सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते 13 वर्षों से कोमा में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी। जिसके बाद हरीश राणा को एम्स दिल्ली में भर्ती कराया गया है। जहां इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसी बीच मुंबई से एक बेहद भावुक और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। 35 वर्षीय आनंद दीक्षित पिछले ढाई साल से ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (गंभीर कोमा) में हैं। उनके बुजुर्ग माता-पिता की उम्मीदें अब दम तोड़ रही हैं। आनंद की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसी हरीश राणा की थी- वह जीवित तो हैं, लेकिन उनका जीवन केवल मशीनों और ट्यूब्स के सहारे चल रहा है।
एक हादसे ने उजाड़ी दुनिया
आनंद दीक्षित के दुखों का सिलसिला 29 दिसंबर 2023 को शुरू हुआ। उस समय आनंद गोरखपुर में थे और अपनी स्कूटर पर सवार होकर कहीं जा रहे थे, तभी उनका भीषण एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे में आनंद की जान तो बच गई, लेकिन उसके बाद से कोमा में चले गए। उनके केयरटेकर अर्जुन प्रजापति पिछले डेढ़ साल से हर पल इस आस में गुजार रहे हैं कि शायद आनंद की पलकें झपकें या वह कोई हरकत करे, लेकिन आनंद केवल शून्य में ताकते रहते हैं। उनके माता-पिता के लिए यह देखना किसी जीते-जी मौत से कम नहीं है।
इलाज पर 4 करोड़ का खर्च, 50 लाख का कर्ज
दीक्षित परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। आनंद का इलाज मुंबई के कोकिलाबेन और लोटस जैसे बड़े अस्पतालों में चला, जहां अब तक 4 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। इस भारी-भरकम राशि को जुटाने के लिए माता-पिता ने अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी और ऊपर से 50 लाख रुपये का कर्ज भी ले लिया। त्रासदी यहीं खत्म नहीं हुई, जिस समय आनंद अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, उसी दौरान उनके घर पर बुलडोजर चल गया। आज परिवार किराए के मकान में रहने को मजबूर है।
इंश्योरेंस कंपनी और सिस्टम की बेरुखी
आनंद के पिता वीरेंद्र दीक्षित ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि वे न केवल आर्थिक रूप से टूट चुके हैं, बल्कि उन्हें हर तरफ से लूटा गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इंश्योरेंस कंपनी ने आनंद का मेडिक्लेम खारिज कर दिया, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता गया। परिवार अब कर्ज के बोझ तले दब चुका है। परिवार को अपनी लगभग सारी संपत्ति बेचनी पड़ी है।
बुजुर्ग पिता ने कहा- ‘बस एक बार पापा कह दे’
आनंद के पिता का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है। 70 वर्षीय वीरेंद्र दीक्षित ने भावुक होकर कहा, “मैं बस एक बार अपने बेटे के मुंह से ‘पापा’ सुनना चाहता हूं।” उन्हें पूरा भरोसा है कि उनका बेटा एक दिन होश में आ जाएगा। यही विश्वास उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।
बताया जा रहा है कि 35 साल के आनंद दीक्षित पेशे से रियल एस्टेट कंसल्टेंट थे। हादसे के बाद उनकी हालत इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें कई महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। उसके बाद घर को ही एक छोटे अस्पताल की तरह तैयार किया गया, जहां मॉनिटर, फीडिंग ट्यूब और लाइफ सपोर्ट से जुड़े उपकरण लगाए गए हैं।
‘नहीं तो इच्छामृत्यु का समय आ जाएगा…’
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस हालत में पड़े मरीजों के लिए बीमा और स्वास्थ्य संबंधी नियम-कानून में बदलाव नहीं किया गया, तो पूरे परिवार के लिए इच्छामृत्यु की मांग करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
हरीश राणा के मामले के बाद सामने आई आनंद दीक्षित की यह कहानी न केवल एक परिवार की पीड़ा को दिखाती है, बल्कि देश के स्वास्थ्य तंत्र, बीमा व्यवस्था और कानूनी ढांचे पर भी बड़े सवाल खड़े करती है।


