उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम् और सफ़र फाउण्डेशन के सहयोग से आयोजित पंद्रह दिवसीय संस्कृत नाट्य कार्यशाला का सोमवार को समापन हो गया। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, गोमती नगर के प्रेक्षागृह में महाकवि भास द्वारा रचित कालजयी संस्कृत नाटक ‘दूतवाक्यम्’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। कार्यक्रम में संस्कृत रंगमंच की शास्त्रीय गरिमा, सशक्त अभिनय और प्रभावी संवादों ने दर्शकों को महाभारत काल की कुरु सभा का अनुभव कराया। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को संस्कृत उच्चारण और अभिनय पर विशेष प्रशिक्षण दिया गया। संस्कृत अध्यापिका डॉ. ममता पाण्डेय ने शुद्ध उच्चारण, शब्द-ज्ञान और भाषा की बारीकियों पर मार्गदर्शन किया। भगवान श्रीकृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे कार्यशाला के प्रशिक्षक संजय त्रिपाठी थे, जबकि मोहम्मद अनवर बेग ने नाटक का निर्देशन किया। उनके निर्देशन में शास्त्रीय परंपरा और आधुनिक रंगदृष्टि का संतुलित समन्वय देखने को मिला। नाटक ‘दूतवाक्यम्’ महाभारत के एक मार्मिक प्रसंग पर आधारित है। इसमें पांडवों द्वारा वनवास और अज्ञातवास पूरा करने के बाद इंद्रप्रस्थ लौटने और कौरवों से आधे राज्य की मांग करने का वर्णन है। दुर्योधन के इनकार के बाद, भगवान श्रीकृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचते हैं। दुर्योधन ने सुई की नोक बराबर भूमि देने से मना किया सभा में उनकी पहले आधे राज्य और फिर पांच गांवों की मांग भी ठुकरा दी जाती है। अहंकार में डूबे दुर्योधन द्वारा सुई की नोक बराबर भूमि भी देने से मना करने का दृश्य दर्शकों के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली रहा।इसके बाद, कृष्ण के विराट रूप और सुदर्शन चक्र के प्रकट होने का दृश्य तालियों की गड़गड़ाहट के साथ प्रस्तुत किया गया। नाटक का समापन धृतराष्ट्र की क्षमा याचना और धर्म की विजय के संदेश के साथ हुआ। मंच सज्जा, प्रभावशाली प्रकाश व्यवस्था, संगीत और नेपथ्य संयोजन ने कुरु सभा का सजीव वातावरण निर्मित किया, जिससे प्रस्तुति और भी यादगार बन गई।अभिषेक कुमार सिंह, मनोज तिवारी, पीयूष पाण्डेय, सुरेश प्रसाद श्रीवास्तव, संजय शर्मा, तरुण यादव, सूरज कुमार, समीर कुमार बागची, संतोष कुमार प्रजापति, कृष्ण कुमार पाण्डेय, उन्नति बहादुर सिंह, देश दीपक त्रिपाठी, मौसमी गुप्ता और संतोषी सहित पूरे तकनीकी दल ने समर्पण के साथ अभिनय किया और प्रस्तुति में सहयोग दिया।


