जिंदगी और मौत से जुड़ा था आशा भोसले का अंतिम गीत, गाने के बोल ‘जाने दो मुझे खुद से मिलना है’ कर गए भावुक

जिंदगी और मौत से जुड़ा था आशा भोसले का अंतिम गीत, गाने के बोल ‘जाने दो मुझे खुद से मिलना है’ कर गए भावुक

Asha Bhosle Last Song On Life And Death: भारतीय संगीत जगत की महान गायिका आशा भोसले के निधन के बाद अब उनके जीवन से जुड़ी कई भावुक यादें सामने आ रही हैं। 92 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली आशा ताई का एक आखिरी गीत इन दिनों खास चर्चा में है। कहा जा रहा है कि इस गीत में उन्होंने अपनी पूरी जीवन यात्रा और विदाई की भावना को पहले ही सुरों में पिरो दिया था।

करीब आठ दशकों तक अपनी आवाज से श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाली आशा भोसले का संगीत आज भी लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में उनका अंतिम गीत अब एक भावनात्मक संदेश की तरह देखा जा रहा है।

संगीतकार शमीर टंडन ने साझा की खास याद (Asha Bhosle Last Song On Life And Death)

मशहूर संगीतकार शमीर टंडन ने आशा भोसले को याद करते हुए एक भावुक किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि आशा ताई उनके लिए सिर्फ एक महान कलाकार ही नहीं बल्कि मां जैसी प्रेरणादायक शख्सियत थीं। दोनों ने पहली बार फिल्म पेज 3 में साथ काम किया था, जहां आशा भोसले की आवाज में रिकॉर्ड हुआ गीत आज भी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय है।

शमीर टंडन के मुताबिक, आशा भोसले हमेशा नई तकनीक और बदलते दौर के साथ खुद को अपडेट रखने पर जोर देती थीं। उन्होंने यह सीख अपने जीवनसाथी और महान संगीतकार आरडी बरमन से हासिल की थी। उनका मानना था कि संगीत की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए समय के साथ बदलाव जरूरी है।

मौत को लेकर बेहद शांत थीं आशा ताई

शमीर टंडन ने ये भी बताया कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में आशा भोसले मृत्यु को लेकर बेहद सहज और संतुलित नजर आती थीं। एक खास गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान उन्होंने कहा था कि वह अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट हैं और अब शांति के साथ विदा लेना चाहती हैं।

बताया जाता है कि गीतकार प्रसुन जोशी द्वारा लिखे गए गीत के शब्द ‘जाने दो… खुद से मिलना है’ आशा भोसले के दिल के बेहद करीब थे। यही वजह है कि अब इस गीत को उनकी भावनात्मक विदाई से जोड़कर देखा जा रहा है।

आखिरी गीत बना जीवन यात्रा का प्रतीक

अपने निधन से कुछ ही समय पहले आशा भोसले ने ब्रिटिश बैंड गोरिलाज के साथ मिलकर ‘द शेडो लाइट’ नाम का गीत रिकॉर्ड किया था। यह गीत उनके एल्बम ‘द माउंटेन’ का हिस्सा था और इसे उनके लंबे संगीत सफर का प्रतीक माना जा रहा है।

आशा भोसले ने इस गीत के बारे में कहा था कि इसमें उनकी जिंदगी के अनुभव, संघर्ष, रिश्ते और संगीत के प्रति समर्पण की झलक मिलती है। उन्होंने इस गीत की तुलना एक नदी पार करने की यात्रा से की थी, जिसमें संगीत को उन्होंने उस नाव के रूप में बताया जो उन्हें जीवन के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक लेकर जाती रही।

11 हजार से ज्यादा गीतों की अमर विरासत

1933 में जन्मीं आशा भोसले ने बेहद कम उम्र में ही संगीत की दुनिया में कदम रख दिया था। 1950 के दशक में उन्होंने लोकप्रियता की नई ऊंचाइयां हासिल कीं और अपने लंबे करियर में शास्त्रीय, गजल, पॉप, लोक और फिल्मी संगीत जैसी कई शैलियों में 11 हजार से ज्यादा गीत रिकॉर्ड किए।

उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

संगीत जगत में हमेशा गूंजती रहेगी आवाज

मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज के दौरान मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण उनका निधन हो गया। आज मुंबई के शिवाजी पार्क में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

आशा भोसले का जाना सिर्फ एक महान गायिका का जाना नहीं है, बल्कि भारतीय संगीत के स्वर्णिम अध्याय का एक भावुक अंत भी है। हालांकि उनका संगीत हमेशा आने वाली पीढ़ियों के दिलों में जीवित रहेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *