बांका के रजौन प्रखंड स्थित दुर्गापुर गांव में दो भाइयों ने आधुनिक खेती के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह और उनके भाई कुंज बिहारी सिंह ने एप्पल बेर की खेती से सालाना 5 लाख रुपये से अधिक की आमदनी हासिल कर इलाके में सफलता की नई मिसाल कायम की है। 2021 से शुरू की पारंपरिक खेती दोनों भाइयों ने वर्ष 2021 में पारंपरिक खेती से हटकर एप्पल बेर की खेती शुरू की। खास बात यह है कि इसकी तकनीक उन्होंने यूट्यूब के माध्यम से सीखी। डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि परंपरागत खेती में लागत अधिक और लाभ सीमित रहता था। ऐसे में एप्पल बेर की खेती उनके लिए बेहतर विकल्प साबित हुई। एक बार पौधे लगाने के बाद 9 साल तक देते फल उन्होंने करीब 7 बीघा जमीन में लगभग 4 हजार एप्पल बेर के पौधे लगाए। इस खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार पौधे लगाने के बाद वे करीब 9 वर्षों तक लगातार फल देते हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद की जरूरत न के बराबर होती है, जिससे लागत कम और मुनाफा कहीं अधिक होता है। वर्तमान में बाजार में एप्पल बेर 100 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है। फरवरी महीने में फल पूरी तरह पककर तैयार हो जाते हैं। बाग में छोटे-छोटे पौधों पर लाल, सेब जैसे फल लदे रहते हैं, जिससे पूरा बगीचा देखने में बेहद आकर्षक लगता है। स्थानीय लोग इसे ‘मिनी कश्मीर’ की संज्ञा दे रहे हैं। आसपास के लोग फोटो लेने के लिए पहुंचते इस बाग का नजारा जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेब बागानों की याद दिलाता है। यही वजह है कि आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग इसे देखने और तस्वीरें लेने पहुंच रहे हैं। एप्पल बेर का मीठा और सेब जैसा स्वाद भी लोगों को खूब भा रहा है, जिससे बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह और उनके भाई की इस सफलता से प्रेरित होकर अब आसपास के कई किसान अपने खेतों और बगीचों में एप्पल बेर की खेती शुरू कर रहे हैं। आज यह बाग न सिर्फ दो भाइयों की अच्छी आमदनी का मजबूत जरिया बना है, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा और नई संभावनाओं का प्रतीक भी बन चुका है। बांका के रजौन प्रखंड स्थित दुर्गापुर गांव में दो भाइयों ने आधुनिक खेती के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह और उनके भाई कुंज बिहारी सिंह ने एप्पल बेर की खेती से सालाना 5 लाख रुपये से अधिक की आमदनी हासिल कर इलाके में सफलता की नई मिसाल कायम की है। 2021 से शुरू की पारंपरिक खेती दोनों भाइयों ने वर्ष 2021 में पारंपरिक खेती से हटकर एप्पल बेर की खेती शुरू की। खास बात यह है कि इसकी तकनीक उन्होंने यूट्यूब के माध्यम से सीखी। डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि परंपरागत खेती में लागत अधिक और लाभ सीमित रहता था। ऐसे में एप्पल बेर की खेती उनके लिए बेहतर विकल्प साबित हुई। एक बार पौधे लगाने के बाद 9 साल तक देते फल उन्होंने करीब 7 बीघा जमीन में लगभग 4 हजार एप्पल बेर के पौधे लगाए। इस खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार पौधे लगाने के बाद वे करीब 9 वर्षों तक लगातार फल देते हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद की जरूरत न के बराबर होती है, जिससे लागत कम और मुनाफा कहीं अधिक होता है। वर्तमान में बाजार में एप्पल बेर 100 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है। फरवरी महीने में फल पूरी तरह पककर तैयार हो जाते हैं। बाग में छोटे-छोटे पौधों पर लाल, सेब जैसे फल लदे रहते हैं, जिससे पूरा बगीचा देखने में बेहद आकर्षक लगता है। स्थानीय लोग इसे ‘मिनी कश्मीर’ की संज्ञा दे रहे हैं। आसपास के लोग फोटो लेने के लिए पहुंचते इस बाग का नजारा जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेब बागानों की याद दिलाता है। यही वजह है कि आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग इसे देखने और तस्वीरें लेने पहुंच रहे हैं। एप्पल बेर का मीठा और सेब जैसा स्वाद भी लोगों को खूब भा रहा है, जिससे बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह और उनके भाई की इस सफलता से प्रेरित होकर अब आसपास के कई किसान अपने खेतों और बगीचों में एप्पल बेर की खेती शुरू कर रहे हैं। आज यह बाग न सिर्फ दो भाइयों की अच्छी आमदनी का मजबूत जरिया बना है, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा और नई संभावनाओं का प्रतीक भी बन चुका है।


