बसंत बहार कार्यशाला में लोक संस्कृति का संगम:प्रतिभागियों ने देशभक्ति, पारंपरिक लोकगीतों का अभ्यास किया

बसंत बहार कार्यशाला में लोक संस्कृति का संगम:प्रतिभागियों ने देशभक्ति, पारंपरिक लोकगीतों का अभ्यास किया

गौरैया संस्कृति संस्थान द्वारा आयोजित बसंत बहार कार्यशाला अपने सातवें दिन लोकसंस्कृति के विविध रंगों के साथ आगे बढ़ी। इस दिन प्रतिभागियों को तीन भिन्न प्रकार के लोकगीतों का अभ्यास कराया गया। गीतों के माध्यम से ऋतु बसंत, भारतीय परंपरा और राष्ट्रभक्ति की भावना को सजीव किया। आगामी 26 जनवरी को ध्यान में रखते हुए कार्यशाला में सुराजी गीत के अंतर्गत राष्ट्रभक्ति गीत ‘देसवा आपन ह बचइबे सब जतनिया कइके ना’सिखाया गया। इस गीत के जरिए देश के प्रति समर्पण, एकता और जिम्मेदारी का भाव उभरकर सामने आया। प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह के साथ गीत की भाव-भंगिमाओं और सुरों का अभ्यास किया। पारंपरिक लोकगीत सिखाया गया इसके साथ ही शिव विवाह से जुड़ा पारंपरिक लोकगीत भी सिखाया गया।’चलै महादेव गौरा बियाहन, आज हमका दिहू वरदान चलो री गुइयां’ जैसे गीतों में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दी। वहीं राज जनक के प्रसंगों पर आधारित गीत ‘राज जनक जी के… गंगा नहाए’, ‘सखि छोटी ननद बेंदे पे अंगी’ और ‘गोकुल में बाजेला बधइया’ का अभ्यास कराते हुए लोक परंपराओं की गहराई से जानकारी दी गई। 30 प्रतिभागी नियमित रूप से गीत सीख रहे संस्थान की उपाध्याय आभा शुक्ला ने बताया कि कार्यशाला में अल्पना श्रीवास्तव, नीलम तिवारी, माधुरी सिंह, प्रतिमा त्रिपाठी, रीना सिंह, शशि सिंह, अवनीश शुक्ला, अमिता, निकिता, सुषमा, कविता सहित अनेक महिलाएं ऑफलाइन और ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता कर रही हैं।वर्तमान में लगभग 30 प्रतिभागी नियमित रूप से गीत सीख रहे हैं।ढोलक पर छवि प्रकाश और हारमोनियम पर आकाश तिवारी ने संगत देकर अभ्यास को प्रभावशाली बनाया।

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