Class 1 Admission News: बेंगलुरु और कर्नाटक के कई माता-पिता इन दिनों सड़कों पर उतर आए हैं। उनकी मांग है कि कक्षा 1 में एडमिशन के लिए तय की गई उम्र सीमा में 90 दिन की छूट दी जाए। इस मुद्दे ने ऑनलाइन भी बड़ी बहस छेड़ दी है। कुछ लोग माता-पिता की मांग का समर्थन कर रहे हैं, तो कई लोग कह रहे हैं कि इतनी छोटी उम्र में बच्चों पर पढ़ाई का दबाव डालना ठीक नहीं है।
माता-पिता क्या कह रहे हैं?
प्रदर्शन कर रहे माता-पिता का कहना है कि यह कोई विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सरकार से एक विनम्र अनुरोध है। उनका कहना है कि जिन बच्चों ने तीन साल की प्री-प्राइमरी पढ़ाई पूरी कर ली है, उन्हें कक्षा 1 में प्रमोट किया जाए। लेकिन नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत तय 6 साल की उम्र की शर्त के कारण कई बच्चे पात्र नहीं हो पा रहे हैं।
दो लाख बच्चे इस नियम से प्रभावित
एक अभिभावक ने कहा कि अगर बच्चों को एक ही क्लास दोबारा पढ़नी पड़ी, तो इससे उन पर मानसिक दबाव पड़ेगा। खासकर वे बच्चे जो कोविड के दौरान पैदा हुए और शुरुआती सालों में भावनात्मक तनाव झेल चुके हैं, उनके लिए यह और मुश्किल हो सकता है। माता-पिता का दावा है कि स्कूल भी बच्चों को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं, लेकिन अंतिम फैसला सरकार को लेना है। उनका कहना है कि करीब दो लाख बच्चे इस नियम से प्रभावित हो सकते हैं।
सोशल मीडिया पर क्या हुआ?
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने कहा कि बच्चों को “बच्चा रहने देना” ज्यादा जरूरी है। कुछ यूजर्स ने तंज कसते हुए लिखा, “क्या अब 6 साल की उम्र से ही जेईई कोचिंग शुरू कर देंगे?” दूसरे लोगों का कहना है कि अगर बच्चा अपनी कक्षा में थोड़ा बड़ा होगा, तो उसके आत्मविश्वास और प्रदर्शन पर अच्छा असर पड़ेगा। कुछ ने यह भी सवाल उठाया कि इतनी जल्दी बच्चों को स्कूल में डालने की क्या जरूरत है?
नियम क्या कहता है?
कर्नाटक के स्कूल शिक्षा विभाग ने 2022 में एक नोटिफिकेशन जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि 1 जून तक बच्चे की उम्र कम से कम 6 साल होनी चाहिए, तभी उसे कक्षा 1 में प्रवेश मिलेगा। हालांकि, उस समय विरोध के बाद सरकार ने इस नियम को टाल दिया और कहा कि इसे 2025-26 से लागू किया जाएगा।
पिछले साल भी माता-पिता के आग्रह पर कुछ छूट दी गई थी। अब फिर से वे 90 दिन की राहत की मांग कर रहे हैं, ताकि बच्चों को यूकेजी या मॉन्टेसरी दोबारा न पढ़नी पड़े। यह मामला अब शिक्षा नीति, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और माता-पिता की उम्मीदों के बीच संतुलन का सवाल बन गया है।


