Digital Campaigning: बांग्लादेश की राजनीति अब ढाका की सड़कों से निकल कर स्मार्टफोन स्क्रीन तक पहुंच गई है। गुरुवार से भले ही उम्मीदवारों ने घर-घर जा कर वोट मांगना (Bangladesh Election 2026) शुरू कर दिया हो, लेकिन असली ‘वॉर रूम’ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर महीनों पहले ही सक्रिय हो चुके हैं। अवामी लीग और बीएनपी जैसी बड़ी पार्टियां अब फेसबुक, यूट्यूब और टिकटॉक (Digital Propaganda) को अपने सबसे बड़े हथियार (Social Media Warfare) के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। बांग्लादेश में करोड़ों युवा मतदाता हैं, जो अपना ज्यादातर समय इंटरनेट पर बिताते हैं। राजनीतिक दलों को पता है कि एक वायरल टिकटॉक वीडियो (TikTok Political Trends) या फेसबुक लाइव लाखों लोगों की राय बदलने की ताकत रखता है। जहां पहले बड़े-बड़े पोस्टरों और लाउडस्पीकरों का बोलबाला था, अब वहां एल्गोरिदम और डेटा एनालिटिक्स की लड़ाई छिड़ी हुई है।
बांग्लादेश में फेसबुक का दबदबा
बांग्लादेश में फेसबुक सूचना का प्राथमिक स्रोत है, इसलिए यहां नैरेटिव सेट करने की सबसे बड़ी होड़ मची हुई है।
बांग्लादेश में यूट्यूब और प्रोपेगेंडा
देश में लंबी वीडियो रिपोर्ट और बहस के जरिये मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
देश में टिकटॉक की लोकप्रियता
छोटे, प्रभावशाली वीडियो के माध्यम से ग्रामीण और युवा मतदाताओं तक सीधी पहुंच बनाई जा रही है।
नेपाल का उदाहरण और प्रतिबंधों का साया
रिपोर्ट्स में अक्सर पड़ोसी देश नेपाल का जिक्र करते हैं, जहां टिकटॉक पर प्रतिबंध के बाद राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट जैसी स्थितियां देखी गई थीं। बांग्लादेश के संबंध में भी यह चिंता जताई जा रही है कि क्या सोशल मीडिया पर पाबंदी या अत्यधिक निगरानी लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है। डिजिटल सुरक्षा कानून और अभिव्यक्ति की आज़ादी के बीच एक बारीक रेखा खींची गई है, जिस पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस जारी है।
भ्रामक खबरें और डीपफेक की चुनौती
इस डिजिटल चुनाव में सबसे बड़ा खतरा ‘फेक न्यूज’ और ‘डीपफेक’ वीडियो का है। एआई (AI) के माध्यम से नेताओं के नकली वीडियो बना कर मतदाताओं को गुमराह करने के प्रयास तेज हो गए हैं। इससे न केवल चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि समाज में ध्रुवीकरण भी बढ़ रहा है।
यह चुनाव डिजिटल साक्षरता” की परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश का यह चुनाव “डिजिटल साक्षरता” की परीक्षा होगा। मतदाताओं के लिए यह पहचानना मुश्किल हो रहा है कि कौन सी खबर सच है और कौन सी प्रायोजित। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी अब पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है ताकि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए न होने दें।
आम चुनाव में युवाओं की भूमिका
एक दिलचस्प पहलू यह है कि सोशल मीडिया ने आम नागरिकों और युवाओं को भी एक आवाज दी है। अब केवल बड़े नेता ही नहीं, बल्कि छोटे ब्लॉगर और इन्फ्लुएंसर भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं। यह ‘लोकतंत्र का डिजिटलीकरण’ है या ‘प्रोपेगेंडा का नया रूप’, यह चुनाव के परिणाम ही तय करेंगे।
देश में अब आगे क्या होगा ?
जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आएगी, इंटरनेट पर सेंसरशिप और डेटा प्राइवेसी के मुद्दे और गरमाएंगे। क्या चुनाव आयोग इन डिजिटल विज्ञापनों और कैम्पेन के खर्च पर लगाम लगा पाएगा? क्या विपक्षी दलों को ऑनलाइन स्पेस में समान अवसर मिलेंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले हफ्तों में बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा तय करेंगे।


