जीवन में विपरीत परिस्थितियां जब चुनौती बनकर सामने आती हैं, तब कुछ लोग टूट जाते हैं, जबकि कुछ अपने हौसलों से नई पहचान गढ़ते हैं। अनु रंगा की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है, जिसमें बचपन की शारीरिक बाधा से लेकर आर्थिक संकट तक हर मोड़ पर संघर्ष दिखाई देता है।
5 अप्रेल 1990 को फलोदी में जन्मे अनु रंगा बचपन में ही पोलियो से प्रभावित हो गए। केवल तीन वर्ष की उम्र में पैरों की शक्ति कम हो गई। परिवार ने जोधपुर और उदयपुर तक उपचार के प्रयास किए, लेकिन पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सके। इस स्थिति ने उन्हें कमजोर नहीं, बल्कि भीतर से मजबूत बना दिया। परिवार की जिम्मेदारी ने उन्हें जल्दी परिपक्व बना दिया। पिता ने जैसलमेर आकर छोटा व्यवसाय शुरू किया और कठिन परिस्थितियों में परिवार का पालन किया। अनु रंगा ने भी शिक्षा जारी रखते हुए जिम्मेदारियों को समझा और जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।.साल 2007 में व्यापार शुरू किया, लेकिन अनुभव की कमी से भारी नुकसान हुआ और कर्ज का बोझ बढ़ गया। कठिन हालात में भी उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत कर कर्ज चुकाने की दिशा में प्रयास किए और आत्मसम्मान को बनाए रखा। इसके बाद उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाई। जनसेवा से जुड़ाव बढ़ा और लोगों के बीच पहचान बनी। व्यक्तिगत जीवन में भी उन्हें मजबूती मिली। विवाह के बाद जीवनसाथी ने हर संघर्ष में साथ दिया। बेटी ध्रुविका का जन्म उनके जीवन में नई ऊर्जा लेकर आया।
आज अनु रंगा अपने भाई के साथ डीजे, डेकोरेशन, टूर एंड ट्रेवल्स और जल शुद्धिकरण से जुड़े व्यवसाय का संचालन कर रहे हैं। शहर में उनकी अलग पहचान बन चुकी है।
अब परिवार के लिए संघर्ष
पत्नी की नियुक्ति जैसलमेर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बांसवाड़ा में होने के बाद अनु रंगा के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिवार को साथ रखने की थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और चार पहिया स्कूटी से लंबी यात्राओं का कठिन निर्णय लिया। कई बार सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर जयपुर तक पहुंचे, जहां उन्होंने जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाई। रास्ते की थकान, शारीरिक परेशानी और मौसम की मार के बीच भी उनका संकल्प नहीं डगमगाया। उनका कहना है कि जब तक परिवार को जैसलमेर नहीं ला पाएंगे, तब तक यह संघर्ष लगातार जारी रहेगा।


