चीन के नए जातीय एकता कानून पर छिड़ा विवाद, अल्पसंख्यक समुदायों को दबाने की साजिश

चीन के नए जातीय एकता कानून पर छिड़ा विवाद, अल्पसंख्यक समुदायों को दबाने की साजिश

चीन (China) जल्द ही एक नया कानून लाने वाला है जिसे जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून कहा जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह कानून देश में एकता और आधुनिकता को मज़बूत करेगा, लेकिन मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इससे चीन अपनी जातीय अल्पसंख्यकों की पहचान और संस्कृति को और कमजोर करना चाहता है।

छिड़ गया विवाद

चीन के इस नए जातीय एकता कानून पर विवाद छिड़ गया है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस कानून के ज़रिए चीन की सरकार देश में अल्पसंख्यक समुदायों को दबाने की साजिश कर रही है और इसी वजह से इसका विरोध हो रहा है।

चीन में कैसी है जातीय स्थिति?

चीन में आधिकारिक तौर पर 55 जातीय अल्पसंख्यक समुदाय हैं, जबकि बहुसंख्यक आबादी हान चाइनीज़ है, जो कुल जनसंख्या के लगभग 90% से भी ज़्यादा है। अल्पसंख्यकों में उइगर मुस्लिम, तिब्बती और मंगोल जैसे समुदाय शामिल हैं। इनकी अपनी अपनी भाषा और संस्कृति हैं। ये समुदाय चीन के सीमावर्ती और संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में जैसे- शिनजियांग, तिब्बत और इनर मंगोलिया में रहते हैं।

नए कानून में क्या प्रावधान होंगे?

चीन में नए जातीय एकता कानून के तहत पढ़ाई के लिए मंदारिन को प्राथमिक भाषा बनाया जाएगा। आलोचकों का कहना है कि इससे उइगर, तिब्बती और मंगोल जैसी भाषाओं का इस्तेमाल सीमित हो जाएगा। धर्म या जातीय पहचान के आधार पर विवाह में बाधा डालने की अनुमति नहीं होगी। इससे हान चाइनीज़ और अल्पसंख्यक समुदायों में शादी को बढ़ावा मिलेगा। बच्चों को कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम करना सिखाना होगा। जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने वाली हर गतिविधि पर रोक लगाई जाएगी।

आखिर क्या चाहते हैं जिनपिंग?

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) लंबे समय से ‘चीनीकरण’ की नीति पर जोर देते रहे हैं। इसका मतलब है कि धर्म और सांस्कृतिक परंपराएं कम्युनिस्ट पार्टी की नज़र में चीन के मूल्यों के अनुरूप हों। नया कानून इसी नीति को और मज़बूत करेगा। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि नया कानून एक कानूनी दस्तावेज से ज्यादा एक वैचारिक घोषणा है।

कैसी है चीन में अल्पसंख्यकों की स्थिति?

चीन में अल्पसंख्यकों की स्थिति अच्छी नहीं है। उइगर मुस्लिमों के खिलाफ अत्याचार के आरोप अक्सर ही लगते रहे हैं। तिब्बत में भी मठों और धार्मिक संस्थानों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण है। बौद्ध धर्म की शिक्षा लेने की इजाजत नहीं है। मंगोलियाई भाषा की पढ़ाई पर प्रतिबंधों को लेकर भी अक्सर ही विरोध होता रहा है।

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