मधुबनी टाउन क्लब मैदान में आयोजित मिथिलांचल हरि नाम संत सम्मेलन का 82वां अधिवेशन रविवार को श्रद्धा और भक्ति के माहौल में संपन्न हो गया। सम्मेलन के अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिनमें महिला श्रद्धालुओं की भागीदारी विशेष रूप से अधिक रही। पूरे दिन संतों के प्रवचन, भजन और धार्मिक चर्चा का सिलसिला चलता रहा। अयोध्या स्थित श्रीराम कथा कुंज के महंत आचार्य श्रीरामानंद दास जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि “ममता केहीकर जश्नन नसावा”, अर्थात स्वार्थ ही व्यक्ति के यश को नष्ट कर देता है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने स्वार्थ में डूब जाता है, तब उसका वर्षों से अर्जित सम्मान भी क्षण भर में समाप्त हो सकता है। गांधारी और कैकेयी के उदाहरण से समझाया संदेश महाराज ने अपने प्रवचन में गांधारी और कैकेयी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधारी ने स्वार्थवश अपने पुत्र दुर्योधन को नग्न खड़ा होने को कहा था, ताकि उसका शरीर वज्र के समान हो जाए। वहीं कैकेयी मोह में पड़कर अपने पुत्र भरत को अधर्म का साथ देते हुए अयोध्या का राजा बनाना चाहती थीं। संत स्वभाव के कारण भरत पर नहीं पड़ा मोह का प्रभाव उन्होंने कहा कि भरत संत स्वभाव के थे, इसलिए कैकेयी के मोह का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत दुर्योधन दुष्ट प्रवृत्ति का था, जिस पर गांधारी के स्वार्थ का प्रभाव पड़ा। जब धर्म की बात आई तो गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली, जबकि कैकेयी का प्रयास भी एक संत के कारण विफल हो गया। स्वार्थ से ऊपर उठकर त्याग की भावना अपनाने का आह्वान आचार्य श्रीरामानंद दास जी ने कहा कि आज के समाज में भी स्वार्थ के कारण व्यक्ति का यश और सम्मान नष्ट हो जाता है। उन्होंने लोगों से त्याग की भावना विकसित करने और स्वार्थ से ऊपर उठने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रभु श्री सीताराम के चरणों में शरणागत होकर और प्रतिदिन श्रीरामचरित मानस का पाठ करने से ही जीवन में सच्चा यश और कीर्ति प्राप्त हो सकती है। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे संतों ने दिए प्रवचन सम्मेलन के मंच का संचालन सिमरिया के तुलसीपीठाधीश्वर विष्णुदेवाचार्य बाल व्यास जी महाराज कर रहे थे। इस दौरान ओडिशा के उत्कल पीठाधीश्वर जगतगुरु रामप्रिय दास, वाराणसी के डॉ. जनार्दन दीक्षित, अयोध्या के लवकुश शास्त्री, मध्य प्रदेश के ओरछा की मानस मोहिनी संध्या दीदी और वृंदावन के गोपी रमण दास सहित कई संतों ने अपने प्रवचन से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया। सम्मेलन में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद इस अवसर पर संत सम्मेलन के प्रबंध सचिव विनय कुमार वर्मा, रामनाथ ठाकुर, आनंद उर्फ डब्लू जी सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। सम्मेलन के समापन पर श्रद्धालुओं ने संतों का आशीर्वाद लिया और पूरे आयोजन के लिए आयोजकों की सराहना की। मधुबनी टाउन क्लब मैदान में आयोजित मिथिलांचल हरि नाम संत सम्मेलन का 82वां अधिवेशन रविवार को श्रद्धा और भक्ति के माहौल में संपन्न हो गया। सम्मेलन के अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिनमें महिला श्रद्धालुओं की भागीदारी विशेष रूप से अधिक रही। पूरे दिन संतों के प्रवचन, भजन और धार्मिक चर्चा का सिलसिला चलता रहा। अयोध्या स्थित श्रीराम कथा कुंज के महंत आचार्य श्रीरामानंद दास जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि “ममता केहीकर जश्नन नसावा”, अर्थात स्वार्थ ही व्यक्ति के यश को नष्ट कर देता है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने स्वार्थ में डूब जाता है, तब उसका वर्षों से अर्जित सम्मान भी क्षण भर में समाप्त हो सकता है। गांधारी और कैकेयी के उदाहरण से समझाया संदेश महाराज ने अपने प्रवचन में गांधारी और कैकेयी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधारी ने स्वार्थवश अपने पुत्र दुर्योधन को नग्न खड़ा होने को कहा था, ताकि उसका शरीर वज्र के समान हो जाए। वहीं कैकेयी मोह में पड़कर अपने पुत्र भरत को अधर्म का साथ देते हुए अयोध्या का राजा बनाना चाहती थीं। संत स्वभाव के कारण भरत पर नहीं पड़ा मोह का प्रभाव उन्होंने कहा कि भरत संत स्वभाव के थे, इसलिए कैकेयी के मोह का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत दुर्योधन दुष्ट प्रवृत्ति का था, जिस पर गांधारी के स्वार्थ का प्रभाव पड़ा। जब धर्म की बात आई तो गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली, जबकि कैकेयी का प्रयास भी एक संत के कारण विफल हो गया। स्वार्थ से ऊपर उठकर त्याग की भावना अपनाने का आह्वान आचार्य श्रीरामानंद दास जी ने कहा कि आज के समाज में भी स्वार्थ के कारण व्यक्ति का यश और सम्मान नष्ट हो जाता है। उन्होंने लोगों से त्याग की भावना विकसित करने और स्वार्थ से ऊपर उठने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रभु श्री सीताराम के चरणों में शरणागत होकर और प्रतिदिन श्रीरामचरित मानस का पाठ करने से ही जीवन में सच्चा यश और कीर्ति प्राप्त हो सकती है। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे संतों ने दिए प्रवचन सम्मेलन के मंच का संचालन सिमरिया के तुलसीपीठाधीश्वर विष्णुदेवाचार्य बाल व्यास जी महाराज कर रहे थे। इस दौरान ओडिशा के उत्कल पीठाधीश्वर जगतगुरु रामप्रिय दास, वाराणसी के डॉ. जनार्दन दीक्षित, अयोध्या के लवकुश शास्त्री, मध्य प्रदेश के ओरछा की मानस मोहिनी संध्या दीदी और वृंदावन के गोपी रमण दास सहित कई संतों ने अपने प्रवचन से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया। सम्मेलन में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद इस अवसर पर संत सम्मेलन के प्रबंध सचिव विनय कुमार वर्मा, रामनाथ ठाकुर, आनंद उर्फ डब्लू जी सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। सम्मेलन के समापन पर श्रद्धालुओं ने संतों का आशीर्वाद लिया और पूरे आयोजन के लिए आयोजकों की सराहना की।


