बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष अप्सरा मिश्रा प्रदेश की बेटी-महिलाओं को इंसाफ दिलाती हैं। उनके खिलाफ हो रहे जुर्म के लिए आवाज उठाती हैं, लेकिन उनकी जिंदगी के पन्नों में कुछ कहानी दिलचस्प हैं। इनमें से एक है उनके प्यार और लव मैरिज की कहानी। आज वैलेंटाइन डे है, भास्कर आपको अप्सरा मिश्रा और उनके पति डॉ रणधीर मिश्रा की लव स्टोरी खुद उनकी ही जुबान से रूबरू करवाएगा जिसमें प्यार, ड्रामा, परिवार और रोमांच है। अप्सरा मिश्रा ने अपने पति डॉ रणधीर को खुद प्रपोज किया था। रणधीर के परिवार वालों से इंटर कास्ट मैरिज के लिए खुद ही बात की थी। उन्हें रणधीर पहले काफी खडूस लगते थे। जब उनकी शादी कहीं और तय हो गई, तब अप्सरा को प्यार का एहसास हुआ। दोनों ने परिवार को मिलकर मनाया। रणधीर ब्राहमण थे, अप्सरा नहीं थी इसलिए दोनों की शादी में बहुत चैलेंजेस आए। ऑफिस में दोनों की सगाई हुई। शादी में रणधीर के परिवार-गांव से कोई भी बारात में नहीं आए। अलग जाति होने के कारण अप्सरा को कुलदेवी के मंदिर से बाहर निकाल दिया गया, लेकिन पति के सपोर्ट के कारण आज वह बिहार में एक वैधानिक पद पर कार्यरत हैं। आइए पढ़ते हैं कैसे अप्सरा-डॉ रणधीर की लव स्टोरी ताने बाने और ड्रामे के साथ पनपी…परिवार को कैसे मनाया…. शर्मिला, कम बात करने वाली रणधीर से हुआ प्यार अप्सरा बताती हैं, मैं 1999 में सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए अपने घर पूर्णिया से पटना आई। मेरी मुलाकात रणधीर मिश्रा से हुई। रणधीर काफी शर्मीले थे, बहुत कम बात करते थे। दूसरी तरफ मैं खुले विचार, बहुत ज्यादा बात करने वाली और मुखर थी। रणधीर ज्यादा बोलते नहीं था, इसलिए अप्सरा को वो खडूस लगते थे। फिर क्या था, रणधीर से बात करना अप्सरा ने एक चैलेंज की तरह लिया। वह उन्हें हर बात में टोकने लगी, ताकि वह कुछ बोलें। इसी बीच अप्सरा ने पटना के डॉ जाकिर हुसैन कॉलेज में पत्रकारिता में एडमिशन ले लिया। अप्सरा की दी हुई गिफ्ट रणधीर ने किसी और को दे दी आगे अप्सरा बताती हैं, उस दौर में लड़के-लड़कियां उतना बात नहीं करते थे, लेकिन मैं इन सारी चीजों को नॉर्मल ही लेती थी। रणधीर गांव के परिवेश से आए थे, इसलिए वह लड़कियों से दूर रहते थे। जब मैंने रणधीर से उनका फोन नंबर मांगा, तो उन्होंने अपने पड़ोसी का नंबर दे दिया। उन्हें डर था कि अगर घर में यह बात पता चली कि वह किसी लड़की से बात करते हैं, तो बहुत तमाशा होगा। एक दिन मैंने रणधीर को दोस्त समझकर एक पेन गिफ्ट किया, लेकिन उन्होंने मेरे गिफ्ट को किसी दूसरे को दे दिया, ताकि घर में किसी को यह ना पता चले कि एक लड़की ने गिफ्ट दिया है। शर्म के कारण अप्सरा को नहीं कह पाए अपने दिल की बात डॉ रणधीर बताते हैं, वह समस्तीपुर के सरायरंजन के छोटे से गांव से हैं। पटना पढ़ाई करने आए थे। घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी। वह अपने पिता के साथ पटना में किराए के मकान में रहते थे। इस बीच पिता रिटायर होकर अपने गांव चले गए। रणधीर यहीं पर पढ़ाई कर रहे थे। उस वक्त पैसे की काफी तंगी आ गई थी, वह अपना पढ़ाई छोड़ने वाले थे। पैसे की तंगी से गुजरे रणधीर तो अप्सरा ने दिया साथ इसी बीच अप्सरा मेरे साथ ढाल की तरह खड़ी रहीं। आगे बढ़ने के लिए प्रेरित की। उनकी यही बात मुझे काफी अच्छी लगी और अप्सरा को अपना दिल दे बैठे, लेकिन मुझे यह कहने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि मैं काफी शर्मीला था। कोई लड़का अगर अप्सरा से बात कर लेता था तो मुझे जलन होती थी। अलग कास्ट, परिवार को मनाना आसान नहीं था अप्सरा-रणधीर, दोनों की जाति अलग-अलग थी। रणधीर ब्राह्मण परिवार से थे, उनको पता था कि उनका परिवार अप्सरा को कभी नहीं अपनाएगा। इसी बीच अप्सरा के कॉलेज में पत्रकारिता में उन्होंने अपना दाखिला करवा लिया। 1999 में छात्र जदयू से जुड़ गए थे। आमदनी के लिए कुछ बच्चों को पढ़ाने भी लगे। अलग-अलग जगह ट्रांसफर होने पर दोनों ने छोड़ दी नौकरी साल 2002 में दोनों ने पटना में एक दैनिक अखबार ज्वाइन किया। शुरू में सब ठीक था, लेकिन दो महीने बाद भागलपुर में वैकेंसी आई, जिसमें रणधीर को भेजा जा रहा था। फिर दोनों ने नौकरी छोड़ दी। अलग-अलग जगह काम करने की बात नहीं मानी। इसी बीच दोनों ने 2004 में अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक मैगजीन ‘अनुपम उपहार’ की शुरुआत की, जिसके लिए मीटिंग पटना जू में होती थी। बाद में उन्होंने अपना ऑफिस बोरिंग रोड में खोला। रणधीर की शादी तय होने पर अप्सरा को हुआ प्यार का एहसास अप्सरा में भी रणधीर के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर था, लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं था। रणधीर की शादी के लिए लड़की देखी जा रही थी। 2005 में जब एक लड़की से लगभग रिश्ता फाइनल हो गया, तब अप्सरा को प्यार का एहसास हुआ। उन्होंने रणधीर को अपने दिल की बात कहते हुए शादी का प्रस्ताव दिया। अप्सरा ने कहा, रणधीर इतने डरपोक थे कि उन्होंने अप्सरा को ही उनके परिवार वालों से बात करने कहा। रणधीर के भैया से अप्सरा ने की दोनों की शादी की बात अप्सरा बताती हैं, एक दिन रणधीर के बड़े भैया हमारे ऑफिस आए, वहां मैंने उनसे शादी की बात की। पहले वह चौंक गए, हालांकि उन्होंने मुझे बस यही बोला कि परिवारवालों से तो रणधीर को ही बात करनी होगी। उधर, रणधीर अपने परिवार से बात करने से डर रहे थे। इसी बीच रणधीर की भाभी अपने बच्चे का इलाज कराने पटना आईं। वह ऑफिस भी आती थीं। उन्हें हम दोनों के बीच प्यार का शक हो गया। भाभी ने जब रणधीर से यह बात पूछी तो उन्होंने सच बताया। होली के दिन भाभी ने गांव में ये बात आउट कर दी। उन्होंने परिवार वालों के सामने हम दोनों के प्यार की बात रखी। पहले तो रणधीर को घर में काफी समझाया गया, गांव में सामाजिक बैठकी भी हुई। लेकिन, रणधीर की जिद को देखकर परिवार वाले एक बार लड़की और उनके परिवार से मिलने को राजी हो गए। ऑफिस में हुई थी अप्सरा-रणधीर की सगाई आगे अप्सरा बोलीं, मैंने पिता से सारी बातें कहीं। पापा को इससे कोई परेशानी नहीं थी, बस वह चाहते थे कि लड़का अच्छा कमाए ताकि उनकी बेटी को सही से रख सके। दोनों परिवार पटना में ही मिले और अपने बच्चों के प्यार-जिद के आगे झुक कर शादी तय हो गई। सारे ताम-झाम से दूर सगाई मई 2006 में ऑफिस में ही हुई। 