पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं का मामला गरमा गया है। एमबीबीएस और पीजी अंतिम वर्ष की परीक्षाओं से जुड़ी इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद छात्रों और अभिभावकों में चिंता बढ़ गई है। इन आरोपों से संस्थान की प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह विवाद 11 मार्च 2026 को भेजे गए एक बेनाम ईमेल से शुरू हुआ। इस ईमेल में संस्थान के निदेशक को संबोधित करते हुए डीन (परीक्षा) कार्यालय के एक गैर-शैक्षणिक कर्मचारी पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। ईमेल में दावा किया गया कि यह कर्मचारी पैसे लेकर कुछ छात्रों को परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र उपलब्ध कराता था और उत्तर पुस्तिकाओं में भी कथित तौर पर हेरफेर कर अंक बढ़ाता था। ईमेल के सार्वजनिक होते ही संस्थान में हलचल मच गई। छात्रों के बीच यह चर्चा तेजी से फैली कि परीक्षा प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है। कई छात्रों ने आंतरिक रूप से असंतोष व्यक्त किया, हालांकि वे खुलकर सामने आने से कतरा रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए, 17 मार्च को संस्थान के निदेशक कक्ष में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई थी। उम्मीद थी कि आरोपों की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन बैठक के बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे विवाद और गहरा गया। स्थिति तब और बिगड़ गई जब तत्कालीन डीन (परीक्षा) प्रकाश दुबे ने विरोधस्वरूप अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे को इस मामले से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके बाद 2 अप्रैल को डॉ. नीरू गोयल को नई जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन छात्रों की चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं। 7 अप्रैल की बैठक और उठे सवाल 7 अप्रैल 2026 को एक और महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, लेकिन इस बैठक में खुद निदेशक की अनुपस्थिति ने कई नए सवाल खड़े कर दिए। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि जब मामला इतना गंभीर है, तो शीर्ष स्तर पर जवाबदेही क्यों नहीं दिखाई दे रही? इस पूरे घटनाक्रम ने संस्थान के प्रशासनिक रवैये पर भी सवाल खड़ा होता नजर आ रहा हैं। सवाल खड़ा हो रहा है की क्या वाकई मामले को दबाने की कोशिश हो रही है? या फिर जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है? ऐसे कई गंभीर सवाल अब खुलकर सामने आने लगे हैं। CBI जांच से और गहराया संकट मामले को और संवेदनशील बनाता है निदेशक पर पहले से चल रही जांच। जानकारी के अनुसार, उन पर फर्जी प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच चल रही है। ऐसे में IGIMS प्रशासन की विश्वसनीयता पर दोहरी चोट पड़ रही है। एक तरफ परीक्षा में कथित गड़बड़ी के आरोप, दूसरी तरफ शीर्ष अधिकारी पर सीबीआई जांच इन दोनों ने मिलकर संस्थान की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। छात्रों में डर और आक्रोश इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ रहा है। कई छात्र मानसिक तनाव में हैं और उन्हें अपने भविष्य की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि उन्होंने सालों की मेहनत से परीक्षा दी, लेकिन यदि प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए तो उनकी मेहनत का क्या मूल्य रह जाएगा। कुछ छात्रों और अभिभावकों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि परीक्षा में अनियमितताओं की चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस बार मामला खुलकर सामने आया है। अब वे चाहते हैं कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से लें। निष्पक्ष जांच की मांग तेज छात्रों, अभिभावकों और कई शिक्षकों ने इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो इससे पूरे मेडिकल शिक्षा तंत्र पर सवाल खड़े होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल जैसी संवेदनशील पढ़ाई में इस तरह की गड़बड़ियां समाज के लिए भी खतरनाक संकेत हैं। क्योंकि यहां से निकलने वाले डॉक्टरों की गुणवत्ता सीधे लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। संस्थान के सामने बड़ी चुनौती फिलहाल IGIMS प्रशासन के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन चुका है। यदि जल्द ही मामले की सच्चाई सामने नहीं आई और दोषियों को सजा नहीं मिली, तो इसका असर न सिर्फ वर्तमान छात्रों बल्कि भविष्य में प्रवेश लेने वाले छात्रों पर भी पड़ेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन और जांच एजेंसियां इस पूरे प्रकरण में क्या कदम उठाती हैं। क्या छात्रों को न्याय मिलेगा या यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा। यह आने वाला समय ही बताएगा। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो.