लखीसराय के तीन दिन के एक नवजात को पटना के सबसे बड़े अस्पतालों एम्स और पीएमसीएच में बेड नहीं मिला। वेंटिलेटर सपोर्ट एंबुलेंस से उसके परिजन अस्पतालों की दौड़ लगाते रहे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली। 48 घंटे तक मौत से जंग लड़ते-लड़ते उसने दम तोड़ दिया। लखीसराय जिले के हालसी थाना क्षेत्र के सांडमाथ गांव की रहने वाली काजल कुमारी ने 30 मार्च को वहां के सदर अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया था। 24 घंटे के भीतर ही नवजात की हालत बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने उसे पटना रेफर कर दिया। परिवार को उम्मीद थी कि राजधानी में बेहतर इलाज मिलेगा और बच्चे की जान बच जाएगी। लेकिन, राज्य के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल एम्स और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा अस्पताल बनने जा रहे पीएमसीएच में उसे एक बेड भी नहीं मिल सका। आखिरकार, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं ने एक मां की गोद सूनी कर दी। 48 घंटे की वो तड़प, जो किसी ने नहीं सुनी 30 मार्च : लखीसराय सदर अस्पताल में जन्म। 24 घंटे बाद सांस लेने में तकलीफ। डॉक्टरों ने पटना रेफर किया। 31 मार्च : वेंटिलेटर वाली एंबुलेंस से परिजन एम्स पटना पहुंचे। जवाब मिला-बेड खाली नहीं है, कहीं और ले जाइए। 1 अप्रैल (सुबह 5 बजे) : पीएमसीएच पहुंचे। यहां भी शिशु विभाग के बाहर घंटों मिन्नतें कीं, पर बेड नहीं मिला। 1 अप्रैल (दोपहर) : मजबूरी में निजी अस्पताल गए। 12 घंटे में 51 हजार का बिल बना। विवाद बढ़ा तो डायल 112 ने 15 हजार में मामला सुलझाया। 2 अप्रैल : इलाज के अभाव में निराश मां बच्चे को लेकर गांव लौटी, जहां उसने दम तोड़ दिया। पीएमसीएच के अधीक्षक ने कहा-अभी गंभीर मरीजों के लिए 88 बेड ही हैं, जो भरे रहते हैं पीएमसीएच में अभी पहले फेज में नीकु आैर पीकु के 58 बेड हैं। इसके अलावा आईपीडी में 30 बेड हैं। ये सभी बेड हमेशा भरे रहते हैं। ऐसे में वैसे गंभीर मरीज, जिन्हें पीकु या नीकु में भर्ती करने की जरूरत पड़ती है, उन्हें निराश लौटना पड़ता है। सामान्य मरीजों को इलाज के लिए भर्ती कर लिया जाता है। दूसरे फेज में बेड बढ़ाने की कोशिश हो रही है।-डॉ. राजीव कुमार सिंह, अधीक्षक, पीएमसीएच डॉक्टरों के पैर पकड़ते रहे, पर किसी ने नहीं सुनी डॉक्टरों के पैर पकड़ती रही, हाथ जोड़ती रही कि मेरे बच्चे को बचा लीजिए, लेकिन सबका दिल पत्थर का हो चुका था। अस्पताल बड़े हैं, पर इंसानियत छोटी पड़ गई। वेंटिलेटर सपोर्ट एंबुलेंस से बच्चे को लेकर एक से दूसरे अस्पताल का चक्कर लगाती रही, लेकिन उसके इलाज के लिए एक बेड तक नहीं मिल सका।-रेखा कुमारी, बच्चे की मौसी सिस्टम पर सवाल वेंटिलेटर सपोर्ट एंबुलेंस से परिजन अस्पतालों की दौड़ लगाते रहे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली मां की ममता हारीसिस्टम की बदहाली जीती 1. जब लखीसराय से रेफर किया गया तो पटना में बेड की उपलब्धता चेक की गई? 2. 88 बेड राज्यभर के करोड़ों बच्चों के लिए काफी हैं? 3. निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम कौन लगाएगा? लखीसराय के तीन दिन के एक नवजात को पटना के सबसे बड़े अस्पतालों एम्स और पीएमसीएच में बेड नहीं मिला। वेंटिलेटर सपोर्ट एंबुलेंस से उसके परिजन अस्पतालों की दौड़ लगाते रहे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली। 48 घंटे तक मौत से जंग लड़ते-लड़ते उसने दम तोड़ दिया। लखीसराय जिले के हालसी थाना क्षेत्र के सांडमाथ गांव की रहने वाली काजल कुमारी ने 30 मार्च को वहां के सदर अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया था। 24 घंटे के भीतर ही नवजात की हालत बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने उसे पटना रेफर कर दिया। परिवार को उम्मीद थी कि राजधानी में बेहतर इलाज मिलेगा और बच्चे की जान बच जाएगी। लेकिन, राज्य के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल एम्स और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा अस्पताल बनने जा रहे पीएमसीएच में उसे एक बेड भी नहीं मिल सका। आखिरकार, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं ने एक मां की गोद सूनी कर दी। 48 घंटे की वो तड़प, जो किसी ने नहीं सुनी 30 मार्च : लखीसराय सदर अस्पताल में जन्म। 24 घंटे बाद सांस लेने में तकलीफ। डॉक्टरों ने पटना रेफर किया। 31 मार्च : वेंटिलेटर वाली एंबुलेंस से परिजन एम्स पटना पहुंचे। जवाब मिला-बेड खाली नहीं है, कहीं और ले जाइए। 1 अप्रैल (सुबह 5 बजे) : पीएमसीएच पहुंचे। यहां भी शिशु विभाग के बाहर घंटों मिन्नतें कीं, पर बेड नहीं मिला। 1 अप्रैल (दोपहर) : मजबूरी में निजी अस्पताल गए। 12 घंटे में 51 हजार का बिल बना। विवाद बढ़ा तो डायल 112 ने 15 हजार में मामला सुलझाया। 2 अप्रैल : इलाज के अभाव में निराश मां बच्चे को लेकर गांव लौटी, जहां उसने दम तोड़ दिया। पीएमसीएच के अधीक्षक ने कहा-अभी गंभीर मरीजों के लिए 88 बेड ही हैं, जो भरे रहते हैं पीएमसीएच में अभी पहले फेज में नीकु आैर पीकु के 58 बेड हैं। इसके अलावा आईपीडी में 30 बेड हैं। ये सभी बेड हमेशा भरे रहते हैं। ऐसे में वैसे गंभीर मरीज, जिन्हें पीकु या नीकु में भर्ती करने की जरूरत पड़ती है, उन्हें निराश लौटना पड़ता है। सामान्य मरीजों को इलाज के लिए भर्ती कर लिया जाता है। दूसरे फेज में बेड बढ़ाने की कोशिश हो रही है।-डॉ. राजीव कुमार सिंह, अधीक्षक, पीएमसीएच डॉक्टरों के पैर पकड़ते रहे, पर किसी ने नहीं सुनी डॉक्टरों के पैर पकड़ती रही, हाथ जोड़ती रही कि मेरे बच्चे को बचा लीजिए, लेकिन सबका दिल पत्थर का हो चुका था। अस्पताल बड़े हैं, पर इंसानियत छोटी पड़ गई। वेंटिलेटर सपोर्ट एंबुलेंस से बच्चे को लेकर एक से दूसरे अस्पताल का चक्कर लगाती रही, लेकिन उसके इलाज के लिए एक बेड तक नहीं मिल सका।-रेखा कुमारी, बच्चे की मौसी सिस्टम पर सवाल वेंटिलेटर सपोर्ट एंबुलेंस से परिजन अस्पतालों की दौड़ लगाते रहे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली मां की ममता हारीसिस्टम की बदहाली जीती 1. जब लखीसराय से रेफर किया गया तो पटना में बेड की उपलब्धता चेक की गई? 2. 88 बेड राज्यभर के करोड़ों बच्चों के लिए काफी हैं? 3. निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम कौन लगाएगा?


