8th Pay Commission Budget 2026: केंद्र सरकार हर साल आम बजट के जरिए आर्थिक नीतियों और खर्च की दिशा तय करती है। सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए यह बजट हमेशा खास होता है, क्योंकि इसमें वेतन और भत्तों से जुड़े बड़े फैसलों के संकेत मिलते हैं। बजट 2026 से पहले 8वां वेतन आयोग चर्चा का केंद्र बन गया है, क्योंकि इसकी सिफारिशें आने वाले सालों में सैलरी और पेंशन की तस्वीर बदल सकती हैं। माना जा रहा है कि 1 फरवरी वित्त मंत्री के बजट भाषण में 8th Pay Commission को लेकर कोई वित्तीय प्रावधान घोषित हो सकता है। इससे कर्मचारियों और पेंशनर्स को फायदे मिल सकते हैं।
बजट 2026 से ऐसे हो सकता है फायदा
केंद्र सरकार ने 8वें वेतन आयोग का गठन कर दिया है और इसे अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए करीब 18 महीने का समय दिया गया है। मौजूदा समयसीमा को देखते हुए इसी साल वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी की संभावना कम आंकी जा रही है। हालांकि, अगर सरकार बजट में इसके लिए अलग से राशि का प्रावधान करती है, तो आयोग की सिफारिशों को समय से पहले लागू करने की उम्मीद की जा सकती हैं। करीब एक करोड़ से ज्यादा केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनर्स इस पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।
पिछले फिटमेंट फैक्टर और भत्तों का असर
सातवें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था, जिससे बेसिक सैलरी 7,000 रुपये से बढ़कर 18,000 रुपये हो गई, यानी 157 प्रतिशत की बढ़ोतरी। हालांकि, 7वां वेतन लागू होने तक सैलरी 19,200 रुपये हो चुकी थी और DA के रीसेट होने के कारण कुल वेतन करीब 23,670 रुपये पहुंचा। लेकिन इसमें प्रभावी बढ़ोतरी करीब 4,470 रुपये रही, जो लगभग 14.3 प्रतिशत बनती है।
नए वेतन आयोग में भले ही फिटमेंट फैक्टर कम रखा जाए, लेकिन मौजूदा समय में डीए का स्तर कम होने के कारण प्रभावी बढ़ोतरी ज्यादा हो सकती है। इससे कर्मचारियों की मासिक आय में साफ अंतर देखने को मिल सकता है।
कैसे सरकारी खजाने पर पड़ता है बोझ
वेतन आयोग का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। 7वें वेतन आयोग से सरकार पर करीब 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ आया था। विशेषज्ञों के मुताबिक 8वें वेतन आयोग में कर्मचारियों और पेंशनर्स की संख्या बढ़ने के कारण यह बोझ और ज्यादा हो सकता है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज (Kotak Institutional Equities) की 2025 की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि 8वें वेतन आयोग से कुल वित्तीय असर 2.4 से 3.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जिसे संतुलित करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।


