बिना नोटिस मस्जिद सील करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, UP सरकार से पूछा- ‘किस कानून के तहत की कार्रवाई?’

बिना नोटिस मस्जिद सील करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, UP सरकार से पूछा- ‘किस कानून के तहत की कार्रवाई?’

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पूछा है कि आखिर किस अधिकार के तहत राज्य प्रशासन किसी मस्जिद या पूजा स्थल को बिना किसी पूर्व सूचना के सील कर सकता है। कोर्ट ने इस मामले में सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने मुजफ्फरनगर के अहसान अली द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

जानें क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता अहसान अली के अनुसार, वह मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के भोपा गांव में स्थित एक जमीन का वैध मालिक है, जिसे उसने सितंबर 2019 में पंजीकृत सेल डीड के जरिए खरीदा था। याचिकाकर्ता का दावा है कि वह इस जमीन पर मस्जिद निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा था।

हालांकि, राज्य के अधिकारियों ने अचानक जमीन को सील कर दिया। प्रशासन का तर्क था कि यह निर्माण अवैध है और इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई अनुमति नहीं ली गई है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी कि प्रशासन ने उसे कोई नोटिस दिए बिना और पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही परिसर को सील कर दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछे सवाल

सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार ने निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा, तो हाईकोर्ट ने सरकार को हलफनामे (Affidavit) के जरिए निम्नलिखित तीन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया: राज्य किस कानून या अधिकार के तहत किसी पूजा स्थल को सील कर सकता है? कानून का वह कौन सा प्रावधान है (यदि कोई हो), जिसके तहत पूजा स्थल के निर्माण के लिए राज्य से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है? क्या कानून में ऐसा कोई अधिकार है जो प्रशासन को बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई का अवसर दिए किसी निर्माणाधीन पूजा स्थल को सील करने की शक्ति देता है?

याचिकाकर्ता ने की यह अपील

अहसान अली ने अपनी याचिका में मांग की है कि अधिकारियों को जमीन की सील तुरंत खोलने का निर्देश दिया जाए। उसे निर्माण कार्य जारी रखने की अनुमति मिले। परिसर का उपयोग नमाज अदा करने के लिए करने की कानूनी अनुमति दी जाए। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार का जवाब एक आधिकारिक हलफनामे पर होना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को तय की गई है।

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