12 जून को शादी की तारीख तय हुई। बारात में कोई परिवार वाला नहीं हुआ था शामिल शादी वाले दिन जब रणधीर बारात लेकर अप्सरा के घर जा रहे थे, तब उनकी बारात में घर से कोई भी शामिल नहीं हुआ। न भाई, न पिता, न रिश्तेदार और न ही गांव से कोई लोग बारात में गए। रणधीर ने बताया, उस वक्त गांव के लोगों ने मुझे कहा कि अगर आज हम आपकी बारात में चले जाएंगे तो आगे चलकर हमारे बच्चों को इससे प्रेरणा मिलेगी। फिर गांव की बदनामी होगी। त मैंने सभी से आशीर्वाद लिया और कुल देवता को प्रणाम कर अकेले ही गांव से निकल गया। मेरे दोस्त बाराती बनकर अप्सरा के घर तक पहुंचे। कुलदेवी के मंदिर से बाहर निकाल दिया गया शादी काफी धूमधाम से हुई और जब अप्सरा घर आई तो उनका अच्छे से स्वागत किया गया। अप्सरा बताती हैं, शुरू में मुझे परिवार में एडजेस्ट होने में काफी परेशानी हुई। हालांकि, मेरे सास ससुर ने मुझे बहुत सपोर्ट किया, लेकिन मुझे कई ताने भी सुनने को मिले। ब्राह्मण नहीं होने के कारण एक बार मुझे अपने ही ससुराल के कुलदेवी के मंदिर से निकाल दिया गया। यह चीज मैं आज भी नहीं भूल पाई हूं कि मुझे अपने ही घर के पूजा की डेहरी से बाहर निकाल दिया गया था। हालांकि, मेरे पति ने मेरा हर कदम पर साथ दिया और आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट किया है। उन्होंने सीधे कहा कि घर बैठने के लिए मैं तुम्हें नहीं लेकर आया हूं। तुम जो चाहे वह काम कर सकती हो। आर्थिक तंगी के कारण KBC में किया ट्राई, दिल्ली आने के लिए आया कॉल शादी की बाद दोनों की जिंदगी अच्छी कट रही थी। मैगजीन से आमदनी हो रही थी। इसी बीच रणधीर इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर के रूप में अलग-अलग कॉलेज में पढ़ाने भी लगे थे। दोनों के दो बच्चे- एक बेटी और एक बेटा भी हुए। परिवार बढ़ने के बाद जिम्मेदारी भी बढ़ी और फिर पैसे की कुछ तंगी भी आ गई। इसी बीच रणधीर ने कौन बनेगा करोड़पति में ट्राई किया। उन्हें मई 2025 में केबीसी से दिल्ली आने का कॉल आया। दिल्ली जाने के पैसे नहीं थे तो अप्सरा ने ही उन्हें उधार लेकर 10 हजार रुपए दिए और दिल्ली भेजा। उसी दिन पार्टी कार्यालय से अप्सरा के महिला आयोग में सदस्य बनने को लेकर कॉल आया। एक ही दिन पर दोहरी खुशखबरी पाकर दोनों काफी खुश है। रणधीर दिल्ली गए, दो राउंड के आगे उनका सिलेक्शन नहीं हुआ और वह वापस पटना आ जाए। इस बात से वह काफी निराश थे। हालांकि 6 जून 2025 को बिहार सरकार की ओर से बिहार राज्य महिला आयोग को लेकर चिट्ठी निकाली गई, जिसमें अप्सरा को अध्यक्ष के रूप में मनोनीत किया गया था। अप्सरा मिश्रा अब महिलाओं को न्याय दिलाती हैं। उनके खिलाफ हो रहे जुर्म पर आवाज उठाती हैं। पति-पत्नी से जुड़े कई मामलों को सुलझाती