अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जंग को चार हफ्ते हो चुके हैं और इसकी आग अब हवाई दुनिया तक पहुंच गई है। दुनिया की 20 सबसे बड़ी एयरलाइंस कंपनियों का 53 बिलियन डॉलर से ज्यादा का मार्केट कैप स्वाहा हो चुका है। उड़ानें रद्द हो रही हैं, खाड़ी के बड़े हब एयरपोर्ट्स बाधित हैं, जेट फ्यूल की कीमतें आसमान छू रही हैं और अब यात्रियों की जेब पर भी इसका बोझ पड़ने वाला है।
खाड़ी की एयरलाइंस सबसे ज्यादा बेहाल
इस पूरे संकट में सबसे बुरा हाल मिडिल ईस्ट की एयरलाइंस का है। Emirates, Etihad और Qatar Airways को एयरस्पेस बंद होने की वजह से अपनी फ्लाइट्स की संख्या में भारी कटौती करनी पड़ी है। इसके साथ ही पूरे खाड़ी क्षेत्र में टूरिज्म लगभग ठप हो गया है जिसका सीधा असर इन एयरलाइंस की कमाई पर पड़ रहा है। यह तीनों एयरलाइंस दुनिया के सबसे व्यस्त ट्रांजिट हब चलाती हैं और भारत से यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका जाने वाली लाखों फ्लाइट्स इन्हीं के रास्ते से गुजरती हैं। एयरस्पेस बंद होने का मतलब है लंबे रूट, ज्यादा फ्यूल और ज्यादा लागत जो यात्रियों के टिकट को और महंगा बनाएंगे।
कार्गो क्राइसिस की अनजान कहानी
इस संकट का एक पहलू जो आम खबरों में नहीं आ रहा वह है कार्गो यानी हवाई माल ढुलाई पर पड़ रहा असर। जंग की वजह से समुद्री शिपिंग रूट बाधित हुए हैं और माल अब हवाई रास्ते से भेजा जा रहा है। इससे एयरपोर्ट्स पर अचानक इतना बोझ बढ़ गया है कि सुविधाएं कम पड़ने लगी हैं। जेनेवा एयरपोर्ट पर फ्रेट री-रूटिंग की वजह से ओवरफ्लो हो गया और पेरिस जाने वाली सर्विसेज पर अतिरिक्त दबाव आ गया। यह सिर्फ यूरोप की समस्या नहीं है, भारत के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पर भी इसका असर पड़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और पेरिशेबल गुड्स की सप्लाई चेन पहले से ही दबाव में है।
एयरलाइन इंडस्ट्री का सबसे बड़ा नुकसान
फाइनेंशियल टाइम्स के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की 20 सबसे बड़ी लिस्टेड एयरलाइंस ने जंग शुरू होने के बाद से मिलकर करीब 53 बिलियन डॉलर का मार्केट कैप गंवा दिया है। यह नुकसान सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। असली चोट ऑपरेशनल लेवल पर पड़ रही है। उड़ानें रद्द हो रही हैं, रूट बदले जा रहे हैं, यात्री कम हो रहे हैं और लागत बढ़ती जा रही है। easyJet के CEO केंटन जार्विस ने साफ कहा है कि जंग शुरू होने के बाद से हर एयरलाइन का शेयर प्राइस गिरा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर सीजफायर का ऐलान हुआ तो शॉर्ट सेलर्स तुरंत अपनी पोजीशन बंद करेंगे और बाजार तेजी से पलट सकता है।
COVID के बाद सबसे बड़ा झटका
एयरलाइन इंडस्ट्री पिछले दो दशकों में तीन बड़े झटके झेल चुकी है। पहला 2001 में 9/11 के हमलों के बाद ट्रांसअटलांटिक डिमांड धराशायी हो गई थी। दूसरा 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जेट फ्यूल की कीमतें तेजी से उछली थीं। तीसरा और सबसे बड़ा 2020 में COVID ने पूरी दुनिया का आसमान बंद कर दिया था। IATA के प्रमुख विली वॉल्श के मुताबिक मौजूदा संकट अभी COVID जितना गहरा नहीं है, लेकिन 9/11 के बाद आई मंदी की याद दिला रहा है। केंटन जार्विस ने कहा कि यूक्रेन युद्ध में भी फ्यूल काफी उछला था, लेकिन इस बार वह और ज्यादा महंगा हुआ है। जो इंडस्ट्री COVID की तबाही से अभी-अभी उबरकर मुनाफे की राह पर लौटी थी, उसे एक बार फिर उसी दलदल में धकेला जा रहा है।
हर टिकट पर कितना घाटा?
फरवरी के अंत में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, उसके बाद से जेट फ्यूल की कीमत दोगुनी हो चुकी है। एयरलाइंस की कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट में फ्यूल का हिस्सा करीब एक तिहाई होता है। यानी सबसे बड़ा खर्च एकदम से दोगुना हो गया। Lufthansa के CEO कार्स्टन स्पोर ने इसे बेहद साफ शब्दों में समझाया। उनकी एयरलाइन का औसत मुनाफा प्रति यात्री महज 10 यूरो है यानी लगभग 1083 रुपये। इतने कम मार्जिन पर जेट फ्यूल का यह बोझ उठाना नामुमकिन है। कई एयरलाइंस ने फ्यूल प्राइस स्विंग से बचने के लिए पहले से हेजिंग कर रखी थी, लेकिन इतनी तेज और बड़ी उछाल की उन्होंने कल्पना नहीं की थी।


