Three Students Become Pregnant: बस्तर के आश्रम-छात्रावास और पोटाकेबिन में रहने वाली छात्राएं असुरक्षित हैं। हम ऐसा इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि साल 2025 से अब तक आश्रम-छात्रावासों में रह रहीं छात्राओं के गर्भवती होने के मामले बढ़े हैं। इस साल बीजापुर जिले के कुल चार मामले और सुकमा के कोंटा से एक मामला सामने आ चुका है। बस्तर के लिए 2013 में कांकेर के झलियामारी कांड के बाद राज्य सरकार ने एक गाइडलाइन तय की थी।
Three Students Pregnant: विभाग ने नहीं लिया कोई सबक
इसके तहत बस्तर के आश्रम-छात्रावासों और पोटाकेबिन में रह रहीं छात्राओं के लिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के दावे किए गए थे। 2013 के बाद से अब तक कई ऐसे मौके आए जब छात्राओं के गर्भवती होने के मामले सुर्खियों में बन रहे। इससे यह तय हो गया कि झलियामारी कांड से राज्य सरकार और जिम्मेदार विभाग ने कोई सबक नहीं लिया। आश्रम-छात्रावासों में रह रहीं छात्राओं की निगरानी और उनके आश्रम-छात्रावास से आने जाने का डेटा हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है।
सरकार व परिजन के बयान में अंतर
बीजापुर के एक पोटाकेबिन से तीन छात्राओं के गर्भवती होने का मामला सामने आया तो विपक्षी विधायक विक्रम मंडावी ने विधानसभा में सरकार को घेरा। इसके बाद शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। हालांकि छात्राओं के पोटाकेबिन से होने पर अब भी सवाल बना हुआ है। छात्राओं के परिजन और सरकार के बयान में अंतर की स्थिति बनी हुई है। इसी तरह दो दिन पहले कोंटा के आश्रम से भी छात्रा के गर्भवती होने का मामला सामने आया। उसे गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचाया गया था।
देखरेख और निगरानी पर उठे सवाल
बीजापुर और कोंटा की हालिया घटना के बाद छात्रावास में रहने वाली छात्राओं की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। यह भी पूछा जा रहा है कि यदि छात्राएं लंबे समय से गर्भवती थीं तो इसकी जानकारी प्रबंधन को समय रहते क्यों नहीं मिली और इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
निगरानी प्रोटोकॉल तय पर, परिणाम शून्य
बस्तर के हर जिले में एक जिला शिक्षा अधिकारी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी, खंड स्रोत समन्वयक, सहायक खंड शिक्षा अधिकारी और मंडल संयोजक जैसे अधिकारी पदस्थ हैं, इसके बावजूद आवासीय संस्थाओं की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सबकी जिम्मेदारी है कि वे समय पर छात्रावासों की जांच करें पर ऐसा होता नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आश्रम, छात्रावास और पोटा केबिन संस्थाओं का नियमित निरीक्षण नहीं हो रहा और विभागीय दौरे अक्सर केवल औपचारिकता तक सीमित रह जाते हैं।
ये था मामला
झलियामारी कांड छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में 2013 में हुई एक बेहद वीभत्स और शर्मनाक घटना थी, जिसने राज्य में हॉस्टल और आश्रमों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। घटना जून 2013 की है जब झलियामारी कन्या आश्रम में 15 नाबालिग आदिवासी छात्राओं के साथ यौन शोषण और सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया था। इस मामले में आश्रम के ही कर्मचारियों, रसोइयों और कुछ बाहरी लोगों ने मिलकर लंबे समय तक छात्राओं को डरा-धमकाकर उनका यौन शोषण किया था। इस घटना के बाद, 31 अक्टूबर 2013 को एक विशेष अदालत ने इस मामले में 3 मुख्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में, साक्ष्य छिपाने के आरोप में अन्य लोगों को भी सजा हुई थी।
इस तय गाइडलाइन पर अमल नहीं
- सीसीटीवी कैमरे सभी सरकारी और निजी हॉस्टलों व आश्रमों में सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य।
- महिला वार्डन/स्टाफ आश्रमों में केवल महिला वार्डन और महिला कर्मचारियों की नियुक्ति को प्राथमिकता।
- हॉस्टल परिसर में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध और सुरक्षा गार्ड की तैनाती।
- जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारी हॉस्टलों का नियमित औचक निरीक्षण करें।
- छात्राओं के लिए शिकायत पेटी, जिसे सीधे कलेक्टर या वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा खोला जाए।


