दीवारों पर उकेरी गई देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं
महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर उत्तर कर्नाटक के प्रमुख शिवधामों में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। उणकल क्षेत्र में स्थित प्राचीन चंद्रमौलेश्वर मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी भव्य स्थापत्य कला के कारण भी शहर की ऐतिहासिक पहचान बना हुआ है। मंदिर की संरचना में चालुक्यकालीन स्थापत्य शैली की झलक स्पष्ट दिखाई देती है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग पहचान देती है। पत्थरों पर की गई महीन नक्काशी, मजबूत स्तंभ और मंदिर का पारंपरिक स्वरूप प्राचीन शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना है और समय-समय पर हुए जीर्णोद्धार के बावजूद इसकी मूल स्थापत्य शैली को सुरक्षित रखा गया है, जो आज भी दर्शकों को आकर्षित करती है।
झील किनारे आध्यात्मिक शांति
स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि यहां स्थापित भगवान शिव के चंद्रमौलेश्वर रूप के दर्शन से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। सोमवार और श्रावण मास में यहां विशेष भीड़ देखी जाती है। उणकल झील के समीप स्थित यह मंदिर प्राकृतिक शांति से घिरा हुआ है। सुबह और शाम का वातावरण भक्तों को विशेष आध्यात्मिक अनुभव कराता है, इसलिए अनेक लोग यहां ध्यान और मानसिक शांति के लिए भी पहुंचते हैं।
आस्था और विरासत का जीवंत केंद्र
आज चंद्रमौलेश्वर मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि हुब्बल्ली की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक बन चुका है। महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में सुबह 4 से 6 बजे तक रुद्राभिषेक किया जाएगा। इस दिन मंदिर रात 10 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहेगा। मंदिर परिसर को फूलों से सजाया जाएगा और भस्म पूजा का भी आयोजन होगा। पूरा परिसर शिवभक्ति में डूबा रहेगा।
मंदिर की विशेषताएं
मंदिर के पुजारी सिद्धप्पा हुगार ने बताया कि मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित हैं इसमें एक मुख्य एकमुखी शिवलिंग, जबकि पीछे स्थापित छोटा शिवलिंग चतुरमुखी स्वरूप में है। युगादि के दिन वर्ष में केवल एक बार सूर्य की किरणें सीधे शिवलिंग पर पड़ती हैं, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। मंदिर परिसर में भगवान गणेश की प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर प्रतिदिन सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। सुबह 6 से 7 बजे तक नियमित पूजा होती है तथा प्रतिदिन सुबह 6 बजे और शाम 7 बजे आरती होती है। प्रत्येक सोमवार को शाम 6 से 7 बजे तक पंचामृत अभिषेक किया जाता है। हमारे पूर्वज ही यहां पीढिय़ों से सेवा और पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं और मंदिर की परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं।


