Bangladesh Election: कौन हैं वह चार हिंदू उम्मीदवार, जो चुनावी बाजी जीतकर पहुंचे जातीय संसद

Bangladesh Election: कौन हैं वह चार हिंदू उम्मीदवार, जो चुनावी बाजी जीतकर पहुंचे जातीय संसद

बांग्लादेश के जातीय संसद के चुनावी नतीजे आ गए हैं। इस चुनाव में BNP को बंपर जीत मिली है। बांग्लादेश की चुनाव पर बारिक नजर रखने वालों ने कहा कि हिंदुओं ने बहुतायत से बीएनपी के पक्ष में मतदान किया। पार्टी ने भी चुनाव में 6 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। जिनमें से चार सीटों पर उसे जीत मिली। हालांकि, जमात के एकमात्र हिंदू उम्मीदवार को शिकस्त का सामना करना पड़ा।

ये चार हिंदू उम्मीदवारों ने की जीत दर्ज

  1. ढाका-3 सीट से BNP के उम्मीदवार गायेश्वर चंद्र रॉय ने जीत दर्ज की। जातीय संसद चुनाव में 99 हजार से अधिक मत हासिल किए। यहां जमात एनसीपी गठबंधन और BNP के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। हिंदुओं पर हो रहे लगातार हमलों के बीच उनकी जीत को प्रतीकात्मक रूप से अहम माना जा रहा था।
  2. मागुरा-2 सीट से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के निताई राय चौधरी ने जीत दर्ज की है। उन्हें 1 लाख 47 हजार से अधिक मत मिले। निताई को BNP का अहम अल्पसंख्यक चेहरा माना जाता है। उनकी जीत से पार्टी का हिंदुओं में पैठ मजबूत होने की संभावना है।
  3. रंगामती सीट से BNP के ही दीपेन दीवान चौधरी ने जीत दर्ज की है। यह उनकी तीसरी जीत है। कड़े मुकाबले में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने संसद में जगह बनाई।
  4. बंदरबन क्षेत्र से साचिंग प्रू भी 141000 से ज्यादा वोटों के साथ जीतकर संसद पहुंचे, जिससे कुल चार अल्पसंख्यक प्रतिनिधि इस दल की ओर से चुने गए।

जमात के इकलौते हिंदू उम्मीदवार हारे

वहीं, जमात ए इस्लामी की टिकट पर खलुना-1 सीट से चुनाव लड़ रहे हिंदू प्रत्याशी कृष्णा नंदी चुनाव हार गए। गोपालगंज-3 से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत के महासचिव गोविंद चंद्र प्रमाणिक 26000 वोट से बीएनपी से हारे। बागेरहाट-1 सीट से बीएनपी उम्मीदवार कपिल कृष्ण मंडल और बागेरहाट-4 सीट से सोमनाथ डे को हार का सामना करना पड़ा है। चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं।

जमात को 211 सीट पर मिली जीत

बीएनपी ने इस चुनाव में कुल 211 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि जमात ए इस्लामी को 68 सीटों पर जीत मिली। इस परिणाम ने सत्ता में बदलाव की संभावना को मजबूत किया है, लेकिन चुनाव की कहानी सिर्फ बहुमत तक सीमित नहीं है। अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का सवाल भी उतना ही अहम बना हुआ है।

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