अरवल में गुरुवार को बामसेफ और भारत मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन पर प्रशासन द्वारा लगाई गई रोक के विरोध में जोरदार धरना-प्रदर्शन किया गया। यह प्रदर्शन अरवल प्रखंड परिसर में आयोजित हुआ। भारत मुक्ति मोर्चा के जिला अध्यक्ष राकेश कुमार के नेतृत्व में हुए इस धरने में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय अधिवेशन शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित किया जाना था। नेताओं ने आरोप लगाया कि अधिवेशन के लिए सभी आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं समय पर पूरी कर ली गई थीं, इसके बावजूद प्रशासन ने अनुमति रद्द कर दी। वक्ताओं ने इसे राजनीतिक दबाव में लिया गया निर्णय बताया, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b), 19(1)(c) और अनुच्छेद 14 का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा, संगठन बनाने और समानता का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है। ऐसे में किसी सामाजिक या वैचारिक संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन पर रोक लगाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। धरने में यह भी बताया गया कि यह अधिवेशन ओबीसी, एससी, एसटी और मूलनिवासी समाज से जुड़े संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के अहम मुद्दों पर चर्चा के लिए आयोजित किया जा रहा था। वक्ताओं ने विशेष रूप से ओबीसी की जाति आधारित जनगणना जैसे मुद्दों को दबाने की कोशिशों को लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के कथन का हवाला देते हुए कहा कि मौलिक अधिकार तभी सार्थक हैं, जब उनके संरक्षण की व्यवस्था हो। भारत मुक्ति मोर्चा ने प्रशासन और सरकार के समक्ष पांच प्रमुख मांगें रखीं। इनमें राष्ट्रीय अधिवेशन की अनुमति तत्काल बहाल करने, कार्यकर्ताओं को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई करने, भविष्य में संवैधानिक कार्यक्रमों को राजनीतिक दबाव में न रोकने, जाति आधारित जनगणना से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच तथा संविधान की रक्षा के लिए राष्ट्रपति से आवश्यक हस्तक्षेप की मांग शामिल है। नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि इन मांगों पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो भारत मुक्ति मोर्चा, बामसेफ और सहयोगी संगठन देशव्यापी, शांतिपूर्ण और चरणबद्ध आंदोलन को और तेज करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और बहुजन समाज के अधिकारों की रक्षा की है। अरवल में गुरुवार को बामसेफ और भारत मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन पर प्रशासन द्वारा लगाई गई रोक के विरोध में जोरदार धरना-प्रदर्शन किया गया। यह प्रदर्शन अरवल प्रखंड परिसर में आयोजित हुआ। भारत मुक्ति मोर्चा के जिला अध्यक्ष राकेश कुमार के नेतृत्व में हुए इस धरने में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय अधिवेशन शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित किया जाना था। नेताओं ने आरोप लगाया कि अधिवेशन के लिए सभी आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं समय पर पूरी कर ली गई थीं, इसके बावजूद प्रशासन ने अनुमति रद्द कर दी। वक्ताओं ने इसे राजनीतिक दबाव में लिया गया निर्णय बताया, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b), 19(1)(c) और अनुच्छेद 14 का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा, संगठन बनाने और समानता का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है। ऐसे में किसी सामाजिक या वैचारिक संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन पर रोक लगाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। धरने में यह भी बताया गया कि यह अधिवेशन ओबीसी, एससी, एसटी और मूलनिवासी समाज से जुड़े संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के अहम मुद्दों पर चर्चा के लिए आयोजित किया जा रहा था। वक्ताओं ने विशेष रूप से ओबीसी की जाति आधारित जनगणना जैसे मुद्दों को दबाने की कोशिशों को लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के कथन का हवाला देते हुए कहा कि मौलिक अधिकार तभी सार्थक हैं, जब उनके संरक्षण की व्यवस्था हो। भारत मुक्ति मोर्चा ने प्रशासन और सरकार के समक्ष पांच प्रमुख मांगें रखीं। इनमें राष्ट्रीय अधिवेशन की अनुमति तत्काल बहाल करने, कार्यकर्ताओं को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई करने, भविष्य में संवैधानिक कार्यक्रमों को राजनीतिक दबाव में न रोकने, जाति आधारित जनगणना से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच तथा संविधान की रक्षा के लिए राष्ट्रपति से आवश्यक हस्तक्षेप की मांग शामिल है। नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि इन मांगों पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो भारत मुक्ति मोर्चा, बामसेफ और सहयोगी संगठन देशव्यापी, शांतिपूर्ण और चरणबद्ध आंदोलन को और तेज करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और बहुजन समाज के अधिकारों की रक्षा की है।