हैं। बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष अप्सरा मिश्रा प्रदेश की बेटी-महिलाओं को इंसाफ दिलाती हैं। उनके खिलाफ हो रहे जुर्म के लिए आवाज उठाती हैं, लेकिन उनकी जिंदगी के पन्नों में कुछ कहानी दिलचस्प हैं। इनमें से एक है उनके प्यार और लव मैरिज की कहानी। आज वैलेंटाइन डे है, भास्कर आपको अप्सरा मिश्रा और उनके पति डॉ रणधीर मिश्रा की लव स्टोरी खुद उनकी ही जुबान से रूबरू करवाएगा जिसमें प्यार, ड्रामा, परिवार और रोमांच है। अप्सरा मिश्रा ने अपने पति डॉ रणधीर को खुद प्रपोज किया था। रणधीर के परिवार वालों से इंटर कास्ट मैरिज के लिए खुद ही बात की थी। उन्हें रणधीर पहले काफी खडूस लगते थे। जब उनकी शादी कहीं और तय हो गई, तब अप्सरा को प्यार का एहसास हुआ। दोनों ने परिवार को मिलकर मनाया। रणधीर ब्राहमण थे, अप्सरा नहीं थी इसलिए दोनों की शादी में बहुत चैलेंजेस आए। ऑफिस में दोनों की सगाई हुई। शादी में रणधीर के परिवार-गांव से कोई भी बारात में नहीं आए। अलग जाति होने के कारण अप्सरा को कुलदेवी के मंदिर से बाहर निकाल दिया गया, लेकिन पति के सपोर्ट के कारण आज वह बिहार में एक वैधानिक पद पर कार्यरत हैं। आइए पढ़ते हैं कैसे अप्सरा-डॉ रणधीर की लव स्टोरी ताने बाने और ड्रामे के साथ पनपी…परिवार को कैसे मनाया…. शर्मिला, कम बात करने वाली रणधीर से हुआ प्यार अप्सरा बताती हैं, मैं 1999 में सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए अपने घर पूर्णिया से पटना आई। मेरी मुलाकात रणधीर मिश्रा से हुई। रणधीर काफी शर्मीले थे, बहुत कम बात करते थे। दूसरी तरफ मैं खुले विचार, बहुत ज्यादा बात करने वाली और मुखर थी। रणधीर ज्यादा बोलते नहीं था, इसलिए अप्सरा को वो खडूस लगते थे। फिर क्या था, रणधीर से बात करना अप्सरा ने एक चैलेंज की तरह लिया। वह उन्हें हर बात में टोकने लगी, ताकि वह कुछ बोलें। इसी बीच अप्सरा ने पटना के डॉ जाकिर हुसैन कॉलेज में पत्रकारिता में एडमिशन ले लिया। अप्सरा की दी हुई गिफ्ट रणधीर ने किसी और को दे दी आगे अप्सरा बताती हैं, उस दौर में लड़के-लड़कियां उतना बात नहीं करते थे, लेकिन मैं इन सारी चीजों को नॉर्मल ही लेती थी। रणधीर गांव के परिवेश से आए थे, इसलिए वह लड़कियों से दूर रहते थे। जब मैंने रणधीर से उनका फोन नंबर मांगा, तो उन्होंने अपने पड़ोसी का नंबर दे दिया। उन्हें डर था कि अगर घर में यह बात पता चली कि वह किसी लड़की से बात करते हैं, तो बहुत तमाशा होगा। एक दिन मैंने रणधीर को दोस्त समझकर एक पेन गिफ्ट किया, लेकिन उन्होंने मेरे गिफ्ट को किसी दूसरे को दे दिया, ताकि घर में किसी को यह ना पता चले कि एक लड़की ने गिफ्ट दिया है। शर्म के कारण अप्सरा को नहीं कह पाए अपने दिल की बात डॉ रणधीर बताते हैं, वह समस्तीपुर के सरायरंजन के छोटे से गांव से हैं। पटना पढ़ाई करने आए थे। घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी। वह अपने पिता के साथ पटना में किराए के मकान में रहते थे। इस बीच पिता रिटायर होकर अपने गांव चले गए। रणधीर यहीं