उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के लिए यह मौका दोबारा नहीं आएगा। इसलिए वे इस साल की कांशी राम की जयंती (15 मार्च) को दलितों को लुभाने के लिए हर तरह से इस्तेमाल कर लेना चाहते हैं। कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी (सपा), चंद्रशेखर आजाद हों या खुद बसपा, कोई पीछे नहीं रहना चाहता।
कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जयंती से पहले ही लखनऊ में कार्यक्रम कर डाला और कांशी राम के लिए ‘भारत रत्न’ की मांग भी कर डाली। इस पर मायावती सहित बाकी पार्टियों के नेता भड़क भी गए।
कांशी राम के राजनीतिक उभार और उनकी पार्टी बसपा की वजह से वोटों का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ है। 1980 और 90 के दशकों में कांशीराम का जो उभार हुआ, वह भारतीय राजनीति का एक अहम मोड़ था। दलितों ने भीम राव आंबेडकर के बाद पहली बार किसी नेता में मसीहा का रूप देखा था। उनकी बनाई पार्टी पर दलितों ने काफी भरोसा किया, लेकिन मायावती न तो कांशी राम की विरासत को बढ़ाए रख सकीं और न ही दलित वोट बचा कर रख सकीं।
बसपा का प्रदर्शन का ग्राफ इस टेबल से समझा जा सकता है:
| यूपी विधानसभा चुनाव वर्ष |
कुल सीटें (UP) | वोट शेयर (%) | परिणाम |
| 1993 | 67 | 11.12% | सपा के साथ गठबंधन सरकार |
| 2002 | 98 | 23.06% | भाजपा के समर्थन से सरकार |
| 2007 | 206 | 30.43% | पूर्ण बहुमत की सरकार |
| 2012 | 80 | 25.95% | सत्ता से बाहर |
| 2017 | 19 | 22.23% | भारी गिरावट |
| 2022 | 01 | 12.88% | ऐतिहासिक न्यूनतम |
बसपा का राजनीतिक उभार 25 साल भी कायम नहीं रह पाया। पार्टी नीचे जाने लगी तो लुढ़कती ही गई। कांशी राम की बनाई बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जवानी में ही अंतिम सांस गिन रही है। जबकि, उससे कम उम्र की कई दूसरी पार्टियां अपेक्षाकृत काफी अच्छा कर रही हैं।
1980 और 90 के दशक में बनीं ये दस पार्टियां
बसपा की स्थापना 1984 में हुई थीं। 1980 और 1990 के दशक में करीब नौ और पार्टियां बनीं। भाजपा भी उनमें से एक है। इस दौरान बनी तमाम पार्टियों के नाम इस टेबल में देख सकते हैं:
| पार्टी | कब बनी | बनाने वाले / प्रमुख नेता | बनने का आधार/संदर्भ |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 1980 | अटल बिहारी वाजपेयी, एल.के. आडवाणी | जनता पार्टी से अलग होकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विचार पर गठन। |
| तेलुगु देशम पार्टी (TDP) | 1982 | एन.टी. रामा राव (NTR) | आंध्र प्रदेश में “तेलुगु गौरव” के मुद्दे पर क्षेत्रीय पहचान की शुरुआत। |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 1984 | मान्यवर कांशीराम | दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों (बहुजन) के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए। |
| समाजवादी पार्टी (SP) | 1992 | मुलायम सिंह यादव | जनता दल के टूटने के बाद सामाजिक न्याय और लोहियावादी समाजवाद पर आधारित। |
| समता पार्टी | 1994 | नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस | जनता दल में एक और टूट का नतीजा। बाद में जदयू में इसका विलय हो गया, जिसके अध्यक्ष अभी नीतीश कुमार हैं। |
| राष्ट्रीय जनता दल (RJD) | 1997 | लालू प्रसाद यादव | जनता दल से अलग होकर बिहार में “सामाजिक न्याय” और धर्मनिरपेक्षता का मोर्चा। |
| बीजू जनता दल (BJD) | 1997 | नवीन पटनायक | बीजू पटनायक की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए ओडिशा में गठित। |
| तृणमूल कांग्रेस (TMC) | 1998 | ममता बनर्जी | कांग्रेस से अलग होकर पश्चिम बंगाल में वामपंथ के विरोध में एक क्षेत्रीय शक्ति। |
| राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) | 1999 | शरद पवार, पी.ए. संगमा | कांग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी के विदेशी मूल) के मुद्दे पर अलग होकर महाराष्ट्र में प्रभाव बनाया। |
| जम्मू और कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी (JKNPP) | 1982 | भीम सिंह | जम्मू और कश्मीर के लोगों के अधिकारों पर केंद्रित। |
