बेगूसराय के फुटपाथी दुकानों तक युद्ध की मार:कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिल रहा, दुकानदार कोयले के चूल्हे पर लौटे, कहा- मेहनत ज्यादा लग रही

बेगूसराय के फुटपाथी दुकानों तक युद्ध की मार:कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिल रहा, दुकानदार कोयले के चूल्हे पर लौटे, कहा- मेहनत ज्यादा लग रही

​खाड़ी देशों में युद्ध जारी है। इसकी गूंज अब बेगूसराय की गलियों और ठेलों पर सुनाई देने लगी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति में आई समस्या का सीधा असर स्थानीय बाजार पर पड़ा है। कमर्शियल गैस सिलेंडरों की किल्लत का सबसे बड़ा खामियाजा उन छोटे फुटकर दुकानदारों को भुगतना पड़ रहा है, जिनका गुजारा रोज की कमाई पर निर्भर है। ​सिलेंडर के लिए परेशानी ​बेगूसराय के चौक-चौराहों पर ठेला लगाकर चाट, समोसे, लिट्टी-चोखा और ब्रेड पकोड़ा बेचने वाले दुकानदार अब असहाय महसूस कर रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने कमर्शियल गैस सिलेंडर के लिए कई एजेंसियों के चक्कर काटे, लेकिन हर जगह से उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा। सप्लाई बाधित होने के कारण सिलेंडर की कालाबाजारी की भी खबरें आ रही हैं, जो इन छोटे व्यापारियों की पहुंच से बाहर है। ​मजबूरी में अपनाया देसी जुगाड़ ​कमर्शियल गैस नहीं मिलने के कारण दुकानदारी ठप होने की कगार पर पहुंच गई थी। ऐसे में अपनी आजीविका बचाने के लिए बेगूसराय के दुकानदारों ने अब पारंपरिक रास्तों की ओर रुख किया है। फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले कई दुकानदार अब खुद से मिट्टी और लोहे की ड्रम की मदद से कोयला जलाने वाला चूल्हा (भट्टी) बना रहे हैं। बढ़ सकती है कोयले की कीमत ​दुकानदारों का कहना है कि गैस चूल्हे पर काम करना आसान और स्वच्छ था, लेकिन अब मजबूरी में उन्हें फिर से धुएं और गर्मी के बीच कोयले की भट्टी पर काम करना पड़ रहा है। कोयले का चूल्हा बनाने में भी लागत आ रही है और ऐसे में अब कोयले की कीमतों में भी उछाल जरूर आएगा। इसके बावजूद, सिलेंडर की अनिश्चितता से बेहतर उन्होंने कोयले को ही विकल्प माना है। ​दुकानदारों को दो घंटे की अतिरिक्त मेहनत ​फुटपाथ दुकानदार अवधेश कुमार ब्रेड पकोड़ा और समोसे बेचते हैं। वह बताते हैं कि गैस की किल्लत ने उनकी दिनचर्या बदल दी है। पहले गैस चूल्हा जलाते ही काम शुरू हो जाता था। अब हमें दो घंटा पहले आकर कोयला सुलगाना पड़ता है। भट्टी तैयार करने में काफी समय और मेहनत लगती है। धुएं से आंखों में जलन होती है और गर्मी भी ज्यादा लगती है, लेकिन पेट पालने के लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। ​व्यापार पर पड़ा बुरा असर ​गैस की कमी और कोयले के इस्तेमाल से न केवल मेहनत बढ़ी है, बल्कि ग्राहकों को परोसे जाने वाले सामान की गति भी धीमी हो गई है। कोयले की आंच को नियंत्रित करना गैस के मुकाबले कठिन होता है, जिससे सामान तैयार होने में देरी होती है। भट्टी तैयार करने और कोयला सुलगाने में रोजाना 2 घंटे अधिक समय देना पड़ रहा है। धुएं के बीच काम करने से स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ेगा। बुझ सकता है परिवार का चूल्हा ​बेगूसराय की सड़कों पर बढ़ते कोयले के धुएं इस बात का प्रमाण हैं कि वैश्विक घटनाओं का असर धरातल पर कितनी जल्दी और गहराई से पड़ता है। गैस कंपनी और स्थानीय गैस एजेंसियों की चुप्पी ने इन छोटे दुकानदारों की परेशानी को और