बेतिया गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज अस्पताल (GMCH) में मरीज के परिजनों से मारपीट के मामले में दैनिक भास्कर की खबर का बड़ा असर देखने को मिला है। पुलिस ने इस गंभीर प्रकरण में पहली बार जीएमसीएच के डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया है। एफआईआर दर्ज होने के बाद अस्पताल प्रशासन, चिकित्सा व्यवस्था और ट्रेनी डॉक्टरों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहन जांच में जुट गई है। मृत शिक्षिका के बेटे के आवेदन पर दर्ज हुई एफआईआर सदर एसडीपीओ विवेक दीप ने बताया कि नगर थाना में दर्ज एफआईआर के आधार पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और सभी तथ्यों, साक्ष्यों व आरोपों को गंभीरता से खंगाला जा रहा है। यह एफआईआर शहर के क्रिश्चियन क्वार्टर निवासी ज्ञान प्रकाश हेलारियन के बेटे विशाल राज के आवेदन पर दर्ज की गई है। विशाल राज की मां सुशीला देवी, जो केआर स्कूल की पूर्व शिक्षिका थीं, की 21 जनवरी की रात जीएमसीएच में मौत हो गई थी। इलाज के दौरान हुआ विवाद, मौत के बाद भड़का मामला एफआईआर के अनुसार, 21 जनवरी की रात करीब 8 बजे विशाल राज अपनी मां सुशीला देवी को गंभीर हालत में जीएमसीएच लेकर पहुंचे थे। उस समय मरीज को ऑक्सीजन मास्क लगाया गया था। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों से स्पष्ट रूप से कहा था कि ईसीजी किए बिना ऑक्सीजन मास्क न हटाया जाए, लेकिन डॉक्टरों ने उनकी बात नहीं मानी। शराब की दुर्गंध और दलालों को बुलाने का आरोप विशाल राज ने अपने बयान में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बातचीत के दौरान डॉक्टरों के मुंह से शराब की दुर्गंध आ रही थी। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो डॉक्टरों ने अस्पताल में सक्रिय कथित दलालों और अपने साथियों को बुला लिया। इसके बाद सभी ने मिलकर उनके साथ बेरहमी से मारपीट की, जिससे वे अधमरा हो गए। सोने की चेन छीनने और गालियां देने का भी आरोप आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि मारपीट के दौरान आरोपियों ने विशाल राज के गले से करीब एक लाख रुपए मूल्य की सोने की चेन छीन ली। इसके अलावा मां-बहन को लेकर भद्दी गालियां दी गईं। मारपीट के कारण उन्हें अंदरूनी चोटें आईं, जिनका वे फिलहाल इलाज करा रहे हैं। पीड़ित पक्ष का दावा है कि घटना के समय अस्पताल में मौजूद मरीज, उनके परिजन और कर्मचारी इस पूरी घटना के प्रत्यक्षदर्शी हैं। मां की मौत में लापरवाही का आरोप विशाल राज ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही के कारण ही उनकी मां की मौत हुई। मां के दाह-संस्कार के कारण एफआईआर दर्ज कराने में कुछ दिन की देरी हुई, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि न्याय की मांग कमजोर है। परिजनों ने डॉक्टरों, अस्पताल प्रशासन और उनके संरक्षण में काम कर रहे कथित दलालों के खिलाफ मारपीट, जानलेवा हमला, चोरी और नशे में अपराध की धाराओं में कार्रवाई की मांग की है। सीसीटीवी और बायोमेट्रिक जांच की मांग पीड़ित परिवार ने पुलिस से अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज, स्टाफ उपस्थिति पंजी और बायोमेट्रिक अटेंडेंस की जांच कराने की भी मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना के समय कौन-कौन डॉक्टर और कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद थे। अधीक्षक का पक्ष: मरीज पहले से थी मृत वहीं इस मामले में अस्पताल अधीक्षक डॉ. सुधा भारती ने अलग पक्ष रखा है। उन्होंने बताया कि मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत अवस्था में थी। मौत की पुष्टि के लिए डॉक्टर ने ऑक्सीजन मास्क हटाया था, इसी बात को लेकर परिजन नाराज हो गए और डॉक्टर को थप्पड़ मार दिया। इसके बाद विवाद बढ़ गया। अधीक्षक के अनुसार, डॉक्टरों पर लगाए गए सभी आरोप सही नहीं हैं। GMCH में पहले भी हो चुकी हैं मारपीट की घटनाएं जीएमसीएच में मारपीट की यह कोई पहली घटना नहीं है। शिक्षिका सुशीला देवी की मौत के अगले ही दिन बस स्टैंड निवासी संदेश मिश्र के साथ मारपीट हुई।