हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में पितरों के अक्षय मोक्ष का पर्व आरंभ हो चुका है। देशभर से पिहोवा के पवित्र सरस्वती तीर्थ पर स्नान, पिंडदान और तर्पण से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की शांति के लिए प्रार्थना करेंगे। श्रद्धालुओं के आगमन को लेकर प्रशासन की ओर से तैयारी पूरी की गई है। पहली बार मेला 4 दिन तक चलेगा। आज त्रयोदशी पर श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पर पहुंचना शुरू हो चुके हैं। वे रातभर रुककर कल सुबह चौदस का मुख्य स्नान के बाद पिंडदान और तर्पण करेंगे। चैत्र चौदस को पिशाच मोचनी माना जाता है, जिसमें पितरों की आत्मा को मुक्ति देने के लिए श्रद्धालु स्नान, पिंडदान, गतिकर्म, तर्पण और दीपदान करेंगे। SDM ने किया उद्घाटन SDM अनिल कुमार ने सूचना प्रसारण केंद्र का उद्घाटन किया। इसके बाद SDM अनिल कुमार मेला क्षेत्र का जायजा लिया। इस मेले में 5 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के मेले में पहुंचने की संभावना है। मेले में अमावस्या यानी 18 मार्च को भी श्रद्धालु तीर्थ पर पहुंचेंगे। हालांकि अगले दिन 19 मार्च को कुछ समय के लिए अमावस्या भी रहेगी, लेकिन उस दिन पहला नवरात्र मनाया जाएगा। सदियों से चल रहा मेला तीर्थ पुरोहित विनोद पचौली ने बताया कि वामन पुराण के अनुसार वेन के पुत्र पृथु के नाम से नगर का नाम पृथुदक हुआ। राजा वेन धर्म से विमुख हो गए थे, जिस कारण ऋषियों के श्राप से उनकी मृत्यु हो गई थी। फिर भगवान विष्णु के 9वें अंश से वेन के पुत्र पृथु पैदा हुए। राजा पृथु ने अपने पिता की मुक्ति के लिए उदक यानी जल से तर्पण किया। तभी से यह जगह पृथुदक कहलाई। युधिष्ठिर ने भी किया पिंडदान
उन्होंने बताया कि महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण अपने साथ युधिष्ठिर को तीर्थ पर लेकर आए थे। यहां युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने सगे संबंधियों और योद्धाओं के लिए पिंडदान करवाया था। यहां तीर्थ पुरोहितों के पास 300 साल पुरानी वंशावली बही-पौथी में दर्ज है। पिंडदान के बाद श्रद्धालु अपनी वंशावली इन्हीं बही-पौथी में देखते हैं। पिंडदान करने दोष मुक्ति बताया कि अगर किसी से भूलवश किसी जीव की हत्या हो जाती थी, तो पिंडदान करने से दोष समाप्त होता है। द्वादशी और त्रयोदशी के दिन विशेष व्रत और अनुष्ठान किए जाते थे। चौदस में मृत आत्माओं को शांति प्रदान करने के लिए पिंडदान किया जाता है। अमावस्या पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की मुक्ति के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। श्रद्धालुओं की आस्था हर वर्ष चैत्र चौदस पर लाखों श्रद्धालु यहां अपने पितरों की शांति के लिए आते हैं। इस पावन अवसर पर विशेष अनुष्ठान, पिंडदान और धार्मिक आयोजन होंगे, जो आस्था, परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक है। इस धार्मिक मेले में हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश , यूपी, दिल्ली सहित देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं।


