- जोधपुर हाईकोर्ट की एकलपीठ का आदेश: ‘प्रशासनिक देरी की सजा आवेदक संस्था को नहीं दी जा सकती’
- बिना सुनवाई के सामूहिक आवंटन निरस्त करना प्राकृतिक न्याय और समानता के अधिकार का उल्लंघन
सामुदायिक भवन निर्माण के लिए प्रस्तावित भूमि आवंटन को निरस्त करने के नगर विकास न्यास भीलवाड़ा के फैसले पर राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर ने रोक लगा दी है। इस आदेश से भीलवाड़ा के रंगरेज समाज को बड़ी राहत मिली है। न्यायमूर्ति कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए यूआईटी की ओर से 30 अक्टूबर 2025 को जारी उस आदेश के प्रभाव को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया है, जिसमें केवल ‘औपचारिक आवंटन पत्र जारी न होने’ का हवाला देकर जमीन का प्रस्तावित आवंटन रद्द कर दिया गया था।
प्रशासन की लेटलतीफी, सजा समाजों को क्यों?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता समीर खान ने कोर्ट में तर्क रखा कि राज्य सरकार की भूमि आवंटन नीति 2015 के तहत सभी दस्तावेज और प्रोजेक्ट रिपोर्ट जमा कराने व सरकार से स्वीकृति मिलने के बाद भी प्रशासन ने ही औपचारिक पत्र जारी करने में देरी की। प्रशासनिक लेटलतीफी की सजा संस्थाओं को नहीं दी जा सकती। बिना ‘कारण बताओ नोटिस’ के सामूहिक निरस्तीकरण का आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
इन समाजों की उम्मीदें फिर हुईं जिंदा
अदालत के इस स्टे से रंगरेज समाज के बाद अन्य समाज की संस्थाओं को भी राहत की उम्मीद फिर सं जिंदा हुई है। इनमें गुर्जर गौड़ ब्राह्मण संस्थान, धोबी समाज, लक्षकार समाज, अरोड़ा खत्री, कुमावत समाज, नामदेव समाज, नीलगर समाज, ढोली, भाम्बी व पालीवाल समाज सहित 17 समाजों के सामुदायिक भवनों के निर्माण का रास्ता फिर से खुल सकता है।