| इंडियन नेशनल लोक दल (INLD) | 1996 | चौधरी देवी लाल | 1996 में देवी लाल ने हरियाणा लोक दल नाम से इसकी स्थापना की थी। 1998 में इसका मौजूदा नाम रखा गया। |
ऊपर टेबल में जिन पार्टियों के नाम हैं, उनमें से ज़्यादातर आज चुनावी प्रदर्शन के लिहाज से बसपा से बेहतर स्थिति में हैं। इनमें से कई तो क्षेत्रीय पार्टियां हैं। इनकी स्थिति इस टेबल से समझी जा सकती है:
| पार्टी | सरकार में स्थिति (States) | लोकसभा (2024) चुनाव में वोट % | अंतिम विधानसभा चुनाव प्रदर्शन (प्रमुख राज्य) | वर्तमान स्थिति |
| भाजपा (BJP) | 19 राज्यों में (सत्ता/गठबंधन) | 36.56% | ओडिशा: 78 सीटें (जीत), हरियाणा: 48 सीटें (जीत), बिहार: 89 सीटें (गठबंधन की जीत) | केंद्र में सत्तारूढ़; राज्यों में सबसे मजबूत पकड़। |
| सपा (SP) | 0 (UP में मुख्य विपक्ष) | 4.58% | UP (2022): 111 सीटें (32.06% वोट शेयर) | लोकसभा 2024 में 37 सीटों के साथ तीसरी बड़ी पार्टी। |
| TMC | 1 (पश्चिम बंगाल) | 4.37% | बंगाल (2021): 215 सीटें (47.9% वोट शेयर) | बंगाल में मजबूत पकड़; 2026 चुनाव की तैयारियों में व्यस्त। |
| TDP | 1 (आंध्र प्रदेश) | 1.98% | आंध्र (2024): 135 सीटें (जीत, 45.6% वोट) | आंध्र प्रदेश में भारी बहुमत; केंद्र में महत्वपूर्ण सहयोगी। |
| RJD | 0 (बिहार में विपक्ष) | 1.57% | बिहार (2025):* 25 सीटें (विपक्ष में) | बिहार विधानसभा में बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से बाहर। |
| BJD | 0 (ओडिशा में विपक्ष) | 1.46% | ओडिशा (2024): 51 सीटें (सत्ता से बाहर) | 24 साल बाद सत्ता गँवाई; नवीन पटनायक विपक्ष के नेता। |
| NCP (SP) | 0 (महाराष्ट्र विपक्ष) | 0.92% | महाराष्ट्र (2024):* महाविकास अघाड़ी के साथ मजबूत प्रदर्शन। | अब शरद पवार गुट पर अजीत पवार खेमा भारी है और महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ है। |
| बसपा (BSP) | 0 | 2.04% | UP (2022): 1 सीट (12.8% वोट शेयर) | राष्ट्रीय स्तर पर वोट शेयर और सीटों में भारी गिरावट। |
बसपा की गिरावट का दौर शुरू हुए अब अरसा बीत गया है। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वह चरम पर थी। उसके बाद नीचे ही लुढ़क रही है। उसके लिए उम्मीद की बात यही है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भी उसे करीब 13 फीसदी वोट मिले थे। यही कारण है कि सभी पार्टियां कांशीराम को अपने पक्ष में भुनाना चाहती हैं। (बसपा का ग्राफ लगातार नीचे जाने के कारण यहां पढ़ सकते हैं।)
कांशीराम की विरासत पर लड़ाई क्यों?
बाकी पार्टियां जहां 13 फीसदी वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती हैं, वहीं बसपा को भी इन वोटों के कुछ सीटों में बदलने की उम्मीद है।
कांग्रेस को इसलिए भी उम्मीद है, क्योंकि राहुल आबादी के हिसाब से हक दिए जाने और जातिगत जनगणना के लिए लंबे समय से आवाज उठा रहे हैं। उनकी यह मांग कांशीराम की राजनीति से मेल खाती है। कांशीराम का नारा था- जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।
सपा ने भी जो ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित , अल्पसंख्यक) का फार्मूला अपनाया है, लोक सभा चुनाव में उसे उसका फायदा हुआ। वह तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांशीराम भी बहुजन (मूल रूप से दलित, ओबीसी, अल्पसंख्यक) की बात करते थे। लिहाजा, सपा भी कांशीराम की विरासत पर दावा ठोंक रही है।
यूपी में विधानसभा की 403 सीटें हैं। इनमें 84 अनुसूचित जाति (एससी) के लिए सुरक्षित हैं। 2022 में इनमें से 58 सीटें बीजेपी को मिली थीं, जबकि 16 सपा को गई थीं। कांग्रेस कुछ भी नहीं ले पाई थी।
लोकसभा की 80 सीटों में से 17 एससी के लिए सुरक्षित हैं। यहां भी बीजेपी (8) बाजी मार ले गई। सपा सात और कांग्रेस सिर्फ एक सीट ले पाई।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव में दलितों के वोट उत्तर प्रदेश की राजनीति को क्या दिशा देंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।


