ALS In India : इस दुर्लभ बीमारी से दो फेमस सेलेब की मौत दो माह के भीतर हो चुकी है। यह एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है। अगर पश्चिमी देशों से तुलना करें तो NIMHANS की रिपोर्ट कहती है कि ये भारतीय पुरुषों को 10-15 साल पहले होता है। एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) को लेकर हमने भारत में इसका इलाज करने वाले न्यूरोसर्जन डॉ. रिंकू शर्मा से पत्रिका के रवि कुमार गुप्ता ने बातचीत की। साथ ही डॉ. हिमांशु गुप्ता (सीनियर फिजिशियन) ने भी इसको लेकर हमें कुछ जानकारी दी।

ALS Death News | दुर्लभ बीमारी से दो मौतें
- फरवरी 2026 : हॉलीवुड के फेमस एक्टर एरिक डेन का 53 वर्ष की आयु में एमियोट्रोफिक लैटरल स्क्लेरोसिस (Amyotrophic Lateral Sclerosis) से मरे।
- मार्च 2026 : ‘द डिक्टेटर्स’ (The Dictators) और ‘मैनोवर’ (Manowar) जैसे दिग्गज बैंड्स के संस्थापक रॉस “द बॉस” फ्रीडमैन का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
Neurosurgeon Explain ALS : “इस बीमारी से बचना मुश्किल”

डॉ. शर्मा कहते हैं, यह एक न्यूरोडीजेनेरेटिव दुर्लभ बीमारी है। ये इतनी भयंकर बीमारी है कि आदमी अंदर से खोखला हो जाता है। इससे बचा पाना मुश्किल हो जाता है। इसके लक्षण ब्रेन में दिखाई देते हैं।
भारत के ALS मरीज की कहानी
उन्होंने बताया, मेरे पास एक मरीज ALS का था। हालांकि, उसे बचाने का प्रयास बहुत रहा लेकिन 50 की उम्र में निधन हो गया। इस बीमारी को लेकर सटीक इलाज या कोई दवा अभी नहीं है। इसको लेकर शोध भी चल रहे हैं। उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे मरीजों को बचाया जा सकेगा।
राजस्थान में ALS के युवा मरीज
डॉ. गुप्ता कहते हैं, एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), जिसे ‘लू गेरिग रोग’ भी कहा जाता है, एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है। ये ना सिर्फ ब्रेन बल्कि फेफड़ों, मांसपेशियों सहित कई अंगों को प्रभावित करती है। इस कारण मरीज धीरे-धीरे कमजोर होकर मर जाता है।

40 साल की लड़की को ALS
मेरे पास 2010 में एक 40 साल की लड़की इस बीमारी से जूझती हुई आई थी। उसको अचानक कमजोर हुई। दिमाग में कई तरह की दिक्कतें आने लगी थी। इसके बाद जब वो आई तो पता कर पाना मुश्किल था क्योंकि, कोई जानी-पहचानी बीमारी पकड़ नहीं आ रही थी। बाद में, एमआरआई कराने पर इसके बारे में पता चला। हालांकि, वो लंबा जी ना पाई।
50 साल की महिला को ALS
इसी तरह पिछले साल 2025 में मेरे एक वकील मित्र ने झुंझुनूं से महिला मरीज (50 वर्ष) को भेजा था। उसको भी एएलएस बीमारी हो गई थी। वो बुरी तरह से ग्रस्त हो गई थी। इसलिए, इलाज के 7-8 माह के बाद उसकी मृत्यु हो गई थी।
“ALS का सटीक कारण या इलाज का पता नहीं”
इन मौतों को लेकर वो कहते हैं, अगर सटीक इलाज या कारण का पता चले तब जाकर कुछ किया जा सकता है। अभी सिर्फ एक्सपेरिमेंटल तौर पर इलाज किया जा रहा है। क्योंकि, इस बीमारी को लेकर बहुत सारी जानकारी सामने नहीं आई है।
भारत में ALS के मरीज अधिक
पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों में ALS के जल्दी होने की पुष्टि कई मेडिकल रिसर्च में की गई है। शोध – ResearchGate: “The Profile of Amyotrophic Lateral Sclerosis in Natives of Western Himalayas” के मुताबिक, पश्चिमी देशों में औसत उम्र 55-65 वर्ष है, जबकि भारत में यह 40-50 वर्ष के बीच देखी गई है।

