राज्य सभा चुनाव में एक सीट पर जीत सुनिश्चित करने के लिए तेजस्वी यादव ने पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन इसके बावजूद RJD प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा। बिहार में राज्यसभा की पांचों सीटों पर हुए चुनाव में एनडीए ने सभी सीटों पर जीत दर्ज की। विधानसभा चुनाव के बाद राज्य सभा में मिली यह हार तेजस्वी यादव के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है।इस हार के साथ तेजस्वी यादव के सामने एक बड़ी मजबूरी भी खड़ी हो गई है। जिस विधायक की वजह से उनके प्रत्याशी को हार मिली, उसके खिलाफ वे कोई सख्त कार्रवाई भी नहीं कर सकते।
तेजस्वी यादव क्यों नहीं कर सकते कार्रवाई?
तेजस्वी यादव राज्य सभा चुनाव के दौरान मतदान से गायब रहे अपने विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। अगर वे ऐसा करते हैं, तो उनकी खुद की नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है। दरअसल, 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए किसी भी पार्टी के पास कम से कम 10% यानी 25 विधायक होने जरूरी हैं। फिलहाल RJD के पास ठीक 25 विधायक ही हैं। ऐसे में यदि पार्टी किसी एक विधायक को भी निष्कासित करती है, तो उसकी संख्या घटकर 24 रह जाएगी।
इस स्थिति में RJD नेता प्रतिपक्ष का दर्जा खो सकती है। यही वजह है कि तेजस्वी यादव मतदान से अनुपस्थित रहे अपने विधायक फैसल रहमान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं।
हालांकि, वर्ष 2010 में जब RJD को सिर्फ 22 सीटें मिली थीं, तब नीतीश कुमार की सहमति से अब्दुल बारी सिद्दीकी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया गया था। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह कहना मुश्किल है कि सत्ता पक्ष RJD को ऐसा कोई लाभ देगा। यदि नेता प्रतिपक्ष का दर्जा जाता है, तो तेजस्वी यादव से कैबिनेट मंत्री का दर्जा और सरकारी आवास भी वापस लिया जा सकता है।
फैसल रहमान पर पार्टी चुप
RJD विधायक फैसल रहमान पर कार्रवाई को लेकर पूछे गए सवाल पर पार्टी प्रवक्ता शक्ति यादव ने कहा कि इस मामले को देखा जाएगा और पार्टी संविधान के अनुसार निर्णय लिया जाएगा। जब उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी उनके निष्कासन के लिए विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखेगी, तो इस पर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
आगे कुआं, पीछे खाई
सीनियर पत्रकार लव कुमार का कहना है कि मौजूदा समय में RJD की स्थिति “आगे कुआं, पीछे खाई” जैसी हो गई है। वे कहते हैं कि यदि प्रदेश में नीतीश कुमार की सरकार होती, तो RJD अपने विधायक के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर सकती थी। लेकिन भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने की स्थिति में पार्टी ऐसा कदम उठाने से बचेगी। उन्होंने यह भी कहा कि नीतीश कुमार राजनीतिक मतभेदों के बावजूद लालू परिवार के प्रति एक तरह की सहानुभूति रखते थे, जबकि भाजपा नेतृत्व के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।


