एम्स पटना ने कैंसर पीड़ित युवक का पैर बचाया:दुर्लभ ईविंग सारकोमा में ‘लिंब सेवेज’ तकनीक से बचाया, पटना AIIMS का पहला केस

एम्स पटना ने कैंसर पीड़ित युवक का पैर बचाया:दुर्लभ ईविंग सारकोमा में ‘लिंब सेवेज’ तकनीक से बचाया, पटना AIIMS का पहला केस

पटना एम्स के डॉक्टरों ने 25 वर्षीय युवक का पैर दुर्लभ ईविंग सारकोमा कैंसर से बचाया है। आमतौर पर इस प्रकार के कैंसर में अंग विच्छेदन (अम्प्यूटेशन) की आवश्यकता होती है, लेकिन विशेषज्ञों ने ‘लिंब सेवेज’ तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग किया। उत्तर प्रदेश के देवरिया निवासी मकर ध्वज कुछ महीने पहले असहनीय दर्द से पीड़ित थे। उनके बाएं पैर में एक मामूली चोट के बाद दर्द शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे बढ़ता गया। शुरुआत में इसे सामान्य फ्रैक्चर माना गया था, लेकिन उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई। 13 मई 2025 को मकर ध्वज एम्स पहुंचे 13 मई 2025 को मकर ध्वज एम्स पटना पहुंचे। यहां जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि यह सामान्य फ्रैक्चर नहीं, बल्कि ‘पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर’ था, जो किसी गंभीर बीमारी का संकेत होता है। विस्तृत जांच के बाद उन्हें ईविंग सारकोमा नामक दुर्लभ और आक्रामक बोन कैंसर होने की पुष्टि हुई। यह एक ऐसी गंभीर स्थिति थी, जिसमें अक्सर मरीज को अपना अंग गंवाना पड़ता है। हालांकि, एम्स पटना के ऑर्थोपेडिक्स, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभागों के विशेषज्ञों ने मिलकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने अंग विच्छेदन (अम्प्यूटेशन) के बजाय ‘लिंब सेवेज’ तकनीक का उपयोग कर अंग को बचाने का प्रयास करने का फैसला किया। करीब 6-7 महीने मरीज को कीमोथेरेपी दी इलाज की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण रही। अगस्त 2025 से जनवरी 2026 तक मकर ध्वज को कीमोथेरेपी दी गई। इस उपचार के परिणामस्वरूप ट्यूमर का आकार धीरे-धीरे कम हो गया, जिससे सर्जरी संभव हो सकी। चिकित्सकों की इस सफल पहल ने युवक को नया जीवन प्रदान किया है। ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद जटिल और अत्याधुनिक सर्जरी को अंजाम दिया। कैंसर से प्रभावित टिबिया के हिस्से को सावधानीपूर्वक शरीर से अलग किया गया। इसके बाद हड्डी को बाहर निकालकर 50 Gy की उच्च डोज रेडिएशन दी गई, ताकि उसमें मौजूद कैंसर कोशिकाएं पूरी तरह समाप्त हो जाएं। सबसे खास बात यह रही कि उसी हड्डी को दोबारा शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। मजबूती के लिए टाइटेनियम प्लेट और स्क्रू लगाए गए, जबकि मसल फ्लैप तकनीक के जरिए उस हिस्से की संरचना और कार्यक्षमता को फिर से विकसित किया गया। यह पूरी प्रक्रिया तकनीकी रूप से बेहद जटिल थी, लेकिन डॉक्टरों की टीम ने इसे सटीकता के साथ सफलतापूर्वक पूरा किया। सर्जरी के बाद मकर ध्वज की रिकवरी भी उतनी ही प्रेरणादायक रही। दूसरे ही दिन से उनकी फिजियोथेरेपी शुरू कर दी गई। तीन सप्ताह के भीतर उनकी स्थिति स्थिर हो गई और उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अब वे सहारे के साथ चल पा रहे हैं और धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, यह सफलता सिर्फ एक ऑपरेशन की नहीं बल्कि टीमवर्क, सही समय पर इलाज और आधुनिक तकनीक के समन्वय का परिणाम है।
ऑपरेशन में 11 सदस्यीय टीम रही शामिल सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. जगजीत कुमार पांडेय ने बताया कि अब चिकित्सा विज्ञान इतनी प्रगति कर चुका है कि कई मामलों में अंग को बचाना संभव हो गया है, बशर्ते समय पर सही निर्णय लिया जाए। इस जटिल ऑपरेशन को सफल बनाने में डॉ. प्रवीण, डॉ. एफ्रेम, डॉ. अज़हर, डॉ. प्रितांजलि, डॉ. निलेश और डॉ. हरिकेश की अहम भूमिका रही। साथ ही एनेस्थीसिया विभाग का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहा, जिसकी वजह से पूरी प्रक्रिया सुरक्षित और सुचारू ढंग से पूरी हो सकी। 13 मार्च 2026 को मकरध्वज का पटना AIIMS में सफल ऑपरेशन किया गया। इस दौरान 26 दिनों तक पेशेंट को अस्पताल में अंडर ऑब्जर्वेशन में रखा गया। पटना AIIMS में ईविंग सारकोमा कैंसर सफल ऑपरेशन का पहला केस हैं, जिसे AIIMS के डॉक्टरों ने कर, नया कीर्तिमान स्थापित किया है। फिलहाल पेशेंट पूरी तरह स्वस्थ हैं और कल यानी मंगलवार को पटना AIIMS से डिस्चार्ज कर दिया गया है। पटना एम्स के डॉक्टरों ने 25 वर्षीय युवक का पैर दुर्लभ ईविंग सारकोमा कैंसर से बचाया है। आमतौर पर इस प्रकार के कैंसर में अंग विच्छेदन (अम्प्यूटेशन) की आवश्यकता होती है, लेकिन विशेषज्ञों ने ‘लिंब सेवेज’ तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग किया। उत्तर प्रदेश के देवरिया निवासी मकर ध्वज कुछ महीने पहले असहनीय दर्द से पीड़ित थे। उनके बाएं पैर में एक मामूली चोट के बाद दर्द शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे बढ़ता गया। शुरुआत में इसे सामान्य फ्रैक्चर माना गया था, लेकिन उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई। 13 मई 2025 को मकर ध्वज एम्स पहुंचे 13 मई 2025 को मकर ध्वज एम्स पटना पहुंचे। यहां जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि यह सामान्य फ्रैक्चर नहीं, बल्कि ‘पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर’ था, जो किसी गंभीर बीमारी का संकेत होता है। विस्तृत जांच के बाद उन्हें ईविंग सारकोमा नामक दुर्लभ और आक्रामक बोन कैंसर होने की पुष्टि हुई। यह एक ऐसी गंभीर स्थिति थी, जिसमें अक्सर मरीज को अपना अंग गंवाना पड़ता है। हालांकि, एम्स पटना के ऑर्थोपेडिक्स, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभागों के विशेषज्ञों ने मिलकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने अंग विच्छेदन (अम्प्यूटेशन) के बजाय ‘लिंब सेवेज’ तकनीक का उपयोग कर अंग को बचाने का प्रयास करने का फैसला किया। करीब 6-7 महीने मरीज को कीमोथेरेपी दी इलाज की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण रही। अगस्त 2025 से जनवरी 2026 तक मकर ध्वज को कीमोथेरेपी दी गई। इस उपचार के परिणामस्वरूप ट्यूमर का आकार धीरे-धीरे कम हो गया, जिससे सर्जरी संभव हो सकी। चिकित्सकों की इस सफल पहल ने युवक को नया जीवन प्रदान किया है। ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद जटिल और अत्याधुनिक सर्जरी को अंजाम दिया। कैंसर से प्रभावित टिबिया के हिस्से को सावधानीपूर्वक शरीर से अलग किया गया। इसके बाद हड्डी को बाहर निकालकर 50 Gy की उच्च डोज रेडिएशन दी गई, ताकि उसमें मौजूद कैंसर कोशिकाएं पूरी तरह समाप्त हो जाएं। सबसे खास बात यह रही कि उसी हड्डी को दोबारा शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। मजबूती के लिए टाइटेनियम प्लेट और स्क्रू लगाए गए, जबकि मसल फ्लैप तकनीक के जरिए उस हिस्से की संरचना और कार्यक्षमता को फिर से विकसित किया गया। यह पूरी प्रक्रिया तकनीकी रूप से बेहद जटिल थी, लेकिन डॉक्टरों की टीम ने इसे सटीकता के साथ सफलतापूर्वक पूरा किया। सर्जरी के बाद मकर ध्वज की रिकवरी भी उतनी ही प्रेरणादायक रही। दूसरे ही दिन से उनकी फिजियोथेरेपी शुरू कर दी गई। तीन सप्ताह के भीतर उनकी स्थिति स्थिर हो गई और उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अब वे सहारे के साथ चल पा रहे हैं और धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, यह सफलता सिर्फ एक ऑपरेशन की नहीं बल्कि टीमवर्क, सही समय पर इलाज और आधुनिक तकनीक के समन्वय का परिणाम है।
ऑपरेशन में 11 सदस्यीय टीम रही शामिल सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. जगजीत कुमार पांडेय ने बताया कि अब चिकित्सा विज्ञान इतनी प्रगति कर चुका है कि कई मामलों में अंग को बचाना संभव हो गया है, बशर्ते समय पर सही निर्णय लिया जाए। इस जटिल ऑपरेशन को सफल बनाने में डॉ. प्रवीण, डॉ. एफ्रेम, डॉ. अज़हर, डॉ. प्रितांजलि, डॉ. निलेश और डॉ. हरिकेश की अहम भूमिका रही। साथ ही एनेस्थीसिया विभाग का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहा, जिसकी वजह से पूरी प्रक्रिया सुरक्षित और सुचारू ढंग से पूरी हो सकी। 13 मार्च 2026 को मकरध्वज का पटना AIIMS में सफल ऑपरेशन किया गया। इस दौरान 26 दिनों तक पेशेंट को अस्पताल में अंडर ऑब्जर्वेशन में रखा गया। पटना AIIMS में ईविंग सारकोमा कैंसर सफल ऑपरेशन का पहला केस हैं, जिसे AIIMS के डॉक्टरों ने कर, नया कीर्तिमान स्थापित किया है। फिलहाल पेशेंट पूरी तरह स्वस्थ हैं और कल यानी मंगलवार को पटना AIIMS से डिस्चार्ज कर दिया गया है।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *