वाराणसी कोर्ट ने गुरुवार को 22 साल पुराने केस में तत्कालीन बीडीओ और एडीओ पंचायत को मारपीट और जातिसूचक गाली गलौज के आरोपों में बरी कर दिया। उनके खिलाफ तैनाती के दौरान और रिटायरमेंट तक वाराणसी कोर्ट में केस चलता रहा। लंबी पैरवी और मजबूत दलीलों के बीच कोर्ट ने कांग्रेस नेत्री की ओर से लगाए गए आरोपों को निराधार माना। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए आरोपी काशी पाण्डेय और रविन्द्र कुमार सिंह को दोषमुक्त (बरी) कर दिया है। विशेष न्यायालय (एससी-एसटी एक्ट) के न्यायाधीश देवकांत शुक्ला की अदालत ने थाना रोहनियां में दर्ज एक गंभीर आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत में आरोपी रविन्द्र कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता अरुण कुमार सिंह और उनके सहयोगी अधिवक्ता अजय कुमार पांडेय ने पक्ष रखा।
पहले जानिए पूरा मामला अभियोजन के अनुसार मामला साल 2002 का है जब ग्राम बीरभानपुर (राजातालाब) निवासी और कांग्रेस पार्टी की पदाधिकारी चन्द्रकला देवी के साथ अभद्रता हुई थी। थाना, पुलिस और तहसील में उनकी सुनवाई नहीं हुइ तो उन्होंने पुलिस कमिश्नर को अप्लीकेशन देकर शिकायत दर्ज कराई थी। सीपी को दी तहरीर में आरोप लगाया था कि 01 फरवरी 2002 को जब वह ब्लॉक मुख्यालय राजातालाब गई थीं। तब वहां मौजूद ग्राम विकास अधिकारी काशी पाण्डेय और ए०डी०ओ० पंचायत रविन्द्र सिंह ने उनके साथ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। आरोप लगाया कि आरोपियों ने गाली-गलौज की, अभद्रता की और विरोध करने पर मारपीट व धक्का-मुक्की कर उन्हें ब्लॉक परिसर से बाहर निकाल दिया। वादिनी का यह भी आरोप था कि थाने जाने पर भी आरोपियों ने वहां पहुंचकर धमकी दी थी। शुरुआत में मामला दर्ज न होने पर पीड़िता ने उच्चाधिकारियों से गुहार लगाई थी। जांच के बाद 11 अप्रैल 2002 को थाना रोहनियां में आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 143, 323, 504, 506 और एससी-एसटी एक्ट की धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। लंबी सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने पाया कि आरोपियों के विरुद्ध दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।


