भातखण्डे विश्वविद्यालय में ‘कला संवाद-10’ का आयोजन:भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र पर चर्चा, कुलपति बोली – नाट्यशास्त्र ‘पंचम वेद’

भातखण्डे विश्वविद्यालय में ‘कला संवाद-10’ का आयोजन:भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र पर चर्चा, कुलपति बोली – नाट्यशास्त्र ‘पंचम वेद’

भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय और संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली के साझा सहयोग से ‘कला संवाद-10’ का आयोजन किया गया। राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में आयोजित इस चर्चा का मुख्य विषय ‘भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र: मानवता की सांस्कृतिक धरोहर’ रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. मांडवी सिंह, अकादमी सचिव राजू दास और अन्य विशेषज्ञों ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस दौरान वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई और कला के आध्यात्मिक पक्ष पर विस्तार से बताया । नाट्यशास्त्र है ‘पंचम वेद’, विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने कहा कि भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र भारतीय चेतना के दो मजबूत स्तंभ हैं। उन्होंने नाट्यशास्त्र को ‘पंचम वेद’ बताते हुए कहा कि इसमें अभिनय, ताल, छंद और गति का ऐसा संगम है जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलता। उन्होंने छात्रों को इन ग्रंथों के गहन अध्ययन के लिए प्रेरित किया। साधना और संगीत का गहरा संबंध मुख्य वक्ता विश्व भूषण ने भगवद्गीता के ‘निष्काम कर्म’ को कला से जोड़ते हुए कहा कि संवाद ही समस्त ग्रंथों का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नाट्य के बिना रसों की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। वहीं, प्रो. कुमकुम धर ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की कि यूनेस्को ने इन दोनों ग्रंथों की पांडुलिपियों को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ रजिस्टर में शामिल किया हैं। प्रो. शैलेन्द्र गोस्वामी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि प्रेमभाव ही किसी भी साधना का आधार है। उन्होंने नाट्यशास्त्र में वर्णित अलंकारों और रंगमंचीय संरचना पर तकनीकी जानकारी दी। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन विजय सिंह ने किया। सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण जरूरी अकादमी के सचिव राजू दास और विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. सृष्टि धवन ने अंत में सभी का आभार जताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन न केवल हमारी विरासत को बचाते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को जीवन जीने की सही दिशा भी दिखाते हैं। संवाद सत्र में शोधार्थियों ने विशेषज्ञों से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।

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