बढ़ा दिया है। यदि जल्द ही कमर्शियल गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो कई परिवारों का चूल्हा बुझने की नौबत आ सकती है। ​खाड़ी देशों में युद्ध जारी है। इसकी गूंज अब बेगूसराय की गलियों और ठेलों पर सुनाई देने लगी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति में आई समस्या का सीधा असर स्थानीय बाजार पर पड़ा है। कमर्शियल गैस सिलेंडरों की किल्लत का सबसे बड़ा खामियाजा उन छोटे फुटकर दुकानदारों को भुगतना पड़ रहा है, जिनका गुजारा रोज की कमाई पर निर्भर है। ​सिलेंडर के लिए परेशानी ​बेगूसराय के चौक-चौराहों पर ठेला लगाकर चाट, समोसे, लिट्टी-चोखा और ब्रेड पकोड़ा बेचने वाले दुकानदार अब असहाय महसूस कर रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने कमर्शियल गैस सिलेंडर के लिए कई एजेंसियों के चक्कर काटे, लेकिन हर जगह से उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा। सप्लाई बाधित होने के कारण सिलेंडर की कालाबाजारी की भी खबरें आ रही हैं, जो इन छोटे व्यापारियों की पहुंच से बाहर है। ​मजबूरी में अपनाया देसी जुगाड़ ​कमर्शियल गैस नहीं मिलने के कारण दुकानदारी ठप होने की कगार पर पहुंच गई थी। ऐसे में अपनी आजीविका बचाने के लिए बेगूसराय के दुकानदारों ने अब पारंपरिक रास्तों की ओर रुख किया है। फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले कई दुकानदार अब खुद से मिट्टी और लोहे की ड्रम की मदद से कोयला जलाने वाला चूल्हा (भट्टी) बना रहे हैं। बढ़ सकती है कोयले की कीमत ​दुकानदारों का कहना है कि गैस चूल्हे पर काम करना आसान और स्वच्छ था, लेकिन अब मजबूरी में उन्हें फिर से धुएं और गर्मी के बीच कोयले की भट्टी पर काम करना पड़ रहा है। कोयले का चूल्हा बनाने में भी लागत आ रही है और ऐसे में अब कोयले की कीमतों में भी उछाल जरूर आएगा। इसके बावजूद, सिलेंडर की अनिश्चितता से बेहतर उन्होंने कोयले को ही विकल्प माना है। ​दुकानदारों को दो घंटे की अतिरिक्त मेहनत ​फुटपाथ दुकानदार अवधेश कुमार ब्रेड पकोड़ा और समोसे बेचते हैं। वह बताते हैं कि गैस की किल्लत ने उनकी दिनचर्या बदल दी है। पहले गैस चूल्हा जलाते ही काम शुरू हो जाता था। अब हमें दो घंटा पहले आकर कोयला सुलगाना पड़ता है। भट्टी तैयार करने में काफी समय और मेहनत लगती है। धुएं से आंखों में जलन होती है और गर्मी भी ज्यादा लगती है, लेकिन पेट पालने के लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। ​व्यापार पर पड़ा बुरा असर ​गैस की कमी और कोयले के इस्तेमाल से न केवल मेहनत बढ़ी है, बल्कि ग्राहकों को परोसे जाने वाले सामान की गति भी धीमी हो गई है। कोयले की आंच को नियंत्रित करना गैस के मुकाबले कठिन होता है, जिससे सामान तैयार होने में देरी होती है। भट्टी तैयार करने और कोयला सुलगाने में रोजाना 2 घंटे अधिक समय देना पड़ रहा है। धुएं के बीच काम करने से स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ेगा। बुझ सकता है परिवार का चूल्हा ​बेगूसराय की सड़कों पर बढ़ते कोयले के धुएं इस बात का प्रमाण हैं कि वैश्विक घटनाओं का असर धरातल पर कितनी जल्दी और गहराई से पड़ता है। गैस कंपनी और स्थानीय गैस एजेंसियों की चुप्पी ने इन छोटे दुकानदारों की परेशानी को और बढ़ा दिया है। यदि जल्द ही कमर्शियल गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो कई परिवारों का चूल्हा बुझने की नौबत आ सकती है।  

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