भारतीय पुरुषों पर अधिक प्रभाव
PMC – NIH पर प्रकाशित शोध– “Epidemiology and Clinical Features of ALS in India” के अनुसार, दुनिया भर में और विशेष रूप से भारत में ALS पुरुषों को अधिक प्रभावित करता है। भारत में पुरुष-महिला अनुपात लगभग 1.5:1 से लेकर 3:1 तक देखा गया है, यानी लगभग 60-75% मरीज पुरुष होते हैं।
देरी से पहचान और जागरूकता का अभाव (Diagnostic Delay)
इसको लेकर Frontiers in Neurology की शोध रिपोर्ट- “Diagnostic Delay in Amyotrophic Lateral Sclerosis” कहती है कि भारत में इस बीमारी की पहचान होने में औसतन 10 से 12 महीने लग जाते हैं, जो कि इलाज के लिहाज से बहुत लंबा समय है।
जागरूकता की कमी और न्यूरोलॉजिस्ट के पास देर से पहुंचने के कारण इसे अक्सर ‘बुढ़ापे का दर्द’ या ‘कमजोरी’ समझ लिया जाता है। यह स्टडी बताती है कि भारत जैसे देशों में स्पेशलिस्ट केयर तक पहुंचने में होने वाली देरी मरीज के जीवन पर भारी पड़ती है।
जैसा कि हमने डॉ. गुप्ता के 2 मरीजों का उदाहरण भी देखा।
भारत में इस बीमारी से लड़ने के लिए क्या हथियार है?
भारत में ALS का कहां है बेहतर इलाज?
- NIMHANS, बेंगलुरु: यहा MND/ALS के लिए विशेष विभाग और रिसर्च सेंटर है।
- AIIMS, नई दिल्ली: न्यूरोलॉजी विभाग में इसके लिए आधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं।
- PGI, चंडीगढ़: उत्तर भारत के मरीजों के लिए यह एक प्रमुख केंद्र है।
नोट- अगर आपको अचानक से कमजोरी होती है। मांसपेशियों में भयंकर दर्द है और कोई बीमारी पकड़ नहीं आ रही है तो बिना देरी किए आपको किसी न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए।
एएलएस फाउंडेशन खोज रहा कारण!
एएलएस फाउंडेशन इसको लेकर लंबे समय से शोध कर रही है। साथ ही दुनिया भर के आंकड़े व केस को जुटाती है। उनका कहना है कि अभी तक इसके सटीक कारण का पता नहीं चल पाया है। हालांकि, न्यूरोसर्जन अभी मानते हैं कि ये बीमारी मुख्य रूप से आनुवंशिकी है।
ALS के लक्षण (Amyotrophic Lateral Sclerosis Symptoms)
- मांसपेशियों में कमजोरी: खासकर, हाथों या पैरों में कमजोरी महसूस होना।
- बाहों, कंधों या जीभ में कंपन या मरोड़ उठना।
- आवाज का लड़खड़ाना।
- चबाने और निगलने में दिक्कत।
- सांस लेने में तकलीफ।
भारत के ALSCAS फाउंडेशन की मांग
हाल ही में (15 मार्च 2026) दिल्ली में इस संस्था ने अपने 10 साल पूरे किए हैं। वे मांग कर रहे हैं कि ALS को भारत की ‘नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीज’ (National Policy for Rare Diseases) में शामिल किया जाए।
दुनिया भर में ‘PREVAiLS’ जैसे क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं जो तेजी से बढ़ने वाले ALS को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के मरीजों को भी इन ‘ग्लोबल ट्रायल्स’ का हिस्सा बनाने की मांग उठ रही है।
देखते हैं कि भारत सरकार इसको लेकर क्या घोषणा करती है?
इस बीमारी को लेकर अगर आपके पास सवाल हैं तो हमसे कमेंट बॉक्स (सोशल मीडिया) पर पूछें। हमारी कोशिश रहेगी कि अधिक पूछे गए सवालों के जवाब डॉक्टर से पूछकर बताएंगे।


