किशनगंज के पोठिया प्रखंड में बाल विकास परियोजना (CDPO) के अतिरिक्त प्रभार को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बड़ा टकराव सामने आया है। जिलाधिकारी विशाल राज ने कोचाधामन के CDPO नागेंद्र कुमार को पोठिया प्रोजेक्ट के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर दिया था। हालांकि, पूर्णिया प्रमंडल के आयुक्त कार्यालय ने एक दिन बाद ही इस फैसले को पलटते हुए उन्हें ही प्रभार सौंपने का निर्देश जारी कर दिया। यह मामला तब शुरू हुआ जब पोठिया प्रखंड में आंगनबाड़ी सेविकाओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने CDPO नागेंद्र कुमार के खिलाफ लगातार शिकायतें कीं। उन पर सेविकाओं से अमर्यादित व्यवहार करने, पंचायत समिति की बैठकों में अनुपस्थित रहने, कर्तव्यहीनता बरतने, आंगनबाड़ी केंद्रों का निरीक्षण न करने और विभागीय कार्यों में लापरवाही बरतने के आरोप थे। कुछ रिपोर्टों में अवैध उगाही और धमकी जैसे गंभीर आरोप भी लगे थे। CDPO कुमारी रेखा को सौंपी गई जिम्मेदारी इन शिकायतों को किशनगंज सदर विधायक कमरुल होदा ने गंभीरता से लिया। उन्होंने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा और स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन भी हुए। विधायक की पहल और जनता की मांग पर जिलाधिकारी विशाल राज ने 6 फरवरी 2026 को आदेश संख्या 138 जारी किया। इस आदेश में नागेंद्र कुमार को पोठिया के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर बहादुरगंज की CDPO कुमारी रेखा-2 को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रभारी DPO अनीता कुमारी-2 ने 7 फरवरी को ही रेखा को प्रभार ग्रहण करने का निर्देश दिया था। लेकिन इसी दिन, 7 फरवरी को, पूर्णिया प्रमंडल आयुक्त कार्यालय से एक पत्र जारी हुआ। प्रशासनिक अराजकता फैलने की दी चेतावनी इस पत्र में समाज कल्याण विभाग की अधिसूचना संख्या 5101 (दिनांक 30.06.2025) का हवाला दिया गया, जिसमें नागेंद्र कुमार को ही पोठिया का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। आयुक्त ने जिलाधिकारी के आदेश को अवैध बताते हुए नागेंद्र कुमार को प्रभार वापस सौंपने का निर्देश दिया। आयुक्त कार्यालय ने विभागीय नियमों की अनदेखी से प्रशासनिक अराजकता फैलने की चेतावनी भी दी। इस घटना ने सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की सरकारी नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटनाक्रम प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा रहा है। एक तरफ डीएम ने जनता की शिकायतों और विधायक के हस्तक्षेप पर सख्त कदम उठाया, तो दूसरी ओर ऊपरी स्तर से फैसला पलट दिया गया। आलोचक इसे भ्रष्टाचार का संरक्षण बता रहे हैं, जबकि सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को खोखला करार दे रहे हैं। विधायक कमरुल होदा ने विधानसभा में भी इस मुद्दे को उठाया, सिस्टम की सड़ी-गली हकीकत को उजागर किया। यह मामला बिहार में सुशासन की असल तस्वीर पेश करता है जहां निचले स्तर पर कार्रवाई होती है, लेकिन ऊपरी स्तर से संरक्षण मिल जाता है। आम आदमी के लिए यह बड़ा धोखा है। विभागीय जांच और अंतिम फैसले का इंतजार है, लेकिन फिलहाल प्रशासनिक टकराव जारी है। किशनगंज के पोठिया प्रखंड में बाल विकास परियोजना (CDPO) के अतिरिक्त प्रभार को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बड़ा टकराव सामने आया है। जिलाधिकारी विशाल राज ने कोचाधामन के CDPO नागेंद्र कुमार को पोठिया प्रोजेक्ट के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर दिया था। हालांकि, पूर्णिया प्रमंडल के आयुक्त कार्यालय ने एक दिन बाद ही इस फैसले को पलटते हुए उन्हें ही प्रभार सौंपने का निर्देश जारी कर दिया। यह मामला तब शुरू हुआ जब पोठिया प्रखंड में आंगनबाड़ी सेविकाओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने CDPO नागेंद्र कुमार के खिलाफ लगातार शिकायतें कीं। उन पर सेविकाओं से अमर्यादित व्यवहार करने, पंचायत समिति की बैठकों में अनुपस्थित रहने, कर्तव्यहीनता बरतने, आंगनबाड़ी केंद्रों का निरीक्षण न करने और विभागीय कार्यों में लापरवाही बरतने के आरोप थे। कुछ रिपोर्टों में अवैध उगाही और धमकी जैसे गंभीर आरोप भी लगे थे। CDPO कुमारी रेखा को सौंपी गई जिम्मेदारी इन शिकायतों को किशनगंज सदर विधायक कमरुल होदा ने गंभीरता से लिया। उन्होंने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा और स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन भी हुए। विधायक की पहल और जनता की मांग पर जिलाधिकारी विशाल राज ने 6 फरवरी 2026 को आदेश संख्या 138 जारी किया। इस आदेश में नागेंद्र कुमार को पोठिया के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर बहादुरगंज की CDPO कुमारी रेखा-2 को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रभारी DPO अनीता कुमारी-2 ने 7 फरवरी को ही रेखा को प्रभार ग्रहण करने का निर्देश दिया था। लेकिन इसी दिन, 7 फरवरी को, पूर्णिया प्रमंडल आयुक्त कार्यालय से एक पत्र जारी हुआ। प्रशासनिक अराजकता फैलने की दी चेतावनी इस पत्र में समाज कल्याण विभाग की अधिसूचना संख्या 5101 (दिनांक 30.06.2025) का हवाला दिया गया, जिसमें नागेंद्र कुमार को ही पोठिया का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। आयुक्त ने जिलाधिकारी के आदेश को अवैध बताते हुए नागेंद्र कुमार को प्रभार वापस सौंपने का निर्देश दिया। आयुक्त कार्यालय ने विभागीय नियमों की अनदेखी से प्रशासनिक अराजकता फैलने की चेतावनी भी दी। इस घटना ने सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की सरकारी नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटनाक्रम प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा रहा है। एक तरफ डीएम ने जनता की शिकायतों और विधायक के हस्तक्षेप पर सख्त कदम उठाया, तो दूसरी ओर ऊपरी स्तर से फैसला पलट दिया गया। आलोचक इसे भ्रष्टाचार का संरक्षण बता रहे हैं, जबकि सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को खोखला करार दे रहे हैं। विधायक कमरुल होदा ने विधानसभा में भी इस मुद्दे को उठाया, सिस्टम की सड़ी-गली हकीकत को उजागर किया। यह मामला बिहार में सुशासन की असल तस्वीर पेश करता है जहां निचले स्तर पर कार्रवाई होती है, लेकिन ऊपरी स्तर से संरक्षण मिल जाता है। आम आदमी के लिए यह बड़ा धोखा है। विभागीय जांच और अंतिम फैसले का इंतजार है, लेकिन फिलहाल प्रशासनिक टकराव जारी है।