इसके अलावा चनपटिया के टिकुलिया निवासी झुन्नू साह के परिजनों को मौत के बाद दौड़ा-दौड़ा कर पीटने, 25 नवंबर को देवनगर निवासी प्राणंजय कुमार की स्थिति बिगड़ने पर परिजनों से मारपीट,और 22 दिसंबर को जीविका दीदी की रसोई में दही को लेकर हुए विवाद में जीविका दीदियों की पिटाई जैसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। एक्सपर्ट व्यू: इंटर्न डॉक्टरों को विशेष कानूनी संरक्षण नहीं सेवानिवृत्त पुलिस निरीक्षक के.के. गुप्ता का कहना है कि राज्य सरकार के अधीन इंटर्नशिप कर रहे जूनियर डॉक्टर सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते। वे प्रशिक्षु होते हैं, इसलिए उन्हें नियमित या राजपत्रित अधिकारियों जैसी विशेष कानूनी सुरक्षा स्वतः प्राप्त नहीं होती। इंटर्नशिप का उद्देश्य केवल चिकित्सकीय प्रशिक्षण है, न कि प्रशासनिक या दमनकारी भूमिका निभाना। व्यवस्था और संवेदनशीलता पर सवाल चिकित्सकों को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता है, लेकिन बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाएं न सिर्फ मरीजों की सुरक्षा बल्कि अस्पताल की पूरी व्यवस्था और मेडिकल छात्रों के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। अब देखना यह है कि पुलिस जांच में सच्चाई क्या सामने आती है और दोषियों पर कब तक कार्रवाई होती है। बेतिया गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज अस्पताल (GMCH) में मरीज के परिजनों से मारपीट के मामले में दैनिक भास्कर की खबर का बड़ा असर देखने को मिला है। पुलिस ने इस गंभीर प्रकरण में पहली बार जीएमसीएच के डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया है। एफआईआर दर्ज होने के बाद अस्पताल प्रशासन, चिकित्सा व्यवस्था और ट्रेनी डॉक्टरों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहन जांच में जुट गई है। मृत शिक्षिका के बेटे के आवेदन पर दर्ज हुई एफआईआर सदर एसडीपीओ विवेक दीप ने बताया कि नगर थाना में दर्ज एफआईआर के आधार पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और सभी तथ्यों, साक्ष्यों व आरोपों को गंभीरता से खंगाला जा रहा है। यह एफआईआर शहर के क्रिश्चियन क्वार्टर निवासी ज्ञान प्रकाश हेलारियन के बेटे विशाल राज के आवेदन पर दर्ज की गई है। विशाल राज की मां सुशीला देवी, जो केआर स्कूल की पूर्व शिक्षिका थीं, की 21 जनवरी की रात जीएमसीएच में मौत हो गई थी। इलाज के दौरान हुआ विवाद, मौत के बाद भड़का मामला एफआईआर के अनुसार, 21 जनवरी की रात करीब 8 बजे विशाल राज अपनी मां सुशीला देवी को गंभीर हालत में जीएमसीएच लेकर पहुंचे थे। उस समय मरीज को ऑक्सीजन मास्क लगाया गया था। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों से स्पष्ट रूप से कहा था कि ईसीजी किए बिना ऑक्सीजन मास्क न हटाया जाए, लेकिन डॉक्टरों ने उनकी बात नहीं मानी। शराब की दुर्गंध और दलालों को बुलाने का आरोप विशाल राज ने अपने बयान में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बातचीत के दौरान डॉक्टरों के मुंह से शराब की दुर्गंध आ रही थी। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो डॉक्टरों ने अस्पताल में सक्रिय कथित दलालों और अपने साथियों को बुला लिया। इसके बाद सभी ने मिलकर उनके साथ बेरहमी से मारपीट की, जिससे वे अधमरा हो गए। सोने की चेन छीनने और गालियां देने का भी आरोप आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि मारपीट के दौरान आरोपियों ने विशाल राज के गले से करीब एक लाख रुपए मूल्य की सोने की चेन छीन ली। इसके अलावा मां-बहन को लेकर भद्दी गालियां दी गईं। मारपीट के कारण उन्हें अंदरूनी चोटें आईं, जिनका वे फिलहाल इलाज करा रहे हैं। पीड़ित पक्ष का दावा है कि घटना के समय अस्पताल में मौजूद मरीज, उनके परिजन और कर्मचारी इस पूरी घटना के प्रत्यक्षदर्शी हैं। मां की मौत में लापरवाही का आरोप विशाल राज ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों की लापरवाही के कारण ही उनकी मां की मौत हुई। मां के दाह-संस्कार के कारण एफआईआर दर्ज कराने में कुछ दिन की देरी हुई, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि न्याय की मांग कमजोर है। परिजनों ने डॉक्टरों, अस्पताल प्रशासन और उनके संरक्षण में काम कर रहे कथित दलालों के खिलाफ मारपीट, जानलेवा हमला, चोरी और नशे में अपराध की धाराओं में कार्रवाई की मांग की है। सीसीटीवी और बायोमेट्रिक जांच की मांग पीड़ित परिवार ने पुलिस से अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज, स्टाफ उपस्थिति पंजी और बायोमेट्रिक अटेंडेंस की जांच कराने की भी मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना के समय कौन-कौन डॉक्टर और कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद थे। अधीक्षक का पक्ष: मरीज पहले से थी मृत वहीं इस मामले में अस्पताल अधीक्षक डॉ. सुधा भारती ने अलग पक्ष रखा है। उन्होंने बताया कि मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत अवस्था में थी। मौत की पुष्टि के लिए डॉक्टर ने ऑक्सीजन मास्क हटाया था, इसी बात को लेकर परिजन नाराज हो गए और डॉक्टर को थप्पड़ मार दिया। इसके बाद विवाद बढ़ गया। अधीक्षक के अनुसार, डॉक्टरों पर लगाए गए सभी आरोप सही नहीं हैं। GMCH में पहले भी हो चुकी हैं मारपीट की घटनाएं जीएमसीएच में मारपीट की यह कोई पहली घटना नहीं है। शिक्षिका सुशीला देवी की मौत के अगले ही दिन बस स्टैंड निवासी संदेश मिश्र के साथ मारपीट हुई।इसके अलावा चनपटिया के टिकुलिया निवासी झुन्नू साह के परिजनों को मौत के बाद दौड़ा-दौड़ा कर पीटने, 25 नवंबर को देवनगर निवासी प्राणंजय कुमार की स्थिति बिगड़ने पर परिजनों से मारपीट,और 22 दिसंबर को जीविका दीदी की रसोई में दही को लेकर हुए विवाद में जीविका दीदियों की पिटाई जैसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। एक्सपर्ट व्यू: इंटर्न डॉक्टरों को विशेष कानूनी संरक्षण नहीं सेवानिवृत्त पुलिस निरीक्षक के.के. गुप्ता का कहना है कि राज्य सरकार के अधीन इंटर्नशिप कर रहे जूनियर डॉक्टर सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते। वे प्रशिक्षु होते हैं, इसलिए उन्हें नियमित या राजपत्रित अधिकारियों जैसी विशेष कानूनी सुरक्षा स्वतः प्राप्त नहीं होती। इंटर्नशिप का उद्देश्य केवल चिकित्सकीय प्रशिक्षण है, न कि प्रशासनिक या दमनकारी भूमिका निभाना। व्यवस्था और संवेदनशीलता पर सवाल चिकित्सकों को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता है, लेकिन बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाएं न सिर्फ मरीजों की सुरक्षा बल्कि अस्पताल की पूरी व्यवस्था और मेडिकल छात्रों के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। अब देखना यह है कि पुलिस जांच में सच्चाई क्या सामने आती है और दोषियों पर कब तक कार्रवाई होती है।


