चंडीगढ़ 200 करोड़ बैंक घोटाला जल्द CBI को जांच:बड़े पद पर बैठे चेहरे होंगे बेनकाब,पार्षदो में बनी सहमति,हरियाणा में दो IAS पर गिरी गाज

चंडीगढ़ में सरकारी विभागों के करोड़ों रुपये से जुड़े बड़े बैंक घोटाले, आइडीएफसी फर्स्ट बैंक से जुड़े इस मामले में करीब 200 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की जांच जल्द सीबीआई को जा सकती है, क्योंकि हरियाणा सरकार ने 750 करोड़ के घोटाले की जांच सीबीआई को सौंप दी है और चंडीगढ़ का यह घोटाला भी उसी बैंक से जुड़ा है, जो चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित आइडीएफसी फर्स्ट बैंक से संबंधित है। इसे लेकर चंडीगढ़ नगर निगम की पहली हाउस मीटिंग में भी सभी पार्षदों ने इस पर सहमति जताई थी। चंडीगढ़ में क्रेस्ट और आइडीएफसी फर्स्ट बैंक से जुड़े करीब 200 करोड़ रुपये के घोटाले में जांच के दौरान बड़ा खुलासा सामने आया है। मामले में गिरफ्तार प्रोजेक्ट डायरेक्टर सुखविंदर सिंह पर आरोप है कि उसने करीब 2.50 करोड़ रुपये अपनी मां, दोस्त और अपने खातों में ट्रांसफर करवाए। अब इस मामले के तार एक आईएफएस अधिकारी तक भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। सीबीआई की जांच में ही होंगे बड़े चेहरे बेनकाब इसके अलावा चंडीगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष एचएस लकी भी पुलिस जांच को लेकर कई बार सवाल उठा चुके हैं कि इस मामले में बड़े पद पर बैठे अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं, क्योंकि उनकी मिलीभगत के बिना कोई छोटा कर्मचारी इतना बड़ा घोटाला नहीं कर सकता। बड़े अधिकारी इस मामले से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं, लेकिन उन्हें भी जांच में शामिल किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि संबंधित अधिकारियों ने न तो किसी को शिकायत दी और न ही अपने स्तर पर जांच करने की कोशिश की, बल्कि मामले को दबाने का प्रयास किया। मीडिया में मामला उजागर होने के बाद ही करोड़ों के घोटाले का खुलासा हो सका। अब उन बड़े चेहरों को भी बेनकाब किया जाना चाहिए, जिनके इशारे पर यह घोटाला हुआ। हरियाणा में दो बड़े आईएएस अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है। ऐसे में अगर चंडीगढ़ में भी निष्पक्ष जांच होती है तो बड़े अधिकारी भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। इसलिए इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने की मांग तेज हो गई है। IFS अफसर तक पहुंचने की तैयारी जांच में सामने आया है कि यह मामला चंडीगढ़ प्रशासन के बड़े अधिकारियों तक पहुंच सकता है। सूत्रों के मुताबिक, एक ऑडियो रिकॉर्डिंग और कुछ चैट्स पुलिस के हाथ लगी हैं, जिनमें संबंधित आईएफएस अफसर द्वारा सुखविंदर को गिरफ्तारी से पहले भागने और अग्रिम जमानत लेने की सलाह देने की बात सामने आई है। पुलिस जल्द ही इस आईएफएस अफसर से पूछताछ कर सकती है। वहीं, मामले को गंभीरता से देखते हुए इसे सीबीआई को सौंपने की भी तैयारी की जा रही है। मां और दोस्त के खातों में ट्रांसफर किए पैसे आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व मैनेजर रिभव ऋषि ने पूछताछ में बताया कि सुखविंदर सिंह ने करीब 2.5 करोड़ रुपये अपने खाते, अपनी मां सुरिंदर कौर के खाते और अपने दोस्त दीपक के खाते में ट्रांसफर करवाए। इसके अलावा कैपको फिनटैक और स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट नाम की कंपनियों के जरिए भी करोड़ों रुपये का गड़बड़झाला किया गया। आरोप है कि कुछ पैसा नकद लिया गया और बाद में एचडीएफसी बैंक में जमा कराया गया। शेल कंपनियों के कर्मचारियों ने भी किया खुलासा जांच में पता चला है कि शेल कंपनियों से जुड़े कर्मचारियों-मनीष, भूपिंदर सिंह और अमरजीत पाल सिंह-ने माना है कि उन्होंने सुखविंदर को नकद पैसा दिया था। इससे घोटाले का दायरा और बढ़ गया है। इस मामले में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की पूर्व सीएफओ नलिनी भी जांच के घेरे में आ गई हैं। पुलिस ने नलिनी की बहन के घर से कार, लैपटॉप, पेन ड्राइव और जरूरी दस्तावेज जब्त किए हैं। हालांकि नलिनी ने आरोपों को नकारते हुए कहा है कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि वह धार्मिक यात्रा पर गई हुई हैं और लौटने के बाद जांच में शामिल होंगी। ऑडिट मैनेज करने के लिए लगवाए गए सोलर पैनल रिभव ऋषि ने पुलिस पूछताछ में बताया कि हर तीन महीने में बैंक की ऑडिट होती थी। उनकी ब्रांच में ऑडिटर के रूप में नरेश सुखीजा और दीपक कुमार आते थे। ऑडिट में गड़बड़ियों को छिपाने के लिए उन्हें खुश रखने के उद्देश्य से उनके घरों पर सोलर पैनल लगवाए गए। इसके लिए ऋषि ने अपने सेविंग अकाउंट से रकम ट्रांसफर कर क्रेस्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर सुखविंदर अबरोल के खाते में डाली थी। पुलिस ने हाल ही में सुखविंदर अबरोल को भी गिरफ्तार किया है, जिसे पांच दिन के रिमांड पर लिया गया है। 4.98 करोड़ की अवैध पेमेंट का खुलासा जांच में यह भी सामने आया कि 1 सितंबर 2025 को सनलिव सोलर कंपनी के खाते में 4.98 करोड़ रुपये की अवैध पेमेंट की गई थी। यह भुगतान नगर निगम के खाते से किया गया, जिसे आरोपित सीमा धीमान ने अप्रूव किया था। इस ट्रांजेक्शन को बैंकिंग स्तर पर रिलेशनशिप मैनेजर शमीम घर और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के रीजनल हेड धीरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा मंजूरी दी गई थी। 116.84 करोड़ का रिकॉर्ड गायब मामले की जांच में फर्जी एफडीआर का बड़ा खेल भी सामने आया है। पुलिस के अनुसार करीब 116.84 करोड़ रुपये की एफडी का रिकॉर्ड बैंक सिस्टम में मौजूद नहीं मिला। इसके अलावा 8.22 करोड़ रुपये से अधिक की तीन संदिग्ध एंट्रियां भी सामने आई हैं, जो नगर निगम के रिकॉर्ड से मेल नहीं खातीं। पुलिस अब उन सिस्टम्स को बरामद करने की कोशिश कर रही है, जिनका इस्तेमाल फर्जी एफडीआर तैयार करने में किया गया।

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