अयोध्या में स्थित श्रीरामलला सदन देवस्थान, रामकोट में पंचदिवसीय श्री ब्रह्मोत्सव का वैदिक विधि-विधान, श्रद्धा और भक्ति के अनुपम वातावरण के बीच भव्य समापन हो गया। जगतगुरु रामानुजाचार्य स्वामी राघवाचार्य महाराज के सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में संपन्न यह महोत्सव धार्मिक आस्था और सनातन परंपराओं का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा। समापन दिवस पर प्रातःकाल पवित्र सरयू नदी में भगवान का अवभृथ स्नान कराया गया, जिसे आयोजन का अत्यंत दिव्य और पुण्यदायी क्षण माना गया। इसके उपरांत पुष्पयाग, हवन की पूर्णाहुति तथा ध्वजावरोहण जैसे प्रमुख अनुष्ठानों के साथ ब्रह्मोत्सव का विधिवत समापन किया गया। सरयू तट पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ इस आध्यात्मिक आयोजन की भव्यता का साक्षात प्रमाण बनी।
इस पंचदिवसीय ब्रह्मोत्सव के दौरान प्रतिदिन विविध धार्मिक अनुष्ठान, हवन, अभिषेक एवं भगवान की भव्य सवारी निकाली गई। सिंहवाहन पर विराजमान भगवान की दिव्य शोभायात्रा एवं तिरूमज्जन के आयोजन ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रतिदिन अलग-अलग स्वरूपों में सुसज्जित भगवान की झांकियों ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया।
देश के विभिन्न प्रांतों से आए संत-महात्माओं एवं श्रद्धालुओं ने इस महोत्सव में सहभागिता कर कल्याणोत्सव, वैदिक अनुष्ठानों और भगवान की दिव्य सवारियों का पुण्य लाभ प्राप्त किया। पूरे आयोजन के दौरान भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला।समारोह के समापन अवसर पर स्वामी राघवाचार्य महाराज ने उपस्थित संतों, महात्माओं एवं श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति और सभ्यता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ऐसे धार्मिक आयोजनों का विधिपूर्वक संपन्न होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शास्त्र ज्ञान के साथ-साथ उसका व्यवहारिक अध्ययन भी उतना ही जरूरी है, तभी हम अपनी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक सशक्त रूप में पहुंचा सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं की भागीदारी पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यही युवा वर्ग हमारी सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अतः हम सभी का कर्तव्य है कि अपनी-अपनी परंपराओं के अनुरूप ऐसे आयोजनों को निरंतर करते रहें। इस प्रकार श्रीरामलला सदन देवस्थान में आयोजित श्री ब्रह्मोत्सव न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान रहा, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का सजीव उत्सव बनकर श्रद्धालुओं के हृदय में अमिट छाप छोड़ गया।


