Blue City Jodhpur: छोटे से कीड़े ने बदल दी थी पूरे शहर की शक्ल, जोधपुर हुआ था नीला, जानिए इसका रहस्य

Blue City Jodhpur: छोटे से कीड़े ने बदल दी थी पूरे शहर की शक्ल, जोधपुर हुआ था नीला, जानिए इसका रहस्य

जोधपुर। सूर्यनगरी अपनी समृद्ध विरासत, प्राचीन इतिहास और विशिष्ट स्थापत्य शैली के चलते देश-विदेश में ब्लू सिटी के नाम से पहचानी जाती है। पुराना शहर आज भी नीले रंग की इस पहचान को संजोए हुए है, जिसे देखने बड़ी संख्या में देसी-विदेशी सैलानी आते हैं।

कमजोर हो जाते थे मकान

इतिहासकार जहूर खान मेहर के अनुसार जोधपुर शहर की यह पहचान अचानक नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण था। शहर की शुरुआती बसाहट में सीमेंट का उपयोग नहीं होता था। चुनाई में मिट्टी (मुड) और चूना लगाया जाता था। पहाड़ियों में पाए जाने वाले एक विशेष कीड़े से मिट्टी को नुकसान पहुंचता और मकान कुछ वर्षों में कमजोर होकर ढह जाते।

Blue City Jodhpur

इस समस्या से बचने के लिए चूने में नीले रंग की मिलावट कर पुताई की जाने लगी। इससे कीड़ा नहीं लगता और घर सुरक्षित रहते। साथ ही नीला रंग गर्मी कम करने में भी सहायक साबित हुआ। धीरे-धीरे यही पद्धति ब्लू सिटी की पहचान का आधार बनी।

सांस्कृतिक संरचना रोचक

शहर की बसावट और सांस्कृतिक संरचना भी उतनी ही रोचक है। मेहरानगढ़ किले के आसपास ब्राह्मणों की अधिक बसावट इसलिए हुई क्योंकि रियासतकाल में राजपरिवार के धार्मिक अनुष्ठानों हेतु सर्वप्रथम इन्हीं को बुलाया जाता था। इसके बाद महाजन व सुनार समुदाय की बसावट रही, जो सम्पन्न वर्ग था और किले के समीप सुरक्षा घेरा का हिस्सा माना जाता था।

जल संचय तंत्र भी शानदार

जबकि परकोटे व दरवाजों के पास लड़ाकू जातियों की बस्तियां रहीं, ताकि बाहरी हमलों की स्थिति में रक्षा की जा सके। शहर की यह बसाहट, सामाजिक ताने-बाने और रक्षा व्यवस्था को एक साथ पिरोने वाली अनोखी सांस्कृतिक विरासत आज भी सुरक्षित है।

जोधपुर का जल संचय तंत्र भी अपनी सूझबूझ और पारंपरिक इंजीनियरिंग का उदाहरण रहा है। तूअरजी का झालरा, गुलाब सागर, सैकड़ों बावड़ियां और कुएं तथा नहरी व्यवस्था इस प्रकार विकसित थे कि पहाड़ियों से बहता पानी योजनाबद्ध रूप से जलाशयों और बावड़ियों तक पहुंचे। कई जलाशय आपस में जुड़े थे और शहर में जल प्रबंधन की दीर्घकालिक व्यवस्था कायम थी।

समय के साथ ब्लू सिटी की थीम में बदलाव भी आया। सन 1929 में छीतर पैलेस (उमेद भवन) के निर्माण के साथ छीतर पत्थर का चलन बढ़ा। पत्थरों की घड़ाई और इसका उपयोग प्रतिष्ठा और समृद्धि का प्रतीक बनने लगा। धीरे-धीरे इसके खनन व उपयोग में बढ़ोतरी हुई और स्थापत्य के नए रूप सामने आए। इसके बावजूद पुराना जोधपुर अब भी अपनी नीली पहचान, सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य कला के कारण विश्व मानचित्र पर विशिष्ट स्थान बनाए हुए है।

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