैं, उन्हें गांव में आना ही चाहिए। मृतकों के परिवार से मिलकर उचित मुआवजा भी दिलवाना चाहिए। अगर हम जैसे गरीबों के लिए गांव में, शहर में कमाने की व्यवस्था हो तो बाहर क्यों जाएंगे। वोट उन्हें देते हैं, तो जवाबदेही भी उनकी है। हालांकि, जब ग्रामीण जब बातचीत कर रहे थे, तब तक जीतन राम मांझी नहीं आए थे, लेकिन कुछ देर बाद वे मृतकों के परिवार से मिलने पहुंच गए। किसी मजदूर पर 30 तो किसी पर 50 हजार रुपए का था कर्ज गांव के एक बुजुर्ग ने कहा कि गांव से 14 लोग कमाने गए थे। किसी पर 30 हजार रुपए तो किसी पर 50 हजार रुपए का कर्ज था। किसी ने समूह से लोन लिया था, तो किसी ने गांव के साहूकार से कर्ज उठाया था। कमाई थी नहीं, तो EMI नहीं चुका पाते थे। किश्त का दबाव इतना हो गया था कि मजदूरों का गांव में रहना मुश्किल हो गया था। गांव के लोगों ने मिलकर एक साथ बाहर जाने और कमाने का फैसला किया था। सभी रविवार को ये सोचकर निकले थे कि कुछ पैसे आएंगे तो कर्ज उतरेगा, घर संभलेगा। लेकिन कमाई तो दूर, जिंदगी ही छिन गई। 16 साल की बेटी बोली- पापा कमाने गए थे, अब उनकी लाश मिली मृतकों में शामिल 42 साल के बद्री भुइयां पहले कभी भी गांव से बाहर कमाने नहीं गए थे। बद्री 2 भाइयों में बड़े थे। पूरे घर की जिम्मेदारी उनके ऊपर ही थी। भतीजी की शादी करनी थी, लिहाजा उन्होंने पहली बार घर से बाहर जाकर कमाने का सोचा और रविवार को ही गांव के अन्य लोगों के साथ कमाने के लिए छत्तीसगढ़ चले गए। उनकी बेटी परतनिया ने बताया कि पापा को हालातों ने मजबूर कर दिया था। पापा कहकर गए थे कि इस बार बाहर से कमा कर आऊंगा तो भतीजी की शादी करेंगे। सब ठीक हो जाएगा, लेकिन अब… सब खत्म हो गया। पापा ही हमारे घर के मुखिया थे। चाचा के बच्चों और पूरे परिवार का खर्च वही उठाते थे, अब उनकी लाश लौट रही है। 40 साल के विनय मांझी की बेटी बोली- बहन की शादी के लिए पापा ने कर्ज लिया था 40 साल के विनय मांझी की बेटी अस्मिता कुमारी ने कहा, पापा ने बड़ी बहन की शादी के लिए कर्ज लिया था। कर्ज वाले रोज दबाव बनाते थे। कुछ दिन पहले ही पापा गांव के लोगों के साथ कमाने गए थे। हम लोगों को बिल्कुल नहीं पता था कि पापा अब नहीं लौटेंगे। अस्मिता ने कहा कि हम पांच बहन हैं, बड़ी की शादी हो गई है। अब हम 4 बहनों की कौन देखभाल करेगा, हमारा क्या होगा। गांव की महिलाएं बोलीं- यहां काम होता तो बाहर क्यों जाते गोटिबांध की महिलाओं ने कहा, अगर हमारे गांव, शहर में फैक्ट्री होती, रोजगार होता, तो हम लोगों के पति बाहर मरने क्यों जाते। उन्होंने कहा कि गांव में तो पीने का साफ पानी तक नहीं है। पानी के लिए भी दूसरों के दरवाजे तक जाना पड़ता है। गांव की महिलाओं ने यह भी कहा कि हकीकत ये है कि गांव में किसी के पास 10 कट्ठा जमीन भी नहीं है। खेती नाम मात्र की है। लोग दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण रोजाना अलग-अलग परेशानियों से जूझना पड़ता है। जीतन राम मांझी बोले- 20-20 लाख का मुआवजा दिलाएंगे मृतकों के परिजनों से मिलने केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी गोटिबांध पहुंचे। उन्होंने सभी मृतकों के घर जाकर परिजनों से बात की। हाल जाना। मांझी ने मृतक परिवार को तत्काल 10 हजार रुपए की सहायता दी। उन्होंने कहा कि स्टील प्लांट कंपनी की ओर से 20 लाख रुपए मुआवजा दिया जाएगा। इसके अलावा बिहार सरकार से 15 लाख रुपए प्रति मृतक दिलाने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि ये भी देखा जाएगा कि मजदूर किन हालात में बाहर काम करने गए थे। जब उनसे कर्ज के दबाव का सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस बात की भी जांच होगी कि ऐसी स्थिति क्यों बनी? पीने के पानी की कमी और समस्या को लेकर उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगर गांव में पानी की समस्या है तो 15 दिनों के भीतर ठोस व्यवस्था की जाएगी। भास्कर इनसाइट: माइक्रो फाइनेंस के कर्ज में जकड़ा गोटिबांध गांव गोटिबांध गांव के लोगों से बातचीत में पता चला कि गांव की असली पीड़ा माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से लिया जाने वाला कर्ज है, जिसमें अधिकतर मांझी परिवार फंसे हुए हैं। गांव में शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जिस पर किसी न किसी रूप में कर्ज का बोझ न हो। कभी बेटियों की शादी के नाम पर, तो कभी काम-धंधा शुरू करने के बहाने माइक्रो फाइनेंस कंपनियों और निजी साहूकारों ने गांव के गरीब परिवारों को कर्ज में धकेल दिया। शुरुआत छोटी रकम से होती है, लेकिन बाद में भारी ब्याज के साथ वसूली की जाती है। कई परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने स्वयं सहायता समूह से कर्ज ले रखा है। हर महीने तय किस्त नहीं दे पाने पर उन्हें मानसिक प्रताड़ना तक झेलनी पड़ती है। गांव के लोगों का कहना है कि कर्ज चुकाने का दबाव इतना बढ़ जाता है कि बाहर मजदूरी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यही मजबूरी इन मजदूरों को छत्तीसगढ़ जैसे दूरदराज इलाकों में ले गई। 850 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान की गर्म राख में जिंदा जले मजदूर भास्कर की पड़ताल में पता चला कि ब्लास्ट के वक्त डस्ट सेटलिंग चेंबर के भीतर लगभग 850 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान की गर्म राख को पोकिंग के माध्यम से नीचे गिराया जा रहा था। इसी दौरान 11 मजदूर गर्म राख की चपेट में आ गए। इनमें 6 मजदूर जिंदा जल गए। किल्न शटडाउन किए बिना ही मजदूरों को भेजा आयरन ओर को स्पंज आयरन बनाने की प्रक्रिया में कोल किल्न से निकलने वाली गर्म गैस और गर्म राख को DSC के जरिए आगे की पाइपलाइन में भेजा जाता है। DSC में माल जाम होने के कारण हैमरिंग (पोकिंग) की जा रही थी। यह बेहद जोखिम भरा काम था, लेकिन किल्न को शटडाउन किए बिना ही मजदूरों को अंदर भेज दिया गया। इसी दौरान अचानक जोरदार विस्फोट हुआ। DSC के भीतर गर्म ऐश मजदूरों के ऊपर गिर पड़ी। मजदूर पास में ही थे। उन्हें भागने तक का मौका नहीं मिला।