(डॉ.) बिंदे ने मामले में चुप्पी साध ली है। दैनिक भास्कर डिजिटल की टीम ने संबंधित मामले में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला। पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं का मामला गरमा गया है। एमबीबीएस और पीजी अंतिम वर्ष की परीक्षाओं से जुड़ी इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद छात्रों और अभिभावकों में चिंता बढ़ गई है। इन आरोपों से संस्थान की प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह विवाद 11 मार्च 2026 को भेजे गए एक बेनाम ईमेल से शुरू हुआ। इस ईमेल में संस्थान के निदेशक को संबोधित करते हुए डीन (परीक्षा) कार्यालय के एक गैर-शैक्षणिक कर्मचारी पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। ईमेल में दावा किया गया कि यह कर्मचारी पैसे लेकर कुछ छात्रों को परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र उपलब्ध कराता था और उत्तर पुस्तिकाओं में भी कथित तौर पर हेरफेर कर अंक बढ़ाता था। ईमेल के सार्वजनिक होते ही संस्थान में हलचल मच गई। छात्रों के बीच यह चर्चा तेजी से फैली कि परीक्षा प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है। कई छात्रों ने आंतरिक रूप से असंतोष व्यक्त किया, हालांकि वे खुलकर सामने आने से कतरा रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए, 17 मार्च को संस्थान के निदेशक कक्ष में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई थी। उम्मीद थी कि आरोपों की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन बैठक के बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे विवाद और गहरा गया। स्थिति तब और बिगड़ गई जब तत्कालीन डीन (परीक्षा) प्रकाश दुबे ने विरोधस्वरूप अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे को इस मामले से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके बाद 2 अप्रैल को डॉ. नीरू गोयल को नई जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन छात्रों की चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं। 7 अप्रैल की बैठक और उठे सवाल 7 अप्रैल 2026 को एक और महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, लेकिन इस बैठक में खुद निदेशक की अनुपस्थिति ने कई नए सवाल खड़े कर दिए। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि जब मामला इतना गंभीर है, तो शीर्ष स्तर पर जवाबदेही क्यों नहीं दिखाई दे रही? इस पूरे घटनाक्रम ने संस्थान के प्रशासनिक रवैये पर भी सवाल खड़ा होता नजर आ रहा हैं। सवाल खड़ा हो रहा है की क्या वाकई मामले को दबाने की कोशिश हो रही है? या फिर जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है? ऐसे कई गंभीर सवाल अब खुलकर सामने आने लगे हैं। CBI जांच से और गहराया संकट मामले को और संवेदनशील बनाता है निदेशक पर पहले से चल रही जांच। जानकारी के अनुसार, उन पर फर्जी प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच चल रही है। ऐसे में IGIMS प्रशासन की विश्वसनीयता पर दोहरी चोट पड़ रही है। एक तरफ परीक्षा में कथित गड़बड़ी के आरोप, दूसरी तरफ शीर्ष अधिकारी पर सीबीआई जांच इन दोनों ने मिलकर संस्थान की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। छात्रों में डर और आक्रोश इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ रहा है। कई छात्र मानसिक तनाव में हैं और उन्हें अपने भविष्य की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि उन्होंने सालों की मेहनत से परीक्षा दी, लेकिन यदि प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए तो उनकी मेहनत का क्या मूल्य रह जाएगा। कुछ छात्रों और अभिभावकों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि परीक्षा में अनियमितताओं की चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस बार मामला खुलकर सामने आया है। अब वे चाहते हैं कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से लें। निष्पक्ष जांच की मांग तेज छात्रों, अभिभावकों और कई शिक्षकों ने इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो इससे पूरे मेडिकल शिक्षा तंत्र पर सवाल खड़े होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल जैसी संवेदनशील पढ़ाई में इस तरह की गड़बड़ियां समाज के लिए भी खतरनाक संकेत हैं। क्योंकि यहां से निकलने वाले डॉक्टरों की गुणवत्ता सीधे लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। संस्थान के सामने बड़ी चुनौती फिलहाल IGIMS प्रशासन के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन चुका है। यदि जल्द ही मामले की सच्चाई सामने नहीं आई और दोषियों को सजा नहीं मिली, तो इसका असर न सिर्फ वर्तमान छात्रों बल्कि भविष्य में प्रवेश लेने वाले छात्रों पर भी पड़ेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन और जांच एजेंसियां इस पूरे प्रकरण में क्या कदम उठाती हैं। क्या छात्रों को न्याय मिलेगा या यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा। यह आने वाला समय ही बताएगा। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो.(डॉ.) बिंदे ने मामले में चुप्पी साध ली है। दैनिक भास्कर डिजिटल की टीम ने संबंधित मामले में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला।


