कोल ब्लॉक के लिए बदल दिया हाथी कॉरिडोर रूट:पहले दो IFS ने लिखा था- जहां कोल ब्लॉक, वहां हाथी गलियारा, फिर दो प्रमोटी बोले- 5 किमी दूर

कोल ब्लॉक के लिए बदल दिया हाथी कॉरिडोर रूट:पहले दो IFS ने लिखा था- जहां कोल ब्लॉक, वहां हाथी गलियारा, फिर दो प्रमोटी बोले- 5 किमी दूर

सिंगरौली जिले में वन भूमि पर आवंटित धिरौली कोल ब्लॉक में खनन के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का मसला तो पहले से सुर्खियों में है। अब इसके कारण जंगली हाथियों का कॉरिडोर भी खत्म होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। दरअसल वन विभाग ने अपने दो डायरेक्ट आईएफएस अफसरों द्वारा 2022 में दी गई रिपोर्ट को नकारते हुए कोल ब्लॉक को हाथी गलियारे से 5 किमी दूर बता दिया है।
वर्तमान में मप्र में 100 से अधिक जंगली हाथी मौजूद हैं और मप्र के रीवा और शहडोल संभाग के जंगलों को अपना स्थाई घर बना चुके हैं। सिंगरौली का जंगल ही मप्र में हाथियों का प्रवेशद्वार है, छत्तीसगढ़ और झारखंड से आने वाले हाथी सिंगरौली के जंगलों से होकर ही मप्र में दाखिल होते हैं और वापस भी लौटकर जाते हैं। साल 2022 से पहले तक वन विभाग के रिकॉर्ड में धिरौली वन क्षेत्र को हाथी कॉरिडोर के रूप में चिह्नित था, लेकिन 2023 के बाद के फॉरेस्ट नक्शों में क्षेत्र को हाथी कॉरिडोर में शामिल नहीं दिखाया गया है। वन विभाग के पूर्व अफसर स्वीकारते हैं कि धिरौली कोल ब्लॉक के लिए हाथी कॉरिडोर के नक्शों में हेरफेर की गई है।
इसलिए अहम है हाथी
वन्यजीव संरक्षण अधि. 1972 में हाथियों को बाघ के समान ही संकटग्रस्ट वन्यप्राणियों में शेड्यूल-1 में रखा है। उसे सर्वोच्च सुरक्षा का प्रावधान है। इनके व्यापार, शिकार या पिंजड़े में रखने पर प्रतिबंध है। यह भारत का राष्ट्रीय विरासत पशु भी है। 1992 में केंद्र ने प्रोजेक्ट एलीफेंट शुरू किया था। इसका उद्देश्य हाथियों के परिवेश, कॉरिडोर और उनका अस्तित्व बचाए रखने के उपाय करना है। इन दो आईएफएस ने माना- कोल ब्लॉक में प्रभावित क्षेत्र हाथी कॉरिडोर में शामिल

13 अप्रैल 2022… एपीसीसीएफ भू प्रबंध ने अप्रैल 2022 में सिंगरौली के तत्कालीन डीएफओ मधु वी राज से जानकारी मांगी थी। इसके जवाब में डीएफओ मधु वी राज ने 13 अप्रैल 2022 को जानकारी भेजी। बताया कि धिरौली कोल ब्लॉक के लिए आवंटित वन भूमि से संजय टाइगर रिजर्व की दूरी 10.07 किमी है। बगदरा सेंचुरी की दूरी 58 किमी और सोन घड़ियाल सेंचुरी की दूरी 47 किमी है। वन भूमि कार्य आयोजना (वर्किंग प्लान) में धिरौली कोल ब्लॉक में प्रभावित वन भूमि हाथी कॉरिडोर में सम्मिलित है। इस जानकारी की प्रतिलिपि तत्कालीन रीवा सीसीएफ और वन भूमि के डायवर्जन का प्रस्ताव देने वाली कंपनी स्ट्राटा टेक मिनरल प्रा. लि. को भी भेजी गई थी।
ये दो प्रमोटी आईएफएस, जिन्होंने कोल ब्लॉक से बाहर बताया हाथी कॉरिडोर

25 अप्रैल 2024… सिंगरौली डीएफओ की ओर से 25 अप्रैल 2024 को एपीसीसीएफ (भू-प्रबंध) को एक प्रस्ताव भेजकर 13 अप्रैल 2022 के तत्कालीन डीएफओ के हाथी कॉरिडोर में धिरौली की वन भूमि शामिल होने के अभिमत में संशोधन करने का अनुरोध किया गया। इसमें कहा गया कि अभिताभ अग्निहोत्री द्वारा बनाए वर्किंग प्लान 2009-10 से 2019-20) में धिलौरी कोल ब्लॉक से प्रभावित वन भूमि हाथी कॉरिडोर में शामिल थी, जबकि वर्तमान में प्रचलित राजीव मिश्रा द्वारा बनाई (2019-20 से 2029-30) कार्ययोजना में यह वन भूमि हाथी कॉरिडोर में शामिल नहीं हैं। हाथी कॉरिडोर से कोल ब्लॉक की वन भूमि 5 किलोमीटर दूर है। वर्किंग प्लान से तय होता है वनभूमि का लैंडयूज
जिस तरह शहरों में लैंडयूज का निर्धारण मास्टर प्लान से होता है, ठीक उसी तरह जंगल में वन भूमि का लैंड यूज वर्किंग प्लान से तय होता है। 2009-10 से लेकर 2019-20 के लिए बने सिंगरौली जिले का वर्किंग प्लान 1988 बैच के आईएफएस अधिकारी अभिताभ अग्निहोत्री ने तैयार किया था। अभिताभ अग्निहोत्री नेशनल जूलॉजिकल पार्क दिल्ली के डायरेक्टर और जबलपुर स्टेट स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर रह चुके हैं। अभिताभ अग्निहोत्री के वर्किंग प्लान में धिरौली कोल ब्लॉक वाले जंगल के बीच से एलिफेंट कॉरिडोर गुजरना माना था। वर्ष 2022 तक इसी वर्किंग प्लान के आधार पर सिंगरौली जिले में फॉरेस्ट से जुड़े निर्णय हुए। इसके बाद नया वर्किंग प्लान प्रमोटी आईएफएस राजीव मिश्रा ने तैयार किया। जो 2019-20 से 2029-30 तक के लिए है, जो अमल में 2023 से लाया गया। इसमें धिरौली कोल ब्लॉक से हाथी कॉरिडोर से 5 किलोमीटर दूर बता दिया गया। नवंबर 2023 में साइट इंस्पेक्शन
रीवा के तत्कालीन सीएफ राजेश कुमार राय ने 9 नवंबर 2023 को धिरौली कोल ब्लॉक के लिए आवंटित वन भूमि का साइट इंस्पेक्शन किया। इसकी डिटेल रिपोर्ट 21 नवंबर 2023 को वन विभाग के जरिए केंद्र सरकार को भेजते हुए कोल ब्लॉक आवंटन की अनुशंसा की गई थी। रिपोर्ट के पॉइंट क्रमांक 24 में लिखा गया कि वर्तमान में प्रचलित वर्किंग प्लान आईएफएस राजीव मिश्रा द्वारा तय 2019-20 से 2028-29 के आलेख भाग-2 के पेज क्रमांक 442 के अनुसार सिर्फ बीट क्रमांक आरएफ-375 की वन भूमि हाथी कॉरिडोर में शामिल है। लेकिन इसके आगे-पीछे और आसपास की बीट को लेकर स्पष्ट नहीं किया गया। सीसीएफ ने कुछ शर्तों के साथ कोल ब्लॉक आवंटन की अनुशंसा कर दी। शर्तें लगाई गई कि हाथी कॉरिडोर में कोई भी ऐसा काम नहीं किया जा सकता, जिससे हाथियों के आ‌वागमन में किसी तरह की बाधा पैदा होती हो। जैसे स्थाई भवन निर्माण, डिपो स्थापना, लेबर कैंप, स्थाई प्रकृति के निर्माण नहीं किए जाएंगे। कॉरिडोर में गैर वानिकी उपयोग नहीं किया जाएगा।
भास्कर एक्सपर्ट –
पहले जिस जगह पर कॉरिडोर था, अब वहां न मिलना, संदेह पैदा करता है…
किसी जंगल में वर्किंग प्लान के मुताबिक पहले हाथी कॉरिडोर था, लेकिन बाद के प्लान में कॉरिडोर नहीं मिला। यह संदेह पैदा करता है। ऐसा सिर्फ तभी संभव है जब जंगल में कोई बड़ा फिजिकल चेंज आया हो। जैसे- वहां कोई बांध या नहर का निर्माण हुआ हो। इस मामले की किसी स्वतंत्र पक्ष से जांच कराई जानी चाहिए कि यह बदलाव फिजिकल चेंज के कारण आया है या किसी दबाव में कॉरिडोर के रूट को बदल दिया गया है।
वर्किंग प्लान में एक दशक का अंतराल, इसी आधार पर रिवाइज किया मूवमेंट एरिया सिंगरौली जिले के पिछले वर्किंग प्लान में 2008 तक के डेटा के आधार पर धिरौली वन क्षेत्र को एलिफेंट मूवमेंट एरिया माना गया था, लेकिन नए वर्किंग प्लान में उसके लगभग एक दशक बाद के डेटा को आधार माना गया है। इसी के आधार पर एलिफेंट मूवमेंट एरिया को रिवाइज किया गया है। इस कारण दोनों वर्किंग प्लान में अंतर आया है। -विजय कुमार अंबाड़े, वन बल प्रमुख मप्र

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