American supremacy Debate: अमेरिका के टेक्सास के शुगर लैंड में स्थापित 90 फीट की हनुमान प्रतिमा पर एक अमरीकी दक्षिणपंथी की ‘नस्लवादी’ टिप्पणी से शुरू हुआ एक विवाद अब सोशल मीडिया पर ‘कल्चर वॉर’ में बदल गया है। तर्कों और तथ्यों के साथ भारतीय-अमेरिकी बता रहे हैं कि ‘श्वेत श्रेष्ठता’ की छटपटाहट स्वीकार कर पाए या नहीं लेकिन सच यही है कि अमेरिका के समृद्ध इलाकों की नींव अब भारतीय-अमेरिकियों के श्रम पर ही टिकी है।
ऐसे भारतीय, जिन्होंने अमेरिका को अपनाने के साथ ही अपनी मूल पहचान भी बनाए रखी है। अमेरिका के सबसे सफल और शिक्षित समुदाय के रूप में भारतीय-अमेरिकी मूल अमेरिकियों से कहीं अधिक ‘अमेरिकी’ है।
क्या है मामला?
अगस्त 2024 में श्री अष्टलक्ष्मी मंदिर में स्थापित उत्तर अमेरिका की सबसे ऊंची ‘पंचलोह अभय हनुमान’ प्रतिमा शक्ति और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) कार्यकर्ता और इंफ्लुएंसर कार्लोस तुर्सियोस ने हाल में सोशल मीडिया पर इसे ‘तीसरी दुनिया का एलियन इन्वेजन’ (विदेशी आक्रमण) करार दिया, जिस पर पलटवार करते हुए लोगों ने कहा कि यह यह ‘आक्रमण’ नहीं, बल्कि उस भूमि पर ‘दावा’ है जिसे भारतीयों ने अपनी मेधा और मेहनत से सींचा है। प्रतिमा हिंदुओं के पैसे से और उनकी जमीन पर बनी है।
आंकड़ों का पलटवार, कौन है ज्यादा ‘मैन्स्ट्रीम’?
अमेरिका में ‘आत्मसातीकरण’ (स्थानीय मुख्य धारा में घुलना-मिलना) को मापने का सबसे बड़ा पैमाना ‘भाषा’ है। सोशल मीडिया यूजर बता रहे हैं कि अमेरिका में कोई भी भारतीय भाषा शीर्ष 10 में भी नहीं है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय अपने घरों में अंग्रेजी बोल रहा है, बहुत तेजी से अमेरिका जीवनशैली को अपना चुका है, जबकि अपनी धार्मिक पहचान को भी सहेज रहा है।
‘पॉवर कॉरिडोर’ में बढ़ता हिंदू प्रभाव
जिस रिपब्लिकन विचारधारा से तुर्सियोस आते हैं, उसी ट्रंप प्रशासन के शीर्ष पर नीति-निर्माताओं के रूप में हिंदू और भारतीय मूल के चेहरे बैठे हैं। इनमें ‘डोजे’ के पूर्व नेता और उद्यमी विवेक रामास्वामी लेकर नेशनल इंटेलिजेंस की महत्वपूर्ण अधिकारी और ‘पहली हिंदू कांग्रेस महिला’तुलसी गबार्ड, एफबीआइ निदेशक काश पटेल व ‘सेकंड लेडी’ उषा वैंस जैसे कई चेहरे शामिल है।
‘विदेशी’ होने का नहीं लगा सकते टैग
एच-1बी वीजा को ‘अमेरिकी नौकरियों का दुश्मन’ बताया जाता है, लेकिन यूजर बता रहे हैं कि हकीकत इसके उलट है। टेक्सास के शुगर लैंड और फ्रिस्को जैसे इलाके आज ‘आर्थिक पावरहाउस’ इसलिए हैं क्योंकि वहां उच्च-शिक्षित भारतीय प्रवासियों का निवेश और श्रम लगा है। औसत अमेरिका से दोगुनी 150,000 डॉलर की औसत घरेलू आय के साथ, यह समुदाय ‘टैक्स सिस्टम’ में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक है।


