BSP And Congress, SP: हाथी से साइकिल तक: नसीमुद्दीन सिद्दीकी की नई पारी, 2027 से पहले यूपी की राजनीति में हलचल

BSP And Congress, SP: हाथी से साइकिल तक: नसीमुद्दीन सिद्दीकी की नई पारी, 2027 से पहले यूपी की राजनीति में हलचल

Naseemuddin Siddiqui Joins Samajwadi Party: उत्तर प्रदेश की राजनीति में रविवार को एक और अहम मोड़ आया, जब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पूर्व कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव स्वयं उन्हें साथ लेकर पार्टी कार्यालय पहुंचे। सिद्दीकी ने इस मौके पर कहा कि वे हमेशा ‘नेता जी’ मुलायम सिंह यादव को अपना नेता मानते रहे हैं। यह घटनाक्रम सिर्फ एक नेता के दल बदलने का मामला नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है।

2027 चुनाव से पहले बदले सियासी समीकरण

सदन की तल्ख यादें और समय का चक्र

एक दौर था जब बसपा सरकार में मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी सत्ता के केंद्र में थे। विधानसभा में विपक्ष की ओर से तीखे हमलों के बीच उनकी सियासी हैसियत मजबूत मानी जाती थी। उसी सदन में समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान ने उन पर तीखे कटाक्ष किए थे। वक्त ने करवट ली,आज आजम खान कानूनी मामलों के कारण जेल में हैं, और सिद्दीकी समाजवादी खेमे में नई भूमिका तलाश रहे हैं। राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता,यह कहावत उत्तर प्रदेश की सियासत में बार-बार सच साबित होती रही है।

बसपा से दूरी, कांग्रेस में पड़ाव

नसीमुद्दीन सिद्दीकी लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी में मायावती के भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते थे। मायावती सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने संगठन और सत्ता दोनों में अहम भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ीं। बसपा छोड़ने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा। उस वक्त उन्होंने बड़े दावे किए थे कि कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार होगा। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार कमजोर होने के कारण सिद्दीकी वहां अपेक्षित प्रभाव नहीं जमा सके। धीरे-धीरे वे हाशिए पर चले गए। अब समाजवादी पार्टी में उनकी एंट्री को नई सियासी पारी के रूप में देखा जा रहा है।

सपा की रणनीति और 2027 का लक्ष्य

समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर संगठन विस्तार और सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी है। अखिलेश यादव लगातार अन्य दलों से प्रभावशाली नेताओं को शामिल कर पार्टी का आधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दलबदलू नेताओं के सहारे सपा मजबूत होगी या इससे पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष पनपेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग के समीकरण को साधने के लिए सिद्दीकी जैसे नेताओं को जोड़ रही है। लेकिन यह रणनीति तभी सफल होगी, जब संगठनात्मक संतुलन बना रहे।

सहयोगी दलों की नाराजगी

राज्य की राजनीति में सपा और कांग्रेस के बीच समय-समय पर गठबंधन की चर्चा होती रही है। ऐसे में कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले नेताओं को सीधे सपा में शामिल करना कुछ कांग्रेस नेताओं को असहज कर सकता है। कुछ राजनीतिक जानकार इसे ‘सियासी सौदेबाजी’ के रूप में भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सहयोगी दलों को भरोसे में नहीं लिया गया, तो 2027 में इसका असर गठबंधन की संभावनाओं पर पड़ सकता है।

कार्यकर्ताओं का मनोबल-सबसे बड़ी कसौटी

किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं। समाजवादी पार्टी के पुराने और वफादार कार्यकर्ता यह देख रहे हैं कि नए आने वाले नेताओं को संगठन में कितनी अहमियत मिलती है। यदि टिकट वितरण या संगठनात्मक पदों में नए चेहरों को प्राथमिकता दी जाती है, तो असंतोष की स्थिति बन सकती है। अखिलेश यादव के सामने चुनौती यही है कि वे नए और पुराने नेतृत्व के बीच संतुलन बनाए रखें।

बसपा-कांग्रेस के बाद सपा में शामिल हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी

क्या सिद्दीकी दोहरा पाएंगे पुराना प्रभाव

बसपा में रहते हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सियासी पकड़ मजबूत मानी जाती थी। लेकिन पार्टी बदलने के बाद वही प्रभाव दोहराना आसान नहीं होता। समाजवादी पार्टी की अपनी सामाजिक संरचना और नेतृत्व शैली है। उसमें जगह बनाना और जनाधार खड़ा करना समय मांगता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सिद्दीकी की भूमिका आने वाले महीनों में स्पष्ट होगी,क्या वे केवल प्रतीकात्मक चेहरा बनेंगे या संगठन में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

बदलती सियासत का संकेत

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर बड़े नेता अपने सियासी भविष्य को देखते हुए पाला बदलते रहे हैं। यह घटनाक्रम भी उसी कड़ी का हिस्सा है। लेकिन हर दल बदल अपने साथ नई संभावनाएं और जोखिम दोनों लेकर आता है। सवाल यह है कि क्या यह कदम सपा को 2027 में सत्ता के करीब ले जाएगा, या संगठन के भीतर नई चुनौतियां खड़ी करेगा .

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