पर पढ़ाई कर रहे थे। उस वक्त पैसे की काफी तंगी आ गई थी, वह अपना पढ़ाई छोड़ने वाले थे। पैसे की तंगी से गुजरे रणधीर तो अप्सरा ने दिया साथ इसी बीच अप्सरा मेरे साथ ढाल की तरह खड़ी रहीं। आगे बढ़ने के लिए प्रेरित की। उनकी यही बात मुझे काफी अच्छी लगी और अप्सरा को अपना दिल दे बैठे, लेकिन मुझे यह कहने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि मैं काफी शर्मीला था। कोई लड़का अगर अप्सरा से बात कर लेता था तो मुझे जलन होती थी। अलग कास्ट, परिवार को मनाना आसान नहीं था अप्सरा-रणधीर, दोनों की जाति अलग-अलग थी। रणधीर ब्राह्मण परिवार से थे, उनको पता था कि उनका परिवार अप्सरा को कभी नहीं अपनाएगा। इसी बीच अप्सरा के कॉलेज में पत्रकारिता में उन्होंने अपना दाखिला करवा लिया। 1999 में छात्र जदयू से जुड़ गए थे। आमदनी के लिए कुछ बच्चों को पढ़ाने भी लगे। अलग-अलग जगह ट्रांसफर होने पर दोनों ने छोड़ दी नौकरी साल 2002 में दोनों ने पटना में एक दैनिक अखबार ज्वाइन किया। शुरू में सब ठीक था, लेकिन दो महीने बाद भागलपुर में वैकेंसी आई, जिसमें रणधीर को भेजा जा रहा था। फिर दोनों ने नौकरी छोड़ दी। अलग-अलग जगह काम करने की बात नहीं मानी। इसी बीच दोनों ने 2004 में अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक मैगजीन ‘अनुपम उपहार’ की शुरुआत की, जिसके लिए मीटिंग पटना जू में होती थी। बाद में उन्होंने अपना ऑफिस बोरिंग रोड में खोला। रणधीर की शादी तय होने पर अप्सरा को हुआ प्यार का एहसास अप्सरा में भी रणधीर के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर था, लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं था। रणधीर की शादी के लिए लड़की देखी जा रही थी। 2005 में जब एक लड़की से लगभग रिश्ता फाइनल हो गया, तब अप्सरा को प्यार का एहसास हुआ। उन्होंने रणधीर को अपने दिल की बात कहते हुए शादी का प्रस्ताव दिया। अप्सरा ने कहा, रणधीर इतने डरपोक थे कि उन्होंने अप्सरा को ही उनके परिवार वालों से बात करने कहा। रणधीर के भैया से अप्सरा ने की दोनों की शादी की बात अप्सरा बताती हैं, एक दिन रणधीर के बड़े भैया हमारे ऑफिस आए, वहां मैंने उनसे शादी की बात की। पहले वह चौंक गए, हालांकि उन्होंने मुझे बस यही बोला कि परिवारवालों से तो रणधीर को ही बात करनी होगी। उधर, रणधीर अपने परिवार से बात करने से डर रहे थे। इसी बीच रणधीर की भाभी अपने बच्चे का इलाज कराने पटना आईं। वह ऑफिस भी आती थीं। उन्हें हम दोनों के बीच प्यार का शक हो गया। भाभी ने जब रणधीर से यह बात पूछी तो उन्होंने सच बताया। होली के दिन भाभी ने गांव में ये बात आउट कर दी। उन्होंने परिवार वालों के सामने हम दोनों के प्यार की बात रखी। पहले तो रणधीर को घर में काफी समझाया गया, गांव में सामाजिक बैठकी भी हुई। लेकिन, रणधीर की जिद को देखकर परिवार वाले एक बार लड़की और उनके परिवार से मिलने को राजी हो गए। ऑफिस में हुई थी अप्सरा-रणधीर की सगाई आगे अप्सरा बोलीं, मैंने पिता से सारी बातें कहीं। पापा को इससे कोई परेशानी नहीं थी, बस वह चाहते थे कि लड़का अच्छा कमाए ताकि उनकी बेटी को सही से रख सके। दोनों परिवार पटना में ही मिले और अपने बच्चों के प्यार-जिद के आगे झुक कर शादी तय हो गई। सारे ताम-झाम से दूर सगाई मई 2006 में ऑफिस में ही हुई। 12 जून को शादी की तारीख तय हुई। बारात में कोई परिवार वाला नहीं हुआ था शामिल शादी वाले दिन जब रणधीर बारात लेकर अप्सरा के घर जा रहे थे, तब उनकी बारात में घर से कोई भी शामिल नहीं हुआ। न भाई, न पिता, न रिश्तेदार और न ही गांव से कोई लोग बारात में गए। रणधीर ने बताया, उस वक्त गांव के लोगों ने मुझे कहा कि अगर आज हम आपकी बारात में चले जाएंगे तो आगे चलकर हमारे बच्चों को इससे प्रेरणा मिलेगी। फिर गांव की बदनामी होगी। त मैंने सभी से आशीर्वाद लिया और कुल देवता को प्रणाम कर अकेले ही गांव से निकल गया। मेरे दोस्त बाराती बनकर अप्सरा के घर तक पहुंचे। कुलदेवी के मंदिर से बाहर निकाल दिया गया शादी काफी धूमधाम से हुई और जब अप्सरा घर आई तो उनका अच्छे से स्वागत किया गया। अप्सरा बताती हैं, शुरू में मुझे परिवार में एडजेस्ट होने में काफी परेशानी हुई। हालांकि, मेरे सास ससुर ने मुझे बहुत सपोर्ट किया, लेकिन मुझे कई ताने भी सुनने को मिले। ब्राह्मण नहीं होने के कारण एक बार मुझे अपने ही ससुराल के कुलदेवी के मंदिर से निकाल दिया गया। यह चीज मैं आज भी नहीं भूल पाई हूं कि मुझे अपने ही घर के पूजा की डेहरी से बाहर निकाल दिया गया था। हालांकि, मेरे पति ने मेरा हर कदम पर साथ दिया और आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट किया है। उन्होंने सीधे कहा कि घर बैठने के लिए मैं तुम्हें नहीं लेकर आया हूं। तुम जो चाहे वह काम कर सकती हो। आर्थिक तंगी के कारण KBC में किया ट्राई, दिल्ली आने के लिए आया कॉल शादी की बाद दोनों की जिंदगी अच्छी कट रही थी। मैगजीन से आमदनी हो रही थी। इसी बीच रणधीर इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर के रूप में अलग-अलग कॉलेज में पढ़ाने भी लगे थे। दोनों के दो बच्चे- एक बेटी और एक बेटा भी हुए। परिवार बढ़ने के बाद जिम्मेदारी भी बढ़ी और फिर पैसे की कुछ तंगी भी आ गई। इसी बीच रणधीर ने कौन बनेगा करोड़पति में ट्राई किया। उन्हें मई 2025 में केबीसी से दिल्ली आने का कॉल आया। दिल्ली जाने के पैसे नहीं थे तो अप्सरा ने ही उन्हें उधार लेकर 10 हजार रुपए दिए और दिल्ली भेजा। उसी दिन पार्टी कार्यालय से अप्सरा के महिला आयोग में सदस्य बनने को लेकर कॉल आया। एक ही दिन पर दोहरी खुशखबरी पाकर दोनों काफी खुश है। रणधीर दिल्ली गए, दो राउंड के आगे उनका सिलेक्शन नहीं हुआ और वह वापस पटना आ जाए। इस बात से वह काफी निराश थे। हालांकि 6 जून 2025 को बिहार सरकार की ओर से बिहार राज्य महिला आयोग को लेकर चिट्ठी निकाली गई, जिसमें अप्सरा को अध्यक्ष के रूप में मनोनीत किया गया था। अप्सरा मिश्रा अब महिलाओं को न्याय दिलाती हैं। उनके खिलाफ हो रहे जुर्म पर आवाज उठाती हैं। पति-पत्नी से जुड़े कई मामलों को सुलझाती हैं।


