असम के विधानसभा चुनाव में सत्ता की बाजी को पलटने के लिए कांग्रेस पार्टी रणनीति को सिरे चढ़ाने की जगह सूबे के कई वरिष्ठ नेताओं के पाला बदलने से परेशान है। चुनाव से पहले पार्टी राज्य में गंभीर संकट का सामना कर रही है। राज्य चुनाव में कांग्रेस पार्टी की चुनावी नैया डांवाडोल नजर आ रही है। ऐसे में कांग्रेस हाईकमान को चुनाव रणनीति पर नए सिरे से मंथन करने के लिए बाध्य कर दिया है। हालांकि पार्टी सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास जरूर कर रही है।
कांग्रेस का इतिहास
साल 1921 में असम में कांग्रेस का सफर असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी की स्थापना के साथ शुरू हुआ था। इसने राज्य की राजनीति में दशकों तक अपना दबदबा बनाए रखा। गोपीनाथ बोरदोलोई जैसे दिग्गज नेताओं के नेतृ्तव में कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक सरकार चलाई थी। बाद में तरुण गोगोई के नेतृत्व में पार्टी ने साल 2001 से 2016 तक 15 सालों तक राज्य में शासन किया। इस दौरान पार्टी ने उग्रवाद को कम करने और विकास कार्यों को करने का श्रेय लिया।
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पार्टी ने खोई प्रमुखता
साल 2016 में कांग्रेस पार्टी ने असम राज्य में अपनी प्रमुखता को खो लिया। वहीं वर्तमान समय में कांग्रेस राज्य में अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही है। वहीं पार्टी पर समय-समय पर कुछ आरोप भी लगते हैं। आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी ने राज्य में अपनी कुर्सी को बचाने के लिए अवैध प्रवासियों को शामिल किया। वहीं कांग्रेस पर यह भी आरोप लगता है कि साल 1947 में विभाजन के दौरान उसने असम का पाकिस्तान को देने का विचार किया था।
वर्तमान स्थिति
असम में कांग्रेस पार्टी 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए खुद को पुनर्गठित कर रही है। इसमें गौरव गोगोई को राज्य कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त करके पार्टी को नई ऊर्जा देने की कोशिश की गई है। वहीं कांग्रेस स्थानीय मुद्दों और महंगाई जैसे मुद्दों पर रैलियों के जरिए अपना खोया जनाधार सुधारने के प्रयास